धारा 35-ए की वैधता

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 के साथ जुड़ी धारा 35 ए की वैधता को लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय में बहस चल रही है। 35-ए की वैधता को दी चुनौती की अगली सुनवाई 27 अगस्त को है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा है कि शीर्ष अदालत को यह विचार करना होगा कि क्या अनुच्छेद 35-ए संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ है। जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को विशेष अधिकार और सुविधाएं प्रदान करने वाला अनुच्छेद-35-ए राष्ट्रपति के आदेश से 1954 में संविधान में शामिल किया गया था। यह अनुच्छेद राज्य के बाहर के लोगों पर इस राज्य में कोई भी अचल सम्पत्ति हासिल करने पर प्रतिबंध लगाता है। इसी तरह, यह अनुच्छेद राज्य के बाहर के किसी व्यक्ति से विवाह करने वाली महिला को सम्पत्ति के अधिकारों से वंचित करता है। संपत्ति पर अपना अधिकार खोने वाली महिला के उत्तराधिकारियों पर भी यह प्रावधान लागू होता है। प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की, एक बार जब आपने अनुच्छेद 35-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दे दी है तो इसे संविधान पीठ के समक्ष ही जाना होगा। इसका निश्चय तीन न्यायाधीशों का पीठ करेगा। 

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, तीन न्यायाधीशों का पीठ ही इस बारे में विचार करेगा कि क्या इसे संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर ने राज्य में होने वाले स्थानीय निकायों के चुनावों को ध्यान में रखते हुए तीन अगस्त को एक अर्जी दायर कर अनुच्छेद 35-ए की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया था। अनुच्छेद 35-ए की वैधता को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं के वकील ने सुनवाई स्थगित कराने के राज्य सरकार के कदम का विरोध किया। राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव सितंबर में होने की संभावना है। राज्य को प्राप्त विशेष दर्जा बरकरार रखने के पक्ष में अनेक लोगों और समूहों ने भी अनुच्छेद 35-ए के समर्थन में आवेदन दायर किए हैं। शीर्ष अदालत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने संबंधी अनुच्छेद 35-ए को निरस्त करने के लिए दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। नेशनल कांफ्रेंस और माक्र्सवादी पार्टी सहित कई राजनीतिक दलों ने विशेष अधिकार और सुविधाओं के लिए स्थाई निवासी को परिभाषित करने का अधिकार राज्य विधानसभा को प्रदान करने वाले अनुच्छेद 35-ए का समर्थन करते हुए शीर्ष अदालत में आवेदन दायर किए हैं। 

नेशनल कांफ्रेंस ने शीर्ष अदालत में तर्क दिया है कि यह अनुच्छेद राज्य और केंद्र और जनता के बीच महत्त्वपूर्ण संपर्क है और यह संविधानिक संघीय व्यवस्था में बेहतरीन संतुलन बनाता है। अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने 14 मई को शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि अनुच्छेद 35-ए से संबंधित संवेदनशील मुद्दों पर केंद्र के वार्ताकार सभी पक्षों से बात कर रहे हैं। शीर्ष अदालत ने पिछले साल 14 अगस्त को कहा था कि संविधान पीठ इस पर विचार कर सकता है कि क्या अनुच्छेद 35-ए लैंगिक विभेद और संविधान के बुुनियादी ढांचे का उल्लंघन करता है। 

न्यायालय ने कश्मीर निवासी चारु वली खन्ना की याचिका पर सुनवाई के दौरान संकेत दिया था कि यदि इस अनुच्छेद से संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन होता है तो इसे पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास विचार के लिए भेजा जा सकता है। राज्य सरकार ने इससे पहले कहा था कि उच्च न्यायालय का पूर्ण पीठ 2002 में ही इस मुद्दे को पहली नजर में सुलझा चुका है। इस मामले में उच्च न्यायालय ने बहुमत के फैसले में कहा था कि जम्मू-कश्मीर के स्थाई निवासी की बेटी अगर गैर स्थाई निवासी से विवाह करती है तो उसका स्थाई निवासी का दर्जा खत्म नहीं होगा।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डा. फारुक अब्दुल्ला ने कहा है कि केंद्र सरकार पर अनुच्छेद 35-ए के बहाने राजनीति कर केवल राज्य लोगों को परेशानियों में डालना चाहते हैं लेकिन हम इस अनुच्छेद में किसी प्रकार का बदलाव नहीं होने देंगे। फारुक ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ भी यह कह चुकी है कि केंद्र सरकार 35-ए में किसी प्रकार का बदलाव नहीं कर सकती। मीडिया से बात करते हुए फारुक ने कहा कि जब तक मैं जिंदा रहूंगा सरकार के इस मनमाने रवैये के खिलाफ संघर्ष करता रहूंगा। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त है। इससे लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं लेकिन केंद्र सरकार इस मामले पर राजनीति कर सियासी रोटियां सेकने के प्रयास में है। मौजूदा समय में इस अनुच्छेद को लेकर देश में सियासी माहौल गर्म है।

