जल ही जीवन है

जल बिन जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जल ही जीवन है, इस बात को समझते हुए भी पानी की बर्बादी जारी है। मॉनसून देरी से दस्तक दे रहा है। परिणामस्वरूप पानी की कमी और बढ़ जाएगी। चेन्नई में जल संकट बढऩे के कारण तमिलनाडु की कई बड़ी कंपनियों विशेषतया आईटी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को कहा है कि वह दफ्तर का कार्य घर से ही करें ताकि पानी की खपत कम की जा सके। कंपनियों में केवल उन कर्मचारियों को दफ्तर बुलाया जा रहा है जिनके बिना काम किसी हालत में नहीं हो सकता। इससे पहले कंपनियों ने पानी की किल्लत से निपटने के लिए टैंकरों और अन्य स्रोतों का सहारा लिया था। तमिलनाडु के आईटी कॉरीडोर के नाम से मशहूर पुराने महाबलीपुरम और सिरुसेरी आईटी पार्क की तमाम कंपिनयों ने हालांकि इसके लिए कोई लिखित आदेश नहीं दिया है लेकिन मौखिक रूप से कर्मियों से घर से काम करने को कहा है। सिंगापेरुमल इलाके की कुछ आईटी कंपनियों ने तो बाथरूम में ताला लगाना शुरू कर दिया है। अगर किसी कंपनी के दफ्तर में एक तल पर 10 बाथरूम हैं तो उनमें से आठ को बंद कर दिया गया है केवल दो ही चालू रखे हैं। पानी बचाने की मुहिम के तहत राज्य सरकार ने छोटे और मध्यम रेस्टोरेंट और होटल स्वामियों से अपने यहां प्लेटों की जगह पत्तलों का इस्तेमाल करने को कहा है। इससे बर्तन धोने का पानी बचाया जा सकेगा।

पिछले दिनों हरियाणा के मुख्यमंत्री ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया था कि राज्य में 75 प्रतिशत भू-जल खपत हो चुकी है। 22 जिलों में 10 जिलों का जमीन भू-जल स्तर बद से बदतर होता जा रहा है। पंजाब में भी धरती के नीचे का पानी घटता चला जा रहा है। चावल की फसल के कारण ही पंजाब व हरियाणा में पानी की किल्लत बढ़ती चली जा रही है। पंजाब में हर साल भूजल दो से तीन फुट तक गिर रहा है। आज हालात ये हैं कि राज्य के 141 में से 107 ब्लॉक डार्क जोन में हैं। एक दर्जन के करीब क्रिटिकल डार्क जोन में चले गए हैं। क्रिटिकल डार्क जोन में नया ट्यूबवैल लगाने पर जहां केंद्रीय भूजल बोर्ड ने पाबंदी लगा दी है, वहीं इन ब्लॉकों में उन प्रोजेक्ट्स को लगाने की भी मंजूरी नहीं दी जा रही है, जिनमें पानी की खपत ज्यादा होती है। पंजाब में 1997 तक औसतन बारिश 710 एमएम से ज्यादा होती थी, लेकिन पिछले 22 साल में एक भी साल ऐसा नहीं है जब यह आंकड़ा 700 एमएम पहुंचा हो। राज्य में गिरता भू-जल स्तर खतरे की तरफ तो इशारा कर ही रहा है, साथ ही खेती के लिए ट्यूबवैलों से किया जा रही पानी का दोहन और गांव व शहरों में तरह-तरह से हो रही पानी की बर्बादी से भी संकट खड़ा हो गया है।

