जहां हिन्दू अल्पसंख्यक हैं

भाजपा नेता और वकील अश्वनी शर्मा ने देश के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मांग की थी कि देश में जिन 8 प्रदेशों में हिन्दुओं की संख्या कम या बहुत कम है, वहां हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए ताकि हिन्दू भी अन्य अल्पसंख्यकों की तरह सुविधाओं का लाभ ले सकें। उपाध्याय ने 2017 में आठ राज्यों (2011 की जनगणना आंकड़ों के मुताबिक पंजाब, लक्षद्वीप, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर) में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बताते हुए राज्यवार अल्पसंख्यकों की पहचान करने की मांग संबंधी याचिका दाखिल की थी।
उपरोक्त याचिका पर आदेश देते हुए न्यायालय ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को हिन्दुओं को अल्पसंख्यक मांग करने वाले ज्ञापन पर तीन माह में निर्णय लेने को कहा है। दायर याचिका में यह मांगा गया है द्य राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2 (सी) रद हो। द्य सिख, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, पारसी को अल्पसंख्यक बताने वाली 23 अक्टूबर 1993 की अधिसूचना रद हो। अल्पसंख्यकों की परिभाषा और पहचान के दिशानिर्देश तय हों।

कटु सत्य यह है कि जिस प्रदेश में हिन्दू अल्पमत में है वहां उन पर दबाव भी अधिक है और देश विरोधी ताकतें भी वहीं अधिक सक्रिय हैं। स्तंभकार शंकर शरण ने उपरोक्त समस्या की गंभीरता को समझते हुए अपने एक लेख में लिखा है कि भारत में यह ऐसी समस्या है जिससे तमाम अन्य समस्याएं जुड़ी हैं। उपनिषद की भाषा में कहें तो इसके समाधान में हमारी कई जटिल समस्याओं के समाधान की कुंजी है। पर सत्ता के सभी अंग इस पर खुलकर सोचने से बचते हैं जबकि देश का जनमत चाहता है कि 'अल्पसंख्यक' और 'बहुसंख्यक' की परिभाषा तथा विकृति से जुड़ी कानूनी विषमता दूर होनी चाहिए, क्योंकि इसी अस्पष्टता की आड़ में यहां विभिन्न दल, देसी-विदेशी संगठन और एक्टिविस्ट भारी गड़बड़ करते रहे हैं। ऐसा न तो दुनिया में अन्य किसी देश में है, न ही यह हमारे मूल संविधान में था।

समकालीन विमर्श में अल्पसंख्यक शब्द का आशय संकीर्ण हो चला है। जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता वाली समिति ने सरकारी दस्तावेज में 'अल्पसंख्यक' और 'मुसलमान' शब्दों को एक दूसरे के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किया था। ऐसी समझ मूल संविधान की नहीं थी। फिर भी पिछली संप्रग सरकार ने इसकी अनदेखी कर सच्चर समिति की अनुशंसाएं लागू करने का फैसला किया। ऐसे नजरिये ने देश में दो प्रकार के नागरिक बना दिए हैं जिससे 'कानून के समक्ष समानता' का संवैधानिक पहलू गौण हो गया है। कुछ वर्ष पहले पश्चिम बंगाल के शीर्ष पुलिस अधिकारी ने बेधड़क कहा था कि वह समुदाय को देखकर ही हिंसा संबंधी घटनाओं पर कार्रवाई करते या नहीं करते हैं। राजनीतिक बिरादरी की भी यही स्थिति है। इससे नागरिक समानता का मखौल उड़ता है। यह सब 'अल्पसंख्यक' शब्द को कानूनी तौर पर अस्पष्ट छोड़ देने से ही हुआ। यह भी अभूतपूर्व स्थिति है कि किसी देश में अल्पसंख्यक को वह अधिकार मिलें जो बहुसंख्यक को नहीं हैं। पश्चिमी लोकतंत्रों में 'माइनॉरिटी प्रोटेक्शनÓका लक्ष्य होता है कि किसी के अल्पसंख्यक होने के कारण उसे किसी अधिकार से वंचित न रहना पड़े जो दूसरों को सहज प्राप्त हैं। भारत में इस अवधारणा को ही उलट दिया गया है जहां अल्पसंख्यकों के लिए विशेषाधिकारों की बात होती है। यह विकृति भारत में नागरिकों को दो किस्मों में बांट देती है। एक वे जिसके पास दोहरे अधिकार हैं और दूसरे वे जिन्हें एक ही तरह के अधिकार हैं जो पहले के पास भी हैं। यह हमारे देश और समाज के लिए घातक साबित हुआ है जो समाज के कई वर्गों में जहर घोल रहा है।

