जब कश्मीर पर पाक का आक्रमण हुआ

02:43 PM Aug 12, 2019 |

बापू कहते थे पाकिस्तानी आक्रमण से भयभीत लोग बड़ी संख्या में शरणार्थी बनकर जम्मू आ गए। मुझे लगता है कि घाटी के लोगों को कोई भगवान का श्राप ही मिला हुआ है जो आज तक भोग रहे हैं। उस समय भी वे लोग शरणार्थी थे और कई साल बीत जाने के बाद आज भी शरणार्थी ही हैं। कुछ लोगों को वहां से कई शहरों में ले जाया गया। इसी राजनीति के चलते शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री की कुर्सी हथियाने में कामयाब हो गए। जब पहली बार मैंने कहानी सुनी थी तो मुझे याद है मैंने बापू से कहा था, 'बस बापू ! तो बापू ने कहा था कि पुत्तर, यहीं बस हो जाती तो सब्र का घूंट पिया जा सकता था लेकिन कहर तो इसके बाद बरपा। मेरी फिर जिज्ञासा बढ़ गई थी और मेरे मुंह से अचानक निकला था, 'कहर ?Ó बापू ने फिर कहा था, 'हां पुत्तर, वह कहर ही तो था जब 27 अक्तूबर, 1947 को रियासत कश्मीर का भारत के साथ विलय हो गया। मार्च 1948 को मेहर चंद महाजन के स्थान पर शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री बना दिया गया। कश्मीर का प्रधानमंत्री पद त्यागने के बाद जस्टिस महाजन को 1 अक्तूबर, 1948 को भारत की फैडरल कोर्ट का जज नियुक्त किया गया। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट का गठन होने के बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। 4 जनवरी, 1954 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस का पद संभाला और 23 दिसंबर, 1954 में इस पद से सेवा मुक्त हो गए। कहते हैं न कुर्सी मिलते ही नजरें फिर जाती हैं। ऐसा ही कुछ शेख अब्दुल्ला के साथ भी हुआ। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद उसने अपनी घिनौनी चालें चलनी शुरू कर दीं। वर्ष 1951-52 में उन्होंने रियासत में प्रवेश पाने के लिए परमिट आवश्यक कर दिया जो पठानकोट में तहसीलदार के दफ्तर से उपलब्ध होता था। बेहडिय़ां पत्तन तथा माधोपुर पर बनी पुलिस चौकी में परमिट चैक किए जाते थे। बापू उदास होकर कई बार कहते, 'कोढ़ पर खुजली उस वक्त छिड़़ी जब 17 अक्टूबर, 1949 को संसद की मर्जी से संविधान में अस्थाई रूप से संशोधन करके रियासत-ए-कश्मीर को धारा 370 के अंतर्गत विशेष दर्जा प्रदान कर दिया गया। हालांकि इस धारा को लागू करने के समय कई लोगों ने काफी हो-हल्ला किया लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाली बात। इसके बनते ही रियासत में अलग प्रधान एवं विधान तथा अलग ध्वज लागू कर दिया गया लेकिन सारे विरोधों के बावजूद प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला इस राष्ट्र विरोधी चाल में एक कामयाब मोहरा बनकर उभरा।Ó फिर बापू कहता, 'जब भारत स्वतंत्र हुआ तो 1951 में भारतीय जनसंघ पार्टी का जन्म हुआ जिसमें दीन दयाल उपाध्याय, सुंदर सिंह भंडारी, अटल बिहारी वाजपेयी, नाना जी देशमुख, जगन्ननाथ राव तथा कुशाभाऊ ठाकरे जैसे बड़े नेता शामिल थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इस पार्टी का प्रधान नियुक्त किया गया। जैसे ही वह प्रधान पद पर आए तो उन्होंने आते ही सरकार को इन सवालों से घेरते हुए कहा कि एक ही देश में दो निशान, दो प्रधान एवं दो विधान नहीं हो सकते। उस वक्त जम्मू-कश्मीर की प्रजा परिषद पार्टी इसके खिलाफ पहले ही आंदोलन चला रही थी। कानपुर में जनसंघ का एक अधिवेशन चल रहा था उसमें जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए लागू परमिट सिस्टम धारा 370 के खिलाफ प्रजा परिषद पार्टी द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा कर दी गई। देखते ही देखते 5 मार्च, 1953 को भारतीय जनसंघ उसमें पूरी तरह से कूद पड़ा और उसे चैलेंज के रूप में लिया और कहा कि यह तो बिल्कुल ही ना-इंसाफी है। अपने ही घर में रहते हुए अपने ही घर में अंदर जाने के लिए क्या किसी से इजाजत लेने की ज़रूरत पड़ेगी? आंदोलन की जड़ें मजबूत करने के लिए दो केंद्र बनाए गए जिनमें पठानकोट और दिल्ली शामिल थे। पांच मार्च को दिल्ली में भारतीय जनसंघ के प्रधान डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा पठानकोट में बिशनदास शर्मा, छज्जू राम गुप्ता एवं जैकार ने अपनी-अपनी गिरफ्तारी दी।

