Monday, September 24, 2018 05:38 AM

विश्व हिन्दू कांग्रेस

शिकागो में 1893 में विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के एतिहासिक भाषण की 125वीं वर्षगांठ की स्मृति में विश्व हिन्दू कांग्रेस के दूसरे आयोजन में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हिन्दुओं में वर्चस्व की कोई आकांक्षा नहीं है। उन्होंने हिंदू समुदाय के नेताओं से अनुरोध किया कि वे एकजुट हों और मानवता की बेहतरी के लिये काम करें। 

भागवत ने कहा, 'हम दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं। हमारी वर्चस्व स्थापित करने की कोई आकांक्षा नहीं। समूची दुनिया को एक टीम के तौर पर बदलने की कुंजी नियंत्रित अहं और सर्वसम्मति को स्वीकार करना सीखना है। उदाहरण के लिये भगवान कृष्ण और युधिष्ठिर ने कभी एक दूसरे का खंडन नहीं किया।' इस संदर्भ में उन्होंने हिंदू महाकाव्य महाभारत में युद्ध और राजनीति को इंगित करते हुए कहा च्राजनीति को ध्यान के सत्र की तरह नहीं संचालित किया जा सकता और इसे राजनीति ही रहना चाहिए। हिंदू समाज में प्रतिभावान लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन मुश्किल यह है कि समाज साथ नहीं आता। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि हिंदू हजारों सालों से पीडि़त हैैं क्योंकि उन्होंने इसके मौलिक सिद्धांतों और आध्यात्मवाद को भुला दिया। हिंदू किसी का विरोध करने के लिये नहीं जीते। हम कीड़ों को भी जीने देते हैं। विरोधी भी हैं। आपको उन्हें नुकसान पहुंचाए बिना उनसे निपटना होगा।

हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व को लेकर कई प्रकार के भ्रम और भ्रांतियां हिन्दुत्व विरोधियों द्वारा देश तथा विदेश में फैलाई जा रही हैं जो केवल एक ही धार्मिक पुस्तक को पूजते हैं। वह तो हिन्दुओं के पीछे लठ लेके घूमते दिखाई देते हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत ठीक कह रहे हैं कि हिन्दुओं ने कभी बल के आधार पर अपना वर्चस्व बनाने की कोशिश नहीं की। हिन्दू तो कण-कण में भगवान को देखता है। नर में नारायण देखने वाले हिन्दुओं विरुद्ध  विश्व के अन्य धर्मों को मानने वालों द्वारा जो भ्रम व भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं उनको भी हिन्दू समाज गंभीरता से नहीं ले रहा। क्योंकि समाज विभाजित है। युगों से चले आ रहे हिन्दू समाज में समय के साथ एक नहीं अनेक कुरीतियों ने घर कर लिया है जिसके परिणामस्वरूप समाज, जाति, संप्रदाय, भाषा तथा क्षेत्र के नाम पर विभाजित हो गया। आज आजादी के 70 वर्ष बाद हिन्दू को एकजुट हो मिल रही चुनौतियों का सामना करना होगा। आज लोकतंत्र का युग है। वह मतदान द्वारा ही अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर सकता है। यही बात संघ प्रमुख मोहन भागवत कह रहे हैं। हिन्दू समाज की सबसे बड़ी कमजोरी उसका एकजुट न होना ही है। क्षेत्र, भाषा, जाति के आधार पर विभाजित हिन्दू समाज को अगर एकजुट होना है तो दशकों पहले डॉ. अंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने से पहले दिए भाषण में हिन्दू समाज से पूछे प्रश्नों और दिए सुझाव पर आज संघ तथा समाज को गंभीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा था च्मैंने आपका बहुत समय लिया, अब समय आ गया है जबकि यह सम्बोधन समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि विषयवस्तु की दृष्टि से अब कुछ कहना शेष नहीं रहा। परन्तु यह संबोधन सम्भवत: हिन्दुओं के सामने मेरा अन्तिम संबोधन होगा, और चूंकि इसका विषय हिन्दुओं की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, इसलिए संबोधन समाप्त करने के पूर्व यदि वे पसन्द करें, तो मैं उनके सामने कुछ ऐसे प्रश्न रखना चाहूँगा, जो मेरी दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं तथा जिन पर गम्भीरता-पूर्वक विचार करने के लिए लोगों को आमंत्रित करता हूँ।

