चीन को चेतावनी

मई माह से ही लद्दाख क्षेत्र में चीन की नापाक हरकत के कारण तनाव बना हुआ है। इस तनाव को कम करने के लिए भारत ने दो टूक शब्दों में चीन को कहा था कि उसे गलवान घाटी जो कि भारत की है से पीछे हटना ही पड़ेगा। चीन ने सहमति भी जताई लेकिन विवादित जगह से पीछे हटने को आनाकानी ही करता रहा। चालबाज चीन एक तरफ बातचीत से मसले को हल करने की बात कर रहा था तो दूसरी तरफ उसने गलवान घाटी में अपने सैनिकों की संख्या भी बढ़ा दी। भारत के साथ लगती करीब 3500 किलोमीटर की सीमा पर भी अपनी सैनिक गतिविधियां तो बढ़ाई हीं साथ में पाकिस्तान व नेपाल को भी समर्थन व संरक्षण देते हुए भारत विरुद्ध सक्रिय करता रहा।

चीन की उपरोक्त नापाक हरकतों का जवाब देने के लिए मोदी सरकार ने पहले तो चीन निर्मित उत्पादों को न खरीदने के आदेश दिए फिर चीनी ऐप पर प्रतिबंध की घोषणा की। परिणामस्वरूप चीनी कंपनियों के टेंडर रद्द हो गए और गूगल ने प्रतिबंधित ऐप को बंद कर दिया है। चीन को उसको समझ आने वाली भाषा में जवाब देते हुए गत दिनों रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई रक्षा खरीद परिषद की बैठक में तीनों सेनाओं की ताकत को बढ़ाने का फैसला लिया गया। इसके तहत वायुसेना के लिए 33 लड़ाकू विमानों के साथ सेना और नौसेना के लिए लंबी दूरी की क्रूज और अस्त्र मिसाइलें खरीदने का फैसला लिया गया है। लड़ाकू जेट विमानों में मिग-29 और सुखोई-30 के बेड़े में वृद्धि की जाएगी। भारतीय सेनाओं के लिए राफेल रक्षा सौदे के बाद 38,900 करोड़ रुपये की यह सबसे बड़ी रक्षा खरीद है। इस फैसले की सबसे खास बात यह है कि करीब 31,130 करोड़ की राशि भारतीय कंपनियों और संगठनों से खरीद पर खर्च होगी। आत्मनिर्भर भारत की दिशा में यह एक बड़ा कदम है। वायुसेना के बेड़े की संख्या बढ़ाते हुए इसकी ताकत में इजाफा करने के लिए 12 सुखोई लड़ाकू फाइटर जेट हिन्दुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड से खरीदे जाएंगे। रूस के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर समझौते के तहत एचएएल देश में ही सुखोई-30 का निर्माण करता है। मौजूदा समय में यह हमारा सबसे ताकतवर लड़ाकू विमान है।

12 सुखोई विमानों की खरीद पर 10,730 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके साथ ही 21 मिग-29 लड़ाकू विमान रूस से तत्काल खरीदे जाएंगे। पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर जंग की चुनौती यानी टू फ्रंट वार को देखते हुए डीएसी ने मिग-29 विमानों के मौजूदा बेड़े में शामिल 59 लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण के प्रस्ताव पर भी मुहर लगा दी है। डीएससी रक्षा मंत्रालय की रक्षा खरीद सौदों को मंजूरी देने वाली सर्वोच्च इकाई है। 21 नये मिग-29 की खरीद और 59 के आधुनिकीकरण पर 7,418 करोड़ रुपये खर्च होंगे। चीन के साथ तनातनी के परिप्रेक्ष्य का जिक्र किए बिना रक्षा मंत्रालय ने रक्षा खरीद के इस फैसले को सही ठहराया। रक्षा मंत्रालय ने कहा कि मौजूदा हालातों को देखते हुए अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए सेनाओं को मजबूत करने की जरूरत है। सेना के मल्टी बैरल रॉकेट लांचर के साथ नौसेना और वायुसेना के लिए लंबी दूरी के लैंड अटैक क्रूज मिसाइल सिस्टम और अस्त्र मिसाइलों की खरीद होगी। इन सभी हथियारों और उपकरणों की खरीद तथा आधुनिकीकरण पर करीब 20,400 करोड़ खर्च होंगे। पिनाक सिस्टम की खरीद से इस मिसाइल का एक अतिरिक्त बेड़ा शामिल हो जाएगा। 