यहां कोई मुस्लिम या ईसाई व्यक्ति भारतीय नागरिक और अल्पसंख्यक, दोनों रूपों में अधिकार रखता है, किंतु एक हिन्दू केवल नागरिक के रूप में। बतौर हिन्दू वह अदालत से कुछ नहीं मांग सकता, क्योंकि संविधान में हिन्दू या बहुसंख्यक जैसी कोई मान्यता ही नहीं है। नि:संदेह, हमारे संविधान निर्माताओं का यह आशय नहीं था, किंतु कुछ बिंदुओं पर ऐसी रिक्तता और अंतर्विरोध के कारण आज यह दुष्परिणाम देखना पड़ रहा है। जैसे, संविधान की धारा 29 अल्पसंख्यक के संदर्भ में धर्म, नस्ल, जाति और भाषा, यह चार आधार देती है। जबकि धारा 30 में केवल धर्म और भाषा का उल्लेख है। तब अल्पसंख्यक की पहचान किन आधारों पर हो? यह अनुत्तरित है। अत: जब तक इसे स्पष्ट न किया जाए, तब तक 'अल्पसंख्यक' नाम पर होने वाले सारे कृत्य अनुचित हैं। यह न केवल सामान्य बुद्धि, विवेक एवं न्यायिक दृष्टिकोण, बल्कि संवैधानिक भावना से भी अनुचित हैं।

आज अल्पसंख्यकों के नाम पर जारी मनमानियां संविधान निर्माताओं के लिए अकल्पनीय थीं। वे सभी के लिए समान अधिकारों के हिमायती थे। चूंकि संविधान में अल्पसंख्यकों की परिभाषा अधूरी रह गई जिसका दुरुपयोग कर नेताओं ने अपने हित साधने शुरू कर दिए। यह अन्याय मूलत:सत्ता की ताकत और लोगों की अज्ञानता के कारण होता रहा। ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि एक मूल प्रश्न पूरी तरह और आरंभ से ही उपेक्षित है कि बहुसंख्यक कौन है? ऐसे में अल्पसंख्यक की धारणा ही असंभव हो जाती है, क्योंकि 'अल्प' और 'बहु' तुलनात्मक अवधारणाएं हैं। एक के बिना दूसरा नहीं हो सकता।

इसका सबसे सरल और निर्विवाद समाधान यह है कि संसद में एक विधेयक पारित कर वैधानिक अस्पष्टता दूर कर दी जाए। यह घोषित किया जाए कि संविधान की धारा 25 से 30 में वर्णित अधिकार सभी समुदायों के लिए समान रूप से सुनिश्चित करने के लिए दिए गए थे। यही उनका आशय है। ऐसी कानूनी व्यवस्था से किसी अल्पसंख्यक का कुछ नहीं छिनेगा, बल्कि दूसरों को उनका वह हक मिल जाएगा जो उनसे सियासी छल करके छीन लिया गया। 

समय की मांग है कि अल्पसंख्यक शब्द को जल्द-से-जल्द परिभाषित किया जा सके ताकि सभी भारतीयों को एक समान अधिकार मिल सके।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।