पहली बात तो यह है कि हिन्दुओं को विचार करना चाहिए कि क्या मानव विज्ञानियों की इस सुलझी हुई राय को काफी मान लें कि उन आस्थाओं, आदतों, नैतिकताओं और जीवन के संदर्भ में, नजरिये के विषय में कुछ भी नहीं कहा जाना चाहिए, जिनको विश्वभर के विभिन्न समाज अपनाते हैं और जो अक्सर भिन्नता लिये होते हैं? क्या यह जानने का प्रयास आवश्यक नहीं है कि किस प्रकार की नैतिकता, आस्थाओं, आदतों और जीवन के नजरिये मानव हित में सर्वोपरि रहे हैं और किनकी सहायता से लोग और दुनिया मजबूत हुई है, पनपी है और जिसका दुनियाभर के लोगों पर वर्चस्व रहा है।
अब दूसरी बात को लें। हिन्दू समाज को विचार करना चाहिए कि क्या उन्हें अपनी पूरी सामाजिक परम्परा को बचाकर रखना है या केवल कुछ ऐसी परम्पराओं को, जो सहायक हों, चुनकर आने वाली पीढिय़ों को सौंप देना है न उससे कम, न अधिक? मेरे गुरु, जिनका मैं ऋणी हूँ, उन्होंने कहा कि ''प्रत्येक समाज को, ऐसी मृत और विकृत हो गई तुच्छ वस्तुओं को वहन करना पड़ता है। किसी समाज में ज्ञान की वृद्धि के साथ इस बात का भान होता है कि अपनी सारी उपलब्धियों को बचाकर उस का तस भावी पीढिय़ों को सौंपना ठीक नहीं। केवल ऐसी उपलब्धियों के लिए यह उचित होगा जिनसे भावी समाज बेहतर हो सके।'' फ्रांसीसी क्रान्ति को ठोस आधार प्रदान करने वाले परिवर्तन के सिद्धान्तों के घोर विरोध के बावजूद बर्क यह मानने के लिए बाध्य हुआ, ''परिवर्तन के साधनों से वंचित समाज में संरक्षण की गुंजाइश नहीं होती। ऐसे साधनों की कमी से समाज को संविधान के ऐसे भाग को खोने का खतरा है जिसको वह किसी भी कीमत पर बचाना चाहता है।'' राज्य के बारे में तर्क की राय समाज पर भी लागू होती है।
तीसरी बात यह है कि हिन्दू समाज विचार करे कि क्या उन्हें अपने आदर्श मुहैया करने वाली, अतीत पूजा को बन्द नहीं कर देना चाहिए? और अब चौथी बात यह है कि हिन्दुओं के लिए विचारणीय है कि क्या वह समय नहीं आ गया जब उन्हें समझना चाहिए कि कुछ भी स्थिर नहीं है, कुछ भी शाश्वत् नहीं है, कुछ भी सनातन नहीं है, हर चीज बदल रही है?

