विधवा का पुनर्विवाह

हिन्दू विवाह संस्कार में एक पुरुष और स्त्री तब पति-पत्नी हो जाते हैं जब वह अपने रिश्तेदारों एवं पवित्र अग्नि के समक्ष सात फेरे ले लेते हैं। वर वधु का हाथ थामते हुए कहता है ‘मैं तुम्हारा हाथ थामता हूं कि मेरा भाग्य हो, मैं आत्मा हूं तुम बाकी सब हो, मैं शब्द हूं तुम संगीत हो, मैं बीज हूं, तुम खेत हो, मैं आकाश हूं तुम पृथ्वी।’ हिन्दू धर्म अनुसार पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के पूरक हैं और एक दूसरे का साथ देकर वह आत्म विकास करते हैं। इस संसार का आधार विवाह ही है। पति और पत्नी गृहस्थ आश्रम के आधार हैं, गृहस्थ आश्रम पर जिस तरह शेष आश्रम आधारित हैं, उसी तरह नर और मादा पर ही सारी सृष्टि आधारित है। विवाह संस्कार अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन प्रकृति के आगे किसी का कमजोर नहीं चलता और कई मामलों में भरी जवानी में ही पति की मौत हो जाती है और औरत विधवा हो जाती है। विधवा औरत पर एक तरह से मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ता है। आज पहले जैसी स्थिति तो नहीं क्योंकि कानूनी तौर पर अब विधवा का पुनर्विवाह किया जा सकता है। कानून की दृष्टि से तो सब ठीक है लेकिन सामाजिक स्तर पर देखें तो आप को ऐसे विरले घर मिलेंगे जहां सास-ससुर ने अपनी विधवा बहू को बेटी समझ कर उसका पुनर्विवाह कर घर से विदाई दी हो।

पिछले दिनों ऐसी ही एक घटना सामने आई जिस अनुसार ऊना जिले के गगरेट इलाके के एक दम्पत्ति ने अपने इकलौते बेटे की मौत के बाद अपनी बहू को न केवल पढ़ाया बल्कि पढ़ाने के बाद उसकी शादी भी की। प्रकाशित समाचार अनुसार अंबोटा गांव के सेवानिवृत अध्यापक गुलशन ने अपने इकलौते बेटे उमेश की बड़े अरमान और धूम-धड़ाके के साथ शादी की थी। सिमरन ने बेटी को जन्म दिया तो गुलशन का घर किलकारियों से गूंजने लगा। लेकिन अचानक घर में हुई एक दुर्घटना में गुलशन के जवान बेटे की अकाल मौत हो गई। इकलौते बेटे के खो देने से जहां एक ओर सारा परिवार गमगीन हो गया तो दूसरी तरफ महज 26 साल की उम्र में बहू का भी संसार उजड़ कर रह गया। इस बीच एक शिक्षक के नाते गुलशन ने स्नातक उतीर्ण बहू को बीएड की शिक्षा दिलवा दी ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सके। लेकिन भरी जवानी में पहाड़ जैसी जिंदगी का बोझ लेकर पूनम कैसे आगे बढ़ेगी। इसकी चिंता भी गुलशन और अंजू को सताने लगी। इसी दरम्यान गुलशन दंपति ने बड़ा फैसला यह लिया कि वैधव्य के जरिए पूनम की जिंदगी बर्बाद होने के बजाए अब बहू को बेटी बनाकर विदा किया जाएगा। सास-ससुर के फैसले पर पूनम भी हैरान थी, लेकिन इस बाबत अपने समधी और पूनम के पिता से बात करने के बाद उन्होंने बहू के लिए जाडला कोयड़ी गांव के रंजीत सिंह के युवक के रूप में एक रिश्ता ढूंढ निकाला।

उपरोक्त परिवार का यह कदम समाज को राह दिखाने वाला है। बेशक कानून ने विधवा पुनर्विवाह को मान्यता दी है लेकिन सामाजिक स्तर पर उपरोक्त कदम उठाने का साहस करने वाले बहुत कम हैं। इसके विपरीत बहू को अशुभ समझकर उसकी हर तरह से प्रताडऩा की जाती है। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि आज 21वीं सदी में भी जहां इंसान चांद व मंगल तक पहुंच चुका है और विकास की चरम सीमा को छू रहा है ऐसे में भी अधिकतर विधवाओं का जीवन नारकीय ही होता है। हां, कुछ अपवाद अवश्य होते हैं, जैसे गगरेट का यह दंपत्ति जिसने बहू को बेटी बनाकर उसका पुनर्विवाह कर विदाई की।

ऐेसे परिवार समाज के लिए रोशन की मीनार का ही काम करते हैं। औरत प्रति जितना सम्मान समाज दिखाएगा उसी से समाज की परिपक्वता का पता चलता है। समय की मांग है कि अब अतीत के रुढि़वादी व दकियानुसी विचारों को छोडक़र वर्तमान की परिस्थितियों को सम्मुख रख और औरत की भावनाओं का सम्मान करते हुए नई परम्पराओं की स्थापना होनी चाहिए। हमें हमेशा यह याद रखना होगा पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि पूरक हैं और दोनों का विकास एक-दूसरे पर निर्भर है। इस विकास में आने वाली बाधाओं को दूर करने में ही समाज की भलाई है। अध्यापक गुलशन व उनकी धर्मपत्नी ने जो कदम उठाया उसके लिए उन्हें बहुत-बहुत साधूवाद।
 

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।