लोकतंत्र में भी पुलिस राजनेताओं के चक्रव्यूह में क्यों

भारत की स्वतंत्रता से कुछ वर्ष पहले शहीद भगत सिंह ने यह चिंता प्रकट की थी कि स्वतंत्रता के बाद भारत कहीं काले अंग्रेजों के शासन में न आ जाए, जनता रोजी-रोटी और न्याय के लिए तड़पती न रहे। भगत सिंह की चिंता सही ही नहीं, शत प्रतिशत सही साबित हो रही है। शहीद भगत सिंह ने कहा था, मैं ऐसा भारत चाहता हूं जिसमें गोरे अंग्रेजों का स्थान हमारे देश के काले अंग्रेज न लें। भगत सिंह ने सांप्रदायिकता और जातिवाद को बढ़ावा देने वाले लोगों का हमेशा विरोध किया था। वह सत्ता में ऐसा बदलाव चाहते थे जहां आम आदमी की आवाज सुनी जा सके। 
 मैं एक उस जन नेता से मिली जिसकी आयु 100 वर्ष से ज्यादा है और जिसने अंग्रेजों का राज देखा है। उसका यह कथन है कि अंग्रेज राज उनके प्रति तो बहुत क्रूर था जो भारत की आजादी की बात करते थे अथवा उनके तुगलकी आदेशों को नहीं मानते थे, पर आम जनता, पुलिस थानों से वैसी पीड़ित परेशान नहीं थी जैसी अब हो रही है। स्वतंत्रता के कुछ वर्ष पश्चात तक भी जनता का विश्वास पुलिस तंत्र पर था। पुलिस के ऐसे बहुत से अधिकारी हुए जो न्याय देते थे, निर्दोष की रक्षा करते थे और सब प्रकार के राजनीतिक दबाव प्रभाव से मुक्त थे। आजादी के बाद पुलिस पर राजनेताओं का दबाव भी इतना ज्यादा नहीं था जितना आज है। कुछ वरिष्ठ सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों ने यह बताया कि जब वे पीडि़त का पक्ष नेताओं के सामने रखते थे तो वे कभी भी निर्दोष को दंड देने के लिए नहीं कहते थे। पर धीरे धीरे स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र पुलिस और प्रशासन के हाथों गिरवी रख दिया गया। इसमें अधिक दोष वर्तमान राजनीति का है और उनका दोष भी कम नहीं जो मलाईदार पोस्टिंग पाने के लिए अपनी सुविधा अनुसार स्टेशन चुनने के लिए राजनेताओं की छाया में जाते हैं। उनके पांव भी छूने में उन्हें कोई संकोच नहीं है। 
ताजी घटना है अमृतसर का ही एक व्यक्ति बहुत पीड़ा में मिला और उसका यह कहना था कि उसके बेटे ने जो अपराध किया भी होगा उसके लिए क्षेत्र के पुलिस अधिकारी ने हजारों रुपये ले लिए। फिर भी उस पर केस बना दिया। जब उस पुलिस के कनिष्ठ अधिकारी की शिकायत उच्चाधिकारियों तक की तो उनका बिना संकोच यह कहना था कि अमुक नेता का यह आदमी है। उसी के कहने पर इसे चौकी इंचार्ज बनाया गया है। बात यहीं नहीं रुकी। उस नेता का भी दरवाजा खटखटाया। उसने भी बेझिझक कह दिया कि मुझे वोट चाहिए। जो भी आता है मैं उसका काम कर देता हूं पर इतन अवश्य कह देता हूं कि पकड़े जाओगे तो वे बचाने के लिए नहीं आएंगे। यह एक उदाहरण है। 
पुलिस की कमिश्नरेट व्यवस्था में एक बड़ी कठिनाई यह भी है कि अगर कोई राजनेता यह चाहे कि किसी आरोपी या अपराधी को जमानत नहीं देनी चाहिए तो फिर कमिश्नरेट की कलम वहीं रुक जाती है। अदालत से उसे जमानत मिल जाए तो पुलिस को स्वीकार करनी पड़ती है, पर राजनेताओं का आदेश उनके लिए सर्वोपरि हो जाता है। देश भर में थोड़े बहुत अंतर के साथ पुलिस के कार्य की संस्कृति या अपसंस्कृति एक जैसी है। जो ट्रक ड्राइवर देश के कई हिस्सों में माल लाने पहुंचाने के लिए जाते हैं उनसे ही पूछा जाए तो वे बता देते हैं कि किस प्रदेश में पुलिस ज्यादा तंग करती है और कहां समझौता थोड़े में हो जाता है। मुझे अफसोस है कि कुछ ट्रक ड्राइवरों ने पंजाब के विषय में यह कहा कि यहां सबसे ज्यादा कठिनाई है। इसके बाद उत्तरप्रदेश में। अभी पूर्वोत्तर की शिकायतें ज्यादा नहीं मिलीं। 