स्वामी विवेकानंद ने हिन्दू समाज को आवाहन करते हुए कहा था, च्जाओ, जाओ, तुम सब लोग वहाँ जाओ, जहाँ प्लेग फैला हो, जहाँ दुर्भिक्ष काले बादल की भाँति छा गया हो, जहाँ लोग दु:ख-कष्ट के भार से पीडि़त हों, और जाकर उनका दु:ख हलका करो। अधिक से अधिक क्या होगा?-यही न कि इस प्रयत्न में तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी? पर उससे क्या? तुम्हारे समान कितने ही लोग कीड़ों की भाँति प्रति दिन जन्म ले रहे हैं और मरते जा रहे हैं! इससे इस बड़ी दुनिया का भला कौनसा टोटा हो जाता है? तुम्हें मरना तो होगा ही, तो फिर एक महान् आदर्श लेकर क्यों न मरो? जीवन में एक महान् आदर्श लेकर मर जाना कहीं बेहतर है। द्वार-द्वार जाकर इस आदर्श का प्रचार करो, और इससे तुम्हारी अपनी उन्नति तो होगी ही, साथ ही तुम अपने देश का भी कल्याण करोगे। तुम्हीं पर हमारे देश का भविष्य निर्भर है-उसकी भावी आशाएँ केन्द्रित है। उठो! उठो! काम में लग जाओ-हाँ, काम में लग जाओ! शीघ्र, शीघ्र! इधर-उधर मत देखो-समय मत खोओ, दिन पर दिन काल तुम्हारे अधिकाधिक निकट आता जा रहा है! यह सोचकर निठल्ले बने मत बैठे रहो कि समय आने पर सब कुछ हो जाएगा। ध्यान रखो, ऐसा करने से कुछ भी न हो सकेगा।

वत्स! कोई भी मनुष्य, कोई भी राष्ट्र दूसरे से घृणा करके नहीं जी सकता। भारत का भाग्यसितारा तो उसी दिन अस्त हो गया, जिस दिन उसने म्लेच्छ शब्द का आविष्कार किया और दूसरों के साथ मेल-जोल बन्द कर दिया।

ऐ नवयुवको, मैं गीरबों, मूर्खों और उत्पीडि़तों के लिए इस सहानुभूति और अथक प्रयत्न को थाती के तौर पर तुम्हें सौंपता हूँ। जाओ, इसी क्षण जाओ उस पार्थसारथि के मन्दिर में, जो गोकुल में दीनदरिद्र ग्वालों के सखा थे, जो गृहक चण्डाल को भी गले लगाने में नहीं हिचके, जिन्होंने अपने बुद्ध-अवतार में अमीरों का न्योता अस्वीकार कर एक वारांगना का न्योता स्वीकार किया और उसे उबारा; जाओ उनके पास, जाकर साष्टांग प्रणाम करो और उनके सम्मुख एक महाबलि दो, अपने जीवन की बलि दो-उन दीन, पतित और उत्पीडि़तों के लिए, जिनके लिए भगवान् युग युग में अवतार लिया करते हैं और जिन्हें वे सब से अधिक प्यार करते हैं।

मृत व्यक्ति फिर से नहीं जीता! बीती हुई रात फिर से नहीं आती; नदी की उतरी बाढ़ फिर से नहीं लौटती ; जीवात्मा दो बार एक ही देह धारण नहीं करता। अत: हे मनुष्यो, अतीत की पूजा करने के बदले हम तुम्हें वर्तमान की पूजा के लिए पुकारते हैं; बीती हुई बातों पर माथापच्ची करने के बदले हम तुम्हें प्रस्तुत प्रयत्न के लिए बुलाते हैं; मिटे हुए मार्ग के खोजने में वृथा शक्ति-क्षय करने के बदले अभी बनायेे हुए प्रशस्त और सन्निकट पथ पर चलने के लिए आह्वान करते हैं। बुद्धिमान् समझ लो!

एक बार फिर से अपने में सच्ची श्रद्धा की भावना लानी होगी, आत्मविश्वास को पुन: जगाना होगा, तभी हम उन सारी समस्याओं को धीरे-धीरे सुलझा सकेंगे, जो आज हमारे देश के सामने हैं। 

हिन्दू समाज स्वामी विवेकानंद की वाणी पर अमल करते हुए जाति, भेद से ऊपर उठकर तथा अतीत की जगह वर्तमान को प्राथमिकता देता हुआ मातृभूमि के लिए कर्म करना शुरू कर देगा तो फिर हिन्दू धर्म व हिन्दुत्व को लेकर जो भ्रम व भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं वे स्वयमेव समाप्त हो जाएंगी। विश्व हिन्दू कांग्रेस के आयोजन भी तभी सफल होगा जब हम परमार्थ की राह पर चल समाज की सेवा करेंगे।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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