सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त ने माना, कुश्ती के लिए गहरा आघात है रोहतक हत्याकांड!

01:48 PM Feb 22, 2021 |

नई दिल्ली (राजेंद्र सजवान)- रोहतक के जघन्य हत्याकांड के बाद से देशभर के अखाड़े एक बार फिर  जाँच एजेंसियों के रडार पर हैं| चाह ज़िंदगियों को लीलने वाले कोच को सनकी या पागल कुछ भी कहा जाए लेकिन कुश्ती से जुड़े लोग इस संहार के बाद सहमे से हैं। यह भी सच है कि अखाड़ों को शक की नज़र से देखा जाने लगा है। जाने-माने ओलम्पियन सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त तो यहाँ तक कहते हैं कि भारतीय कुश्ती ने पिछले 30-40 सालों में जो कुछ कमाया था उसे एक सिरफिरे ने चंद मिनटों में मिट्टी में मिला दिया। योगेश्वर दत्त ने बाक़ायदा सोशल मीडिया पर जाट कॉलेज रोहतक के हत्याकांड की जोरदार शब्दों में निंदा की और कहा कि बेरहम हत्यारे को एक अबोध बच्चे को मारते हुए भी ज़रा दया नहीं आई। उसे कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए। योगेश्वर एक बेटे के पिता हैं जबकि सुशील के जुड़वाँ बेटे हैं। भारत के लिए क्रमशः एक और दो पदक जीतने वाले दोनों पहलवानों को लगता है कि जिस दिन हत्याकांड को अंजाम दिया गया वह दिन भारतीय कुश्ती का काला दिन था। कुछ साल पहले तक अधिकांश अखाड़ों को शक की नज़र से देखा जाता था। एसा इसलिए ताे क्यों कोई उनमें ज़ोर करने वाले अधिकांश पहलवान नेता सांसदों की ड्यूटी बजाते थे और चुनावों के चलते उनकी ड्यूटी बजाते थे, लेकिन गुरु हनुमान अखाड़े, मास्टर चंदगी राम और कैप्टन चाँद रूप अखाड़ों के पहलवानों की सफलता के बाद से धारणा बदली और अखाड़े देश का मान सम्मान बढ़ाने वाले पवित्र स्थल बन गए, फिर एक दौर वह भी आया जब सतपाल, करतार आदि पहलवानों की सफलताओं ने भारतीय कुश्ती को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ा स्थान दिलाया, लेकिन सुशील और योगेश्वर के ओलम्पिक पदकों ने देश को कुश्ती की बड़ी ताकत के रूप में पेश किया, लेकिन रोहतक अखाड़े में जो कुछ घटित हुआ उसके दाग आसानी से नहीं छूटने वाले।

सुशील मानते हैं कि एक मछली ने सारा तालाब गंदा किया है। उनके अनुसार अखाड़े खोलने की होड़ और समर्पित गुरुओं की अनुपस्थिति में कुछ भी घटित हो सकता है। उन्होंने अपने गुरुओं महाबली सतपाल, स्वर्गीय यशवीर और द्रोणाचार्य रामफाल के उदाहरण दिए और कहा कि इन सभी ने सैकड़ों पहलवानों को सिखाया पढ़ाया और कभी भी कुछ भी अशुभ नहीं होने दिया।  

योगेश्वर की राय भी कुछ अलग नहीं है। वह कहते हैं कि चतरसाल अखाड़े के अनुशासन ने सुशील और योगेश्वर को चैम्पियन बनाया। अखाड़े के गुरु खलीफा अपने काम के प्रति हमेशा ईमानदार रहे, लेकिन आज हर कोई अखाड़ा खोल रहा है। ज़िम्मेदार एजेंसियाँ बिना जाँच पड़ताल किए किसी को भी अनुमति दे रही हैं, जोकि परेशानी का कारण बन रहा है और अब कुश्ती जैसे पवित्र खेल को शक की नज़र से देखा जाने लगा है, लेकिन यहाँ कुश्ती या उससे जुड़ी किसी संस्था का कोई दोष नहीं है।

दोनों ही दिग्गज पहलवान चाहते हैं कि अखाड़ों को ठोंक बजा कर ही हरी झंडी दिखाई जानी चाहिए। अखाड़े सिर्फ़ कमाई का ज़रिया ना माने जाएँ| वहाँ चरित्र निर्माण की शिक्षा भी दी जानी चाहिए और हो सके तो लड़के और लड़कियों को अलग अलग ट्रेनिंग दी जाए।