जल, थल और आकाश में अपने को मजबूत करते हुए अब भारत चीन को कूटनीतिक व व्यापारिक स्तर पर भी चुनौती देने लगा है। भारत की उपरोक्त नीति के कारण अमेरिका, रूस, आस्टे्रलिया, जापान, फ्रांस सभी भारत के साथ खड़े हैं और चीनी कंपनियों व उनके उत्पादों का विरोध भी कर रहे हैं। हांगकांग के मामले में भारत ने पहली बार स्पष्ट व सख्त रुख अपनाया है, जिस कारण चीन सकते में है। उपरोक्त सब तथ्य चीन को चेतावनी दे रहे हैं कि मामला गंभीर है और इसे सुलझाने के लिए चीन को ही पहल करनी होगी। इसी तनावपूर्ण स्थिति में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चीफ ऑफ डिफैंस स्टाफ बिपिन रावत और थल सेना प्रमुख नरवाणे के साथ लेह में पहुंच जाना दर्शाता है कि भारत अब चीन से जल, थल और आकाश तीनों स्तरों पर लडऩे के लिए तैयार है। मोदी के वहां पहुंचने से केवल चीन को ही नहीं चीन के शतरंजी मोहरों पाकिस्तान और नेपाल को भी स्पष्ट हो गया होगा कि अगर उन्होंने इस समय कोई नापाक हरकत की तो उन्हें भी दण्ड भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अकस्मात लेह में जाना दर्शाता है कि भारत अपनी अखण्डता और आजादी को बरकरार रखने के लिए चीन तो क्या किसी भी शैतानी ताकत से लडऩे के लिए तैयार है। मोदी सरकार ने चीन के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था लेकिन चीन ने अपनी चालबाज व धोखाधड़ी वाली नीति पर चलते हुए एक बार फिर भारत को धोखा दिया है। 1950 में जब चीन ने हमला कर तिब्बत पर कब्जा किया था उस समय के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री स. वल्लभ भाई पटेल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जो चीन से बहुत प्रभावित थे और चीन की दोस्ती पर अंधविश्वास था, को पत्र लिखकर चीन से सावधान होकर रहने की बात कही थी। स. पटेल के पत्र का अंश आपके सम्मुख रख रहा हूं- ‘हाल का कटु इतिहास हमें बताता है कि साम्राज्यवाद के खिलाफ साम्यवाद कोई ढाल नहीं है। कम्युनिस्ट भी उतने ही अच्छे या बुरे साम्राज्यवादी हो सकते हैं जितनी कोई और व्यवस्था। इस हिसाब से चीनियों की महत्वाकांक्षा सिर्फ हमारे हिमालय की ढलानों तक ही नहीं, बल्कि असम के महत्वपूर्ण हिस्सों तक पर है। चीन का उसके पड़ोसी देशों पर ऐतिहासिक दावा और कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद पश्चिमी शक्तियों के विस्तारवादी साम्राज्यवाद से बिल्कुल अलग है। चीन के इस दावे में विचारधारा का पुट मिला हुआ है जो इसे पश्चिमी साम्राज्यवाद से दसियों गुणा ज्यादा खतरनाक बनाता है। उसके वैचारिक विस्तारवाद के रूप में उसका नस्लयी, राष्ट्रीय और ऐतिहासिक विस्तारवाद का दावा छुपा हुआ है।’

पं. नेहरू ने स. पटेल के पत्र का जवाब देते हुए माना कि  तिब्बत को बचाया नहीं जा सका। फिर भी उन्होंने इस बात को अत्यंत ही असंभव तुल्य माना कि ‘चीन भारत पर हमला कर सकता है।’ नेहरू की राय में यह बिल्कुल अतार्किक था कि वह हिमालय के इस पार आक्रमण करने का दुस्साहस करे। उन्होंने कहा कि ‘ये विचार की कम्यूनिज्म का मतलब विस्तारवाद या युद्ध ही होता है या चीनी साम्यवाद का मतलब भारत की तरफ विस्तार ही है, एक हल्का विचार है।’स. पटेल ने जिस आशंका को दर्शाया था वह 1962 में भारत के सामने आई और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को मानसिक रूप से तोड़ गई। अगर पं. नेहरू स. पटेल की बात को गंभीरता से लेते तो शायद उनके पश्चात सत्ता में आई उनकी बेटी श्रीमती इंदिरा गांधी और इंदिरा के बेटे राजीव गांधी चीन प्रति सतर्क रहते और चीन से लगती 3500 किलोमीटर सीमा पर सैन्य दृष्टि से ठोस कदम समय-समय पर लेते रहते, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और अब जब मोदी सरकार के नेतृत्व में चीन के साथ लगती सीमा पर सडक़ व संचार तथा बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाया जा रहा है तो चीन को परेशानी हो रही है। चीन ने अपनी पुरानी नीति के तहत एक बार फिर घुसपैठ करने की कोशिश की तो भारत ने इस बार इतना सख्त रुख अपना लिया है कि चीन की हताशा बढ़ती चली जा रही है। विश्व स्तर पर भी चीन घिरता चला जा रहा है।

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लेह जाकर यह कहना कि ‘शांति के प्रति हमारी वचनबद्धता को हमारी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। विकास के लिए शांति और मित्रता का हर कोई पक्षधर है लेकिन यह भी सत्य है कि निर्बल शांति नहीं ला सकता।’ उन्होंने कहा, ‘वीरता शांति की पूर्व शर्त होती है। इसे देखते हुए भारत ने नभ, जल, थल और अंतरिक्ष में अपनी ताकत को बढ़ाया है और इसका उद्देश्य मानवता का कल्याण ही है।’ उन्होंने कहा कि दुनिया ने भारत के पराक्रम और शांति दोनों प्रयासों को देखा है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चीन का नाम लिए बिना प्रकट उपरोक्त भाव चीन को एक प्रकार की चेतावनी ही है कि वह भारत को हल्के में न ले। बेहतर यही है कि वह वापस अपनी अप्रैल वाली स्थिति पर चला जाए। अब गेंद चीन के पाले में है, युद्ध या शांति फैसला चीन को लेना है।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।