जहाँ बाबा साहब जैसा संकल्प वहाँ सफलता

भीमराव रामजी अम्बेडकर का नाम बाबा साहब के नाम से प्रसिद्ध है। बाबा साहब के पिता रामजी और माता भीमा बाई जी दोनों के नाम को सम्मिलित करके ही इनका नामकरण किया गया लगता है। 14 अप्रैल 1891 के दिन मध्य प्रदेश के महू क्षेत्र में बाबा साहब का जन्म हुआ था। परिवार अधिक सम्पन्न नहीं था और उस पर भी विपदा यह थी कि यह परिवार दलित जाति से सम्बन्धित था और वो समय भी ऐसा था जब छुआछूत के आधार पर सामाजिक और आर्थिक भेदभाव व्यक्ति को पूरे सामाजिक वातावरण और साधनों से वंचित रखते थे। हालांकि उस समय स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज आन्दोलन इस भेदभाव के विरुद्ध पूरा मोर्चा लेकर युद्ध स्तर पर कार्य कर रहा था फिर भी भेदभाव की घटनाएँ पूरी तरह से रूक नहीं पा रही थीं। वंचित परिवारों के लोग भी अपने बच्चों को हर प्रकार की शिक्षा से सम्पन्न करना चाहते थे। भीमराव को भी स्कूल में दाखिला कराया गया, परन्तु स्कूल में हर प्रकार का भेदभाव देखने को नसीब होता था। दलित वर्ग के बच्चों को अलग बैठाया जाता था, उनका स्थान भी कक्षा के भीतर नहीं अपितु बाहर बरामदे में हाता था। बैठने के लिए दरी या बोरी का टाट भी उन्हें घर से लाना पड़ता था। अध्यापक इन बच्चों पर कोई विशेष ध्यान नहीं देते थे। उन्हें मटके में से जल लेने का भी अधिकार नहीं था। उनके लिए विद्यालय का चपरासी उन्हें दूर हटाकर लगभग एक फुट ऊँचाई से पानी गिराता था जिसे उन्हें पीना पड़ता था। चपरासी नहीं तो पानी भी नहीं। ऐसी परिस्थितियों से दु:खी होकर दलित बच्चे पढ़ाई में रुचि ही नहीं ले पाते थे। परन्तु जिसकी किश्मत में ईश्वर ने देश और समाज के बड़े-बड़े कार्यों का दायित्व निर्धारित किया हो और जिस व्यक्ति के मन में शिक्षा के प्रति प्रेम जागृत हो वह दिव्य बालक वंचित वर्ग से होने के बावजूद भी अपने संकल्प से पीछे नहीं हटता और एक-एक कदम आगे बढ़ाता हुआ जीवन की बड़ी से बड़ी ऊँचाईयों को छूने लगता है। ऐसे दिव्य पुरुषों के प्रति स्वाभाविक रूप से माथा नमन करने के लिए झुक जाता है जो वंचित से संचित की ओर बाधाओं को सहज तरीके से पार करते चले जाते हैं।

भीमराव अपने माता-पिता की 14वीं सन्तान थे। लगभग 5-6 वर्ष की अवस्था में भीमराव की माता जी का देहान्त हो गया। यह परिस्थिति गरीबी की हालत में और अधिक कष्टकारी बन गई, परन्तु भीमराव ने हिम्मत करके हाई स्कूल में प्रवेश प्राप्त किया। सौभाग्य से उन्हें एक सुधारवादी ब्राह्मण अध्यापक, कृष्णा केशव अम्बेडकर, मिले जिन्होंने उनके नाम का अगला भाग अम्बेडकर अपने सरनेम के आधार पर स्कूल में चढ़वा दिया। अब भीमराव का उत्साह दिनोंदिन शिक्षा की तरफ लगातार बढऩे लगा। 1897 में वे बम्बई के एलपाइनस्टोन हाई स्कूल में प्रवेश करने वाले पहले दलित छात्र बने। मैट्रिक पास करने के बाद इसी संस्था के एलपाइनस्टोन महाविद्यालय में उन्होंने नाटक पाठ्यक्रम में प्रवेश किया। उनके समुदाय ने उनकी इस सफलता पर एक विशाल दावत का आयोजन किया। यह दावत भीमराव के लिए विशाल उत्साह का स्रोत बन गई। अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में डिग्री लेने के बाद वे बड़ौदा राज्य सरकार में नौकरी भी करने लगे। बड़ौदा के एक आर्य समाजी विद्वान् मास्टर आत्माराम जी के सहयोग से बड़ौदा के राजा तायाजीराव गायकवाड़ तृतीय ने उन्हें बड़ौदा सरकार की तरफ से अमेरिका जाकर अध्ययन करने के लिए प्रतिमाह पर्याप्त राशि छात्रवृत्ति की तरह देना स्वीकार किया। इस प्रकार कोलम्बिया विश्वविद्यालय में उन्होंने अर्थशास्त्र में एम.ए. करने के बाद सामाजिक दर्शन, इतिहास आदि विषयों में भी एम.ए. किया। उन्होंने प्राचीन भारतीय व्यापार और लोकतंत्र विषयों पर शोध पत्र लिखे। उन्होंने अर्थशास्त्र में पी.एच.डी. भी कर ली। इसके बाद लन्दन में रहते हुए उन्होंने भारत में जातिप्रथा पर भी एक शोध पत्र लिखा। 1916 में लन्दन से उन्होंने वकालत भी पास कर ली। वंचित वर्ग से सम्बन्धित एक आदमी ने ज्ञान का इतना संचय कर लिया, डिग्रियाँ और प्रशस्ति पत्र संचित कर लिये तो स्वाभाविक रूप से 1917 में भारत आगमन पर ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति का समाज में स्वागत निश्चित ही था। ज्ञान संचय की तीव्र इच्छा उन्हें अभी रोक नहीं पा रही है। परिणामत: वे 1921 में एक और एम.ए. करने के लिए लन्दन पहुँच गये। 1923 तक उन्होंने चार विषयों में डाक्टरेट कर ली।