वरिष्ठ भाजपा नेता एवं प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्य मंत्री डा. जितेन्द्र सिंह ने कहा है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35-ए की गलत व्याख्या कर जम्मू-कश्मीर के युवाओं को गुमराह करना दुर्भाग्यपूर्ण है, जबकि सच्चाई तो यह है कि इस अनुच्छेद के समाप्त होने से जम्मू-कश्मीर को फायदा होगा। डा. जितेन्द्र सिंह ने कहा है कि तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा इस अनुच्छेद को संसद की मंजूरी लिए बिना राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से संविधान में शामिल किया गया था, इसलिए इसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना है, लेकिन न्यायालय का निर्णय आने से पहले ही 35-ए को लेकर जम्मू-कश्मीर में जो माहौल बनाया जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि वैसे तो हम सब बराबरी की बात करते हैं, लेकिन अनुच्छेद 35-ए के माध्यम से जम्मू-कश्मीर की महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किया गया है। इसके चलते बहन-भाई के बीच संपत्ति विवाद होने की नौबत आ गई है। 

जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन अपनी पुस्तक कश्मीर समस्या और समाधान में धारा 370 और उससे संबंधित प्रावधानों को लेकर लिखते हैं कि स्पष्ट है कि धारा 370 और उससे संबद्ध प्रावधानों और जम्मू-कश्मीर के पृथक संविधान को अवश्य ही समाप्त कर देना चाहिए। केवल इसलिए नहीं कि ऐसा करना कानूनी और संवैधानिक रूप से सम्भव है वरन् इसलिए भी कि हमारे पिछले इतिहास और वर्तमान जीवन की मूल और विस्तृत आवश्यकता की महत्त्वपूर्ण पूर्ति के लिए यह जरूरी है। इस धारा तथा इससे संबंधित प्रावधानों को समाप्त करने की आवश्यकता है। यह असमानता तथा अन्याय को बनाये रखने का साधन बना हुआ है। यह भ्रष्ट कुलीनतंत्र के विकास और उसके बने रहने को सुविधाएं देना है। यह रूढि़वादी और पक्षपातपूर्ण शक्तियों को जीवित रखता तथा बढ़ावा देता है। यह दो राष्ट्रों के सिद्धान्त को परोक्ष रूप से मान्यता देता है। यह अलगाववादी भावनाओं को जन्म देने के केंद्र के रूप में कार्य करता है। यह युवाओं के मस्तिष्क में झूठी धारणायें भरता और संकीर्ण भावनायें तथा संकुचित वफादारी पैदा करता है। यह क्षेत्रीय तनावों और संघर्षों को उठाता है और उपलब्ध स्वायत्तता को भी क्रियात्मक रूप में अनुपलब्ध बना देता है। इस धारा के बिना भी कश्मीर का विशिष्ट व्यक्तित्व तथा सांस्कृतिक अस्मिता की सुरक्षा की जी सकती है। यह सामाजिक रूप से पतनोन्मुखी है और ऐसी स्थितियां पैदा कर देता है जिसमें स्त्रियां राज्य के बाहरी व्यक्ति से विवाह करने पर अपने अधिकार खो देती है और जो लोग राज्य में चालीस वर्षों से भी अधिक समय से रह रहे हैं उन्हें प्राथमिक मानवीय और जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित करता है। और इन सबसे अधिक वह भारत के विशाल और विभिन्न विस्तार तथा उसकी आवश्यकताओं एवं वास्तविकताओं के अनुकूल नहीं है।

इसी पुस्तक में जगमोहन लिखते हैं कि अगर 370 की तीव्रता को कम करने के लिए 35-ए को रद्द कर के ही किया जा सकता है यदि रद्द हो जाती है तो धारा 19(1) ई.जी. वहां लागू की जा सकती है। इस धारा के तहत ही भारत के हर नागरिक को भारत के किसी भी क्षेत्र में रहने और बसने का अधिकार है तथा वह कोई भी पेशा, व्यवसाय और व्यापार कर सकेगा। गौरतलब है कि भारतीय संविधान 35-ए राष्ट्रपति के आदेश द्वारा 1954 में लागू किया गया था। इसके तहत ही राज्य के स्थायी निवासी को परिभाषित करने का अधिकार मिला था, इसी कारण ही पश्चिमी पाकिस्तान से 1947 में आये शरणार्थी आज वहां न्याय पाने को संघर्षरत है। 

समय आ गया है कि धारा 370 और विशेषतया 35-ए को लेकर स्थिति स्पष्ट हो ताकि भावी पीढिय़ों के भविष्य से वहां खिलवाड़ न हो सके। 

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।