दिल्ली में तो डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उसी दिन छोड़ दिया गया किन्तु पठानकोट में गिरफ्तार किए गए लोगों को पहले तो गुरदासपुर जेल में बाद में योल की जेल में भेज दिया गया लेकिन जेल से छूटते ही डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सरकार को ललकारते हुए कहा कि कोई कुछ भी कर ले मैं अब्दुल्ला सरकार के प्रतिबंधों को तोड़कर बिना परमिट कश्मीर में प्रवेश करूंगा।Ó फिर बापू कहते, 'ऐसे होते हैं देश पर मर-मिटने वाले लोग। उनको अपनी सुख-सुविधा से कोई लेना-देना नहीं होता। सच भले ही देर से लोगों के सामने आए लेकिन आता ज़रूर है।Ó बापू कहते-कहते कभी-कभार रोने भी लगते और रोते-रोते ही कहते कि कभी किसी की कुर्बानी जाया नहीं जाती। ऐसे ही डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 9 मई, 1953 को रेल द्वारा अमृतसर पहुंचे। अमृतसर में उन्होंने एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए कहा, 'मैं कश्मीर जा रहा हूं और नहीं जानता कि वहां से जिंदा लौटूंगा या नहीं।Ó अमृतसर से चलकर वह 11 मई को पठानकोट पहुंचे। कुछ समय विश्राम करने के बाद जत्थे के साथ माधोपुर की तरफ रवाना हो गए। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र वीर अर्जुन के संवाददाता के तौर पर डा. मुखर्जी की कवरेज करने के लिए साथ आए हुए थे।


कहते हैं कि माधोपुर पुल के मध्य में पहुंचने पर कश्मीर पुलिस ने डा. मुखर्जी को बिना परमिट घुसने के लिए गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के तुरंत बाद डा. मुखर्जी ने वाजपेयी से कहा था, अटल जी, जाओ और यह पूरे हिंदोस्तान की जनता को बता दो कि मैंने बिना परमिट कश्मीर में प्रवेश कर लिया है।Ó इस बात के बाद तो बापू चुप ही कर जाता। जब मैं कई बार पूछता तो बापू अपनी ऐनक उतार लेता और आंखें बंद करके कहता, 'बस वही मुखर्जी की जि़ंदगी के लिए सबसे काला दिन बनकर आया और हिंदुस्तान वासियों के लिए सुनहरा काल।Ó मैं फिर उत्सुकता से कहता कि बापू वह कैसे? तो बापू कहता, 'सुना है कि डा. मुखर्जी को गिरफ्तार करके श्रीनगर के निकट एक पहाड़ी पर बने एक बंगले में कैद करके रखा था लेकिन 23 जून, 1954 को लोगों के घरों में दीपक नहीं जले, किसी ने खाना नहीं खाया क्योंकि उस दिन यह खबर आ गई थी कि डा. मुखर्जी की मौत हो गई है। असल में यह रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया कि किन परिस्थितियों में डा. मुखर्जी की मौत हुई।Ó बात खत्म करते-करते बापू कहता, 'बात फिर वही है चाहे कान इधर से पकड़ें या उधर से मेरा मानना यही है कि देश पर जान न्यौछावर करने वाले व्यक्ति हमेशा जिंदा रहते हैं। वे कभी नहीं मरते। आज मैं जब भी जम्मू की तरफ जाता हूं तो माधोपुर के पास जाकर उस जगह पर मेरा सिर अपने आप झुक जाता है और मैं डा. मुखर्जी का कोटि-कोटि धन्यवाद करता हूं कि एक व्यक्ति की कुर्बानी से हम लोग आसानी से इधर-उधर आ-जा सकते हैं क्योंकि मुखर्जी के बलिदान के तुरंत बाद प्रवेश पाने के लिए लागू परमिट सिस्टम को खत्म कर दिया गया था।Ó बापू की सुनाई हुई कहानी तो खत्म हो गई थी लेकिन मेरे मन में आ रहा था कि ऐसी कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं। ऐसी कहानियां आगे चलकर कई कहानियों को जन्म देती हैं। कई लोगों की प्रेरणा बनती हैं तो कई लोगों को रोशनी दिखाने में कामयाब हो जाती हैं। सोचते-सोचते मेरी आंखों के सामने से राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह एवं कई क्रांतिकारियों के चेहरे घूमने लगे और मेरा दिमाग सुन्न हो गया रात की बातों ने मेरे मन पर गहरा असर छोड़ा था। हालांकि बातें पुरानी थीं लेकिन घाव छीलने के बाद वह रिसने लगा था। इसके बावजूद मैं अपनी रूटीन में उठा और अखाड़े जाने के लिए तैयार होने लगा। सारी बातों को नज़रअंदाज़ करके मैं अक्सर अखाड़े की तरफ निकल जाता हूं। आज भी ऐसा ही हुआ था। मां ने मेरी तरफ बहुत ही रहस्यमयी नज़रों से देखा था, उन नज़रों को भी नज़रअंदाज़ करके मैं अखाड़े की तरफ निकल पड़ा था।

अजय कुमार, लेखक का सम्पर्क नं 9041334567