हिन्दी बिना

14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को भारत की राष्ट्र भाषा घोषित किया गया था। लेकिन कटु सत्य यह है कि देश का ही नहीं प्रदेशों और जिला स्तर पर अधिकतर राज-काज स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी अंग्रेजी में ही होता है। भारत को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी हकूमत से स्वतंत्रता अवश्य मिल गई लेकिन अंग्रेजी भाषा से आज तक हम मुक्त नहीं हो सके। अंग्रेजी भाषा तो शायद भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन गई है। अंग्रेजी बोलने वाले को सरकार व समाज दोनों में सम्मान मिलता है और हिन्दी बोलने व लिखने वाले को दूसरी श्रेणी का ही माना जाता है।

उपरोक्त तथ्यों को समझते हुए ही उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने हिन्दी दिवस के अवसर पर गृह मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि अंग्रेजी एक रोग है, जिसे अंग्रेज छोड़ कर गए थे। देश में हिन्दी के बिना आगे बढऩा संभव नहीं है। उपराष्ट्रपति ने शुरुआती शिक्षा मातृभाषा में कराने पर जोर दिया। नायडू ने अपने अतीत में हिन्दी के साथ हुए तजुर्बे के बारे में बताया। दक्षिण भारत से आने वाले नायडू ने कहा कि जब वह युवा थे, तो उन्होंने हिन्दी विरोधी आंदोलन में हिस्सा लिया था। बाद में उन्हें भान हुआ कि हिन्दी के बिना वह देश की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सकते। उन्होंने हिन्दी सीखी। तमिलनाडु से दिल्ली आने के बाद वह टूटी-फूटी हिन्दी बोलते थे, लेकिन उन्हें यहां लोगों ने स्वीकार किया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि किसी भी मातृभाषा की अपनी गरिमा है। जब चीन के राष्ट्रपति यहां आते हैं, तो अपनी मातृभाषा में बात करते हैं। ईरान के राष्ट्रपति अंग्रेजी में पीएचडी हैं। वह भी जब भारत आए तो अपनी मातृभाषा में बात की।

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने भी अतीत में कहा था कि 'जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है वह उन्नत नहीं हो सकता।' चीन अपनी मदारिन भाषा में ही सारा राजकाज का काम और विश्वविद्यालय और विद्यालयों में अपनी भाषा मदारिन में ही शिक्षा देने का काम करता है। अंग्रेजी और मदारिन भाषा के बाद विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी को जब अपने ही देश में वह मान-सम्मान और स्थान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था फिर विश्व स्तर पर कैसे मिल सकता है।

विश्व के विकसित देशों में अधिकतर वही देश हैं जिन्होंने अपनी मातृभाषा को राजकाज के साथ जोडऩे के साथ जन साधारण की रोजी, रोटी के साथ छोड़ दिया। जो भाषा जन साधारण को रोटी, कपड़ा और मकान दिलवाने में सहायक होती है उसी का विकास होता है। धरातल के उपरोक्त सत्य को समझते हुए ही दिल्ली में आयोजित केंद्रीय हिन्दी समिति की बैठक में हिमाचल के मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में और जिला स्तर पर सरकारी कार्य हिन्दी में हो यह बात सुनिश्चित की जा रही है। मध्य प्रदेश सरकार के आदेश अनुसार अब हिन्दी में पर्चा देकर भी एम.बी.बी.एस. और अन्य पाठ्यक्रमों की परीक्षा उत्तीर्ण की जा सकती है। समय की मांग है कि देश की शिक्षा, स्वास्थ्य और न्यायिकी सेवाओं में हिन्दी का उपयोग सुनिश्चित किया जाए, इससे जन साधारण को तो राहत मिलेगी ही साथ में हिन्दी का विकास भी होगा।

अब तो संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी का प्रयोग बढ़ रहा है। सोशल वेबसाइट्स पर हिन्दी भाषा प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण पोस्ट है-'नमस्कार! संयुक्त राष्ट्र अब हिन्दी में पोस्ट कर रहा है। यह संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक अकाउंट है। हमें फॉलो करें।' यह संदेश समूचे विश्व में घूम रहा है, लेकिन ट्विटर पर फालोअर मिले हैं मात्र 9303 और 990 इंस्टाग्राम पर। इसी तरह 'साउंडक्लाउड' वेबसाइट पर चल रहे संयुक्त राष्ट्र के हिन्दी रेडियो स्टेशन को भी श्रोताओं के कमेंट्स, शेयरिंग और इंटरैक्शन का इंतजार है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने हाल ही में मॉरीशस में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र के हिन्दी न्यूज बुलेटिन को फॉलो और शेयर करके हम हिन्दी को विश्व भाषा बनाने की ओर ठोस कदम बढ़ा सकते हैं। सुषमा स्वराज ने दो साल पहले 14 सितम्बर 2016 को लोकसभा में एक लिखित जवाब में कहा था, संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को ऑफिशियल भाषा बनाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया जा चुका है, जो है यूएन रेडियो की वेबसाइट पर हिन्दी भाषा में बुलेटिन का शुभारंभ।

विश्व स्तर पर अगर हिन्दी को पहचान देनी है तो हिन्दी प्रति जो उदासीनता दिखाई जा रहा है उसे छोडऩा होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किए प्रयास को भारत की सरकार व हिन्दी प्रेमियों को प्रोत्साहित करना चाहिए। मात्र हिन्दी दिवस या पखवाड़ा मनाकर कुछ नहीं होने वाला। अपने दिलो-दिमाग में यह बिठा लें कि हिन्दी के बिना आप अधूरे हैं। हिन्दी के विकास में ही भारत के जन का विकास है। भारत की प्रादेशिक भाषाओं का विकास है। प्रादेशिक भाषाएं राष्ट्रभाषा को मजबूत करके ही स्वयं मजबूत हो सकती है। अगर हिन्दी कमजोर होगी तो प्रादेशिक भाषाएं भी कमजोर होंगी और परिणामस्वरूप हम स्वयं कमजोर हो जाएंगे। हिन्दी बिना देश का भविष्य धूमिल है, इसलिए हिन्दी को रोटी, कपड़ा और मकान से जोड़कर विकसित करें, इसी में भारत का भविष्य उज्ज्वल है। 

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।