वंचित से संचित का अभियान सफल तरीके से सम्पन्न करने के बाद भीमराव ने उन सभी विषयों पर सार्वजनिक रूप से कार्य प्रारम्भ कर दिया जो उसे समय के सुधारवादी आर्य समाज आन्दोलन के विषय थे। उन्होंने वेदों के गलत अर्थों के आधार पर पतित उन विचारों का घोर विरोध किया जिनमें आर्यों को विदेशी कहा जा रहा था। छूआछूत  जैसे भेदभाव विचारों का तो उन्होंने खूब डटकर विरोध किया। उनके विचारों से ब्रिटिश सरकार भी सहमत थी कि भेदभाव और छूआछूत को तो जड़ से समाप्त करना ही होगा। 1935 में बाबा साहब को बम्बई के सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानाचार्य नियुक्त किया गया। दिल्ली में सुविख्यात आर्यसमाजी नेता श्री रामजस के निधन के बाद जब उनके सुपुत्र राय केदारनाथ ने रामजस कॉलेज की स्थापना की तो उनकी मृत्यु के बाद बाबा साहब को रामजस कॉलेज का भी अध्यक्ष नियुक्त किया गया। बम्बई में बाबा साहब ने अपने निवास को 50 हजार से अधिक पुस्तकों से युक्त एक विशाल पुस्तकालय का रूप दिया।
1947 में देश के स्वतन्त्र होने की प्रक्रिया से एक वर्ष पूर्व ही संविधान के निर्माण के लिए एक संविधान सभा गठित की गई थी। भीमराव जी को इस संविधान सभा की ड्राफ्टिंग समिति का चेयरमैन बनाया गया। संविधान सभा की बैठकों के दौरान श्री भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद-370 के माध्यम से जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने का कड़ा विरोध किया था। परन्तु शेख अब्दुल्ला के कहने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने इस विषय पर जिद करते हुए कृष्ण स्वामी अयंगर के माध्यम से इसे पास करवाया। श्री भीमराव अम्बेडकर उस वक्त भारत के प्रथम कानून मंत्री थे। बाबा साहब ने संविधान सभा की बैठकों में भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता पर भी अपना खुला समर्थन प्रस्तुत किया। भारत की अर्थव्यवस्था के समुचित विकास के लिए बाबा साहब उद्योग और कृषि दोनों के समान विकास की बात करते थे। श्री अम्बेडकर के प्रयासों से ही भारत के वित्त आयोग की स्थापना 1951 में की गई थी जिसमें कम आयवर्ग के लोगों के लिए आयकर से मुक्त रखने के विचार लागू किये गये। जनसंख्या नियंत्रण पर भी बाबा साहब के स्पष्ट विचार थे कि देश के उचित विकास के लिए परिवार नियोजन के कानून बनाना अत्यन्त आवश्यक है। वे महिलाओं को भी पूर्ण समान अधिकार देने के पक्ष में थे। कुछ ताकतों ने ऐसे व्यक्तित्व के लोकसभा सदस्य बनने के मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न की। वर्ष 1990 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। मोदी सरकार ने तो उनके जीवन से सम्बन्धित तीन स्मारकों को तीर्थ स्थान घोषित किया है - महू स्थित जन्मस्थान, नागपुर का दीक्षा स्थान, मुम्बई, लन्दन और दिल्ली स्थित उनके आवास। भीमराव अम्बेडकर के नाम पर हजारों विद्वानों ने पुस्तकों की रचना की है। हजारों शोध लिखे गये हैं। कई विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की स्थापना तथा नामकरण किया गया है। यहाँ तक कि उनके जीवन को लेकर अंग्रेजी तथा भारतीय भाषाओं में अनेकों फिल्में भी तैयार की गई हैं। मेरा इस लेख के पीछे केवल एक ही उद्देश्य है कि समाज का वंचित वर्ग कभी भी यह न समझे कि गरीबी के कारण हमारी उन्नति के मार्ग बन्द हैं। यदि आपके अन्दर इच्छा शक्ति है तो आपके मार्ग भी खुलेंगे और उस मार्ग पर आपको कई सहायक भी दिखाई देंगे। आवश्यकता तो केवल इस बात की है कि आप अपने संकल्प को कमजोर न होने दें और किसी भी बाधा का डटकर मुकाबला करने के लिए सदैव तैयार रहें। जहाँ बाबा साहब जैसा संकल्प वहाँ सफलता। 

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