मैंने तो देश के सांसदों और विधायकों से यह प्रश्न किया है, अपील की है कि अपने क्षेत्र के मतदाताओं को, जनता को संरक्षण दें। यह भी पूछा है कि क्या कोई एक सांसद शपथ लेकर यह कह सकता है कि उसके संसदीय क्षेत्र में  पुलिस या प्रशासनिक क्षेत्र में कोई भी रिश्वत नहीं चलती है। पंजाब में ही जरा जागरूक होकर चलें तो देखिए ज्यादातर उन्हीं गाडिय़ों को पुलिस रोकती, चालान करती या उनसे समझौता वार्ता करती है जो दूसरे जिलों या दूसरे राज्यों से आती हैं। कौन नियंत्रण करेगा इस जन-परेशानी पर? जनप्रतिनिधि चुने गए और संभवत: एक केस भी ऐसा नहीं मिलेगा जहां पुलिस टार्चर के सताए या तहसील में निशानदेही के लिए प्रार्थना पत्र लेकर जाने वाले व्यक्ति की शिकायत लेकर यह पार्षद, विधायक या सांसद जनता के साथ चलते हों। यह अवश्य देखा गया कि जिस राजनेता का किसी पुलिस अधिकारी ने अनुचित आदेश नहीं माना उसके विरुद्ध जलूस निकालते, नारे लगाते और उसका ट्रांसफर करने के लिए दिल्ली अपनी पार्टी के हाईकमान तक नाक रगड़ते हैं। एक विधायक को पुलिस स्टेशन में डीएसपी को यह कहते सुना गया कि अगर मेरे बंदों का काम न हुआ तो फिर जमीन पर लिटाकर मारूंगा। एक पुलिस स्टेशन में एएसआई दुखी होकर आत्महत्या करता है, लेकिन तंग करने वाले राजनेताओं के खासम-खास हैं, इसलिए मरने वाले को भी न्याय नहीं मिलता और अपमानित करने वाले नेताओं के विरुद्ध भी कोई कार्यवाही नहीं। 
ये बहुत छोटे-छोटे उदाहरण हैं। कौन नहीं जानता कि चुनाव दौरान समय की सरकारें चुनाव इन्हीं पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के बल पर लड़ती हैं। मुझे याद है चुनाव के निकट लगातार राजनेताओं के फोन आते थे कि अमुक अधिकारी को उसके इलाके में लगा दो। यह पांच हजार वोट ले देगा। क्या यह नहीं हो सकता कि राजनेताओं का हस्तक्षेप पुलिस के कार्य से पूरी तरह खत्म हो जाए। क्या देश में रिश्वत खत्म नहीं हो सकती? क्या पुलिस द्वारा झूठे केस बनाने और मोटी रकम ऐंठने का धंधा बंद नहीं हो सकता?
ताजी घटना है तरनतारन में एक एएसआई ने सात लाख रुपया रिश्वत यह धमकी देकर ली कि अन्यथा उसे नशे के केस में फंसा देगा। पंजाब के अजनाला, जंडियाला और अमृृतसर क्षेत्र तथा अन्य जिलों में भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। एक ऐसा भी पुलिस इंस्पैक्टर था जो क्षेत्र के विधायक का चहेता, उसकी चुनावी नैया पार लगाने वाला था। फिर जिसको भी पीट ले, जितना भी लूट ले, उसे सब माफ था, क्योंकि नेताजी ने उसे इसी काम के लिए रखा था। क्या कोई कल्पना करेगा कि जब ऐसे इंस्पेक्टर का ट्रांसफर हो गया, उसके बाद भी राजनीति के बल पर  अपने पुराने स्टेशन पर बैठ कर पूरी दादागिरी करता रहा।
अपने देश के गृहमंत्री जी से भी मैंने यह निवेदन किया है कि पुलिस को पुलिस बनाइए। हर व्यक्ति को यह लगे कि पुलिस उसकी रक्षक है। चौक में पुलिस देखकर उसे डरना नहीं विश्वास से चलना है। यह भी कहा कि सभी सांसदों से पूछिए कि उनके क्षेत्र में किसी भी विभाग में रिश्वत तो नहीं है। शायद ऐसा कभी नहीं हो पाएगा। देश के संतों, कथावाचकों, धर्म गुरुओं से भी निवेदन है कि अभी हमें मोक्ष मुक्ति का रास्ता न बताएं। अपने सभी भक्तों, श्रोताओं, शिष्यों से यह पूछें कि उनके परिवारों में भ्रष्टाचार का धन तो नहीं आ रहा। क्या सभी संतजन यह निर्णय कर सकते हैं कि उस घर में अन्न-जल न लिया जाए जहां किसी की खून की कमाई से रोटी बनाई जा रही है। क्या सभी धर्म गुरु यह तय कर सकते हैं कि भ्रष्टाचार तंत्र में जकड़े परिवारों में विवाह आदि के अवसरों पर भी आशीर्वाद न दें। अगर ऐसा हो जाए तो भारत की जनता को यह लगेगा कि वे सचमुच स्वतंत्र भारत में हैं। हमारा देश स्वतंत्र हैं। देश उन्नति की राह पर अग्रसर भी है, पर आम आदमी शोषित है, डरा हुआ है, सिर झुकाकर जीने को मजबूर है और सरकारें, शासक, राजनेता मानें या न मानें यह सत्य है कि पासपोर्ट दफ्तरों के बाहर जो विदेश जाने वालों की चाह में लंबी लंबी पंक्तियों में धक्के खा रहे हैं वह भी भ्रष्ट तंत्र के कारण ही है।

-लक्ष्मीकांता चावला
लेखिका पंजाब की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रही हैं।