गांधी परिवार की भटकन

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पहले पांच दशकों को राजनीतिक रूप से नहरू-गांधी परिवार का दौर ही कहा जा सकता है। पं. जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी का तो अपना विशेष स्थान भारतीय राजनीति में रहा। इनके पश्चात राजीव और राजीव के बाद कांग्रेस में सोनिया गांधी ही सर्वेसर्वा बन गई। विदेशी होने के नाते श्रीमती सोनिया गांधी स्वयं तो प्रधानमंत्री नहीं बन सकी लेकिन स. मनमोहन सिंह को बतौर प्रधानमंत्री के 10 वर्ष सही अर्थों में सोनिया गांधी के ही थेे। मनमोहन सिंह का गांधी परिवार के प्रति समर्पण आज भी जगजाहिर है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद सम्भाला था तब से सोनिया गांधी व राहुल गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए मोदी विरोधी होने की भूमिका निभाई। विपक्ष के रूप में भी कांग्रेस गांधी परिवार के साये से बाहर नहीं निकल सकी। इसका परिणाम आज यह हुआ है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बेतुके बयानों के कारण गांधी परिवार सहित सारी कांग्रेस ही दिशा भटकती दिखाई दे रही है। गांधी परिवार कांग्रेस का केन्द्र बिन्दु है। केंद्र बिन्दु जब कमजोर पड़ जाए तो उसका प्रभाव साधारण कार्यकर्ता पर भी पड़ता है। कमजोरमनोबल वाले कार्यकर्ता के बल पर तो कोई भी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।

कांग्रेस कार्यकर्ता आज गांधी परिवार की राजनीतिक भटकन के कारण खुद उत्साहहीन हो रहा है और केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए ही बयान देता है। जहां तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की स्थिति है वह सोनिया व राहुल गांधी की छवि को उभारने या फिर उनके बचाव में ही लगे दिखाई दे रहे हैं। परिणामस्वरूप देश के जन साधारण की नजरों में गांधी परिवार के साथ-साथ कांग्रेस की छवि व साख भी कमजोर होती दिखाई दे रही है। 

चीन के पूर्वी लद्दाख में उकसाने वाले कदम को लेकर सोनिया गांधी व राहुल आए दिन जो बयान दे रहे हैं या जिस तरह वे मोदी पर निशाना साध रहे हैं उस से उनकी अपनी राजनीतिक भटकन ही दिखाई दे रही है। गांधी परिवार देश के साधारण जन की भावनाओं को समझने में असफल हो रहा है। इसी कारण वह जन साधारण की भावनाओं का सम्मान भी नहीं कर पा रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी गांधी परिवार की चापलूसी करते दिखाई दे रहे हैं। उपरोक्त के कारण जनसाधारण की नजरों में गांधी परिवार तथा कांग्रेस की साख कमजोर पड़ती जा रही है। वर्तमान स्थिति में कांग्रेस के सहयोगी राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार भी कांग्रेस को आईना दिखाते कह रहे हैं कि लद्दाख में पैदा हुए हालात को लेकर किसी को राजनीति नहीं करनी चाहिए। लद्दाख मामले में सरकार को नाकाम नहीं कहा जा सकता। मीडिया से बात करते हुए शरद पवार ने कहा कि किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि 1962 के युद्ध में चीन ने भारत की 45000 वर्ग किलो मीटर भूमि हड़प ली थी। जब शरद पवार से यह पूछा गया कि राहुल गांधी चीनी घुसपैठ को लेकर प्रधानमंत्री के सरेंडर करने की बात कह रहे हैं तो पूर्व केंद्रीय मंत्री ने इसका जवाब देते हुए कहा कि यह पूरा मामला बहुत संवेदनशील है। इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। बता दें कि पवार ने कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री की सर्वदलीय वर्चुअल बैठक में भी कांग्रेस के रुख का विरोध करते हुए ऐसा ही वक्तव्य दिया था। नरसिम्हा राव सरकार में खुद रक्षामंत्री रह चुके शरद पवार ने कहा कि लद्दाख की गलवन घाटी में हुई घटना के लिए सीधे-सीधे रक्षामंत्री को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। पवार ने कहा कि गलवन घाटी में चीन ने ही उकसाने वाला काम किया है। पूर्व रक्षामंत्री ने कहा कि गलवन घाटी में भारत अपनी सीमा में एक सड़क का निर्माण कर रहा है। चीनी सैनिक उसी सड़क पर कब्जा करना चाहतेे थे, जिन्हें बलपूर्वक खदेड़ा गया। इसे किसी की असफलता नहीं कहा जाना चाहिए। पवार अनुसार चीन के साथ युद्ध की संभावना नहीं है, लेकिन चीन ने निश्चित रूप से दुस्साहस का काम किया है। पवार ने कहा, गलवन में जिस सड़क का निर्माण हो रहा है वह हम अपनी जमीन पर कर रहे हैं। गौरतलब है कि राजीव गांधी फाउंडेशन को मिली सहायता राशि को लेकर भाजपा आक्रामक हो एक के बाद एक बयान दे रही है । और गांधी परिवार और कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं है। धरातल का सत्य यही है कि गांधी परिवार जमीनी सच को समझने में असफल हो रहा है। इस कारण गांधी परिवार की साख व छवि दिन -ब- दिन कमजोर पड़ती जा रही है। चीनी घुसपैठ को लेकर जहां सारा देश मोदी सरकार व भारतीय सेना के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। वहीं गांधी परिवार अलग-थलग पड़ रहा है। 

गांधी परिवार की भटकन देश की राजनीति में शायद परिवारवाद की राजनीति की समाप्ति की ओर इशारा कर रही है। क्या इस बात को समझते हुए कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता समय रहते गांधी परिवर का विकल्प ढूंढ पाएंगे। यही वह प्रश्न है जो उत्तर मांग रहा है।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।