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो करीब आधा देश पानी की समस्या से जूझ रहा है। मौसम में आ रही तब्दीली के कारण तापमान 45 से 50 डिग्री तक पहुंच गया है। बढ़ता तापमान और कम होता जल स्तर देश के लिए अशुभ संकेत है। भू-जल स्तर और कम न हो इसके लिए गंभीरता पूर्वक सोचने की आवश्यकता है। सरकार के साथ-साथ समाज को भी जल की बर्बादी को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। 1972 में केंद्रीय जल आयोग ने किसी क्षेत्र विशेष में सूखा पडऩे के कुछ मानक तैयार किए थे। इनके मुताबिक सूखे का पहला लक्षण यह है कि जब बरसात वार्षिक वर्षा के मान से सामान्य से पचहत्तर फीसद से कम हो। इसका दूसरा मानक है कि ऐसी स्थिति आ जाए, जिसमें तीस फीसद से कम कृषि क्षेत्र को ही सिंचित किया जा सके। इसी मानक के मद्देनजर केंद्र सरकार ने तमिलनाडु को अपनी सलाह में कहा है कि राज्य और राज्य सरकार पानी का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करें। 18, मई 2019 को केंद्र सरकार की ओर से जारी परामर्श में साफ कहा गया है कि वे पानी का प्रयोग केवल पीने के लिए ही करें। यह सलाह तब तक प्रभावी रहेगी जब तक बांधों में पुनर्भरण नहीं होता है। केंद्र ने तमिलनाडु समेत महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश को भी पानी को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है। केंद्रीय जल आयोग देश के इक्यानवें मुख्य जलाशयों में पानी की मौजूदगी और उसके भंडारण की निगरानी करता है, की ताजा रिपोर्ट के अनुसार इनमें पानी का कुल भंडारण घटकर 35.99 अरब घन मीटर रह गया है। यह उपलब्धता इन इक्यानवें मुख्य जलाशयों की कुल क्षमता का महज बाईस फीसद है। इन जलाशयों की कुल क्षमता 161.993 अरब घन मीटर है। इस तरह से देखा जाए तो इन जलाशयों में पानी लगभग 126.03 अरब घन मीटर कम हो गया है, मतलब कुल पानी का अठहत्तर फीसद कम हो गया है। इससे साफ संकेत है कि देश के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सों में पानी का संकट गहराने लगा है। हालांकि महाराष्ट्र में सत्रह जलाशय जबकि गुजरात में दस जलाशय हैं। इनकी कुल क्षमता 31.26 अरब घन मीटर है। गौरतलब है कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल यानी 3.29 करोड़ हेक्टेयर का लगभग छठवां भाग सूखा प्रभावित है। मगर पानी की प्रचुर उपलब्धता के बावजूद इसे सिंचित करना चुनौती बना हुआ है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 1947 में भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए सालाना 6,042 घन मीटर पानी उपलब्ध था, लेकिन 2011 की जनगणना के बाद पानी की उपलब्धता महज 1,545 घन मीटर रह गई है। शहरी विकास मंत्रालय ने लोकसभा में पैंतीस प्रमुख शहरों में जल आपूर्ति को लेकर आंकड़ा पेश किया था। इनमें तीस शहरों को उनकी जरूरत से कम पानी मिलने की खबर भी सामने आती है। शहरों का एक बड़ा हिस्सा भूजल का इस्तेमाल कर रहा है। नतीजतन, भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है।
भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 150 से 200 लीटर पानी की आवश्यकता रहती है। भारत में जिस तरह आबादी बढ़ रही है और तापमान भी बढ़ रहा है तथा भूजल घट रहा है। अगर जल को न संभाला गया तो प्राणीमात्र का जीना मुश्किल हो जाएगा। जल बिन जीवन की तो कल्पना ही नहीं का जा सकती। समय की मांग है कि हर व्यक्ति निजी स्तर तथा सामूहिक रूप से भी जल बचाये। समाज व सरकार को मिलकर नदियों और जंगलों को संभालना होगा। भू-जल का गिरता स्तर किसी समय बड़े शहरों का संकट माना जाता था, लेकिन अब तो ग्रामीण क्षेत्र में भी यह समस्या विकराल हो रही है। अगर आज पानी के प्रति हमारी लापरवाही और इसके संरक्षण के प्रति उदासीनता बनी रहती है तो पानी का संकट वर्तमान और भविष्य दोनों पर बुरा प्रभाव डालेगा। प्रत्येक व्यक्ति को हर स्तर पर जल की बर्बादी रोकने का संकल्प लेने की आवश्यकता है ताकि हमारी भावी पीढ़ी का जीवन सुरक्षित रहे।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।