Friday, May 24, 2019 01:17 AM

चुनावी चंदे में पारदर्शिता

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लेकिन चुनावों में बढ़ता धनबल और बाहुबल भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का कमजोर पक्ष भी है। चुनाव आयोग को तमिलनाडु की वेल्लौर लोकसभा सीट का चुनाव रद्द करना पड़ा क्योंकि यहां डीएमके के उम्मीदवार कदीर आनंद के कार्यालय से 11 करोड़ रुपए की राशि बरामद हुई। एक रिपोर्ट अनुसार भारत में लोकसभा चुनावों में करीब 70,000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि आज के समय में चुनावी खर्च बढ़ता जा रहा है इसलिए कोई साधारण आदमी चुनाव मैदान में उतरने का जोखिम नहीं उठा सकता। उम्मीदवार का आर्थिक रूप से मजबूत होना एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है। व्यक्तिगत तौर पर सभी उम्मीदवार करोड़पति हों यह भी संभव नहीं। इस बात को देखते हुए राजनीतिक दल चंदा एकत्रित कर उम्मीदवारों की आर्थिक सहायता करते हैं। चंदा कहां से और कितना आया यह बात सार्वजनिक होनी चाहिए। इस पर न्यायालय के भीतर और बाहर चर्चा चल रही है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राजनीतिक दलों को 30 मई तक निर्वाचन आयोग को चंदे से जुड़े विवरण देने को कहा है। 

गौरतलब है कि गैर सरकारी संगठन, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) ने अदालत में चुनावी बॉन्ड योजना पर रोक लगाने की गुहार लगाई है जिसे केंद्र सरकार ने पिछले साल जनवरी में अधिसूचित किया था। अपनी याचिका में एडीआर ने तर्क दिया है कि चुनावी बॉन्ड के इस्तेमाल की अनुमति देने के लिए कुछ अहम कानूनों में संशोधन किए गए जिसकी वजह से राजनीतिक दलों के लिए असीमित कॉरपोरेट चंदा और भारतीय तथा विदेशी कंपनियों के द्वारा गोपनीय तरीके से फंडिंग की राह बन गई है जिसके भारतीय लोकतंत्र पर गंभीर नतीजे दिख सकते हैं। एडीआर ने अपनी याचिका में कहा, देश में हो रहे आम चुनाव से पहले तीन महीने में काफी दिनों तक चुनावी बॉन्ड उपलब्ध कराया जा रहा है। सुनवाई के दौरान चुनाव समिति ने कहा था कि वह इस तरह के बॉन्ड के इस्तेमाल का विरोध नहीं करती है लेकिन वह इन बॉन्ड के जरिये राजनीतिक दलों को मिले चंदे की जानकारी न मिलने के विकल्प के पक्ष में नहीं है। निर्वाचन आयोग का पक्ष रखने वाली समिति की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने शीर्ष अदालत से कहा हम चुनावी बॉन्ड के खिलाफ नहीं हैं लेकिन हम चाहते हैं कि इसमें पूरा खुलासा किया जाए और पारदर्शिता बरती जाए। हम दानकर्ताओं के नाम गोपनीय रखने के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29 (सी) में जोड़े गए नियम के मुताबिक राजनीतिक दलों को इस बात की इजाजत दी गई है कि वे चुनावी बॉन्ड के जरिये मिले चंदे का ब्योरा न दें और यह राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता लाने के विचार के अनुरूप भी नहीं है। वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि चुनावी बॉन्ड लॉन्च करना एक नीतिगत फैसला था और किसी सरकार को नीतिगत फैसले लेने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। केंद्र का कहना था कि जब तक फंड का स्रोत वैध है तब तक किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए। केंद्र ने कहा कि पुरानी व्यवस्था के तहत राजनीतिक चंदे की बड़ी रकम नकदी के रूप में या फिर कंपनी जगत ने अवैध फंडिंग के तरीकों का इस्तेमाल करते हुए दी और इससे चुनावों के लिए काला धन भी मिला। सरकार ने चुनावी बॉन्ड योजना लाने से पहले आयकर कानून, जनप्रतिनिधित्व कानून, वित्त कानून और कंपनी कानून सहित अनेक कानूनों में संशोधन किया था। केंद्र और निर्वाचन आयोग ने चुनावी बॉन्ड के लिए चंदा देने वालों के मामले में गोपनीयता बनाए रखने के बारे में परस्पर विरोधी दृष्टिकोण अपनाया। सरकार चंदा देने वालों के नाम गोपनीय रखना चाहती है जबकि निर्वाचन आयोग पारदर्शिता के लिए इनके नामों का उजागर करने के पक्ष में है।  चुनावी चंदे की पारदर्शिता को लेकर जारी बहस के बीच सूचना के अधिकार (आरटीआई) से खुलासा हुआ है कि सियासी दलों को चंदा देने वाले गुमनाम लोगों ने सबसे महंगे चुनावी बॉन्ड खरीदने के प्रति भारी रुझान दिखाया। सियासी दलों को एक मार्च 2018 से 24 जनवरी 2019 की अवधि में 99.8 फीसद चुनावी चंदा सबसे महंगे बॉन्ड से मिला। मध्यप्रदेश के नीमच निवासी सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से आरटीआई के जरिये मिले आंकड़ों के हवाले से यह अहम जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि गुमनाम चंदादाताओं ने सरकारी क्षेत्र के इस सबसे बड़े बैंक की विभिन्न शाखाओं के जरिये एक मार्च 2018 से 24 जनवरी 2019 तक सात चरणों में पांच अलग-अलग मूल्य वर्ग वाले कुल 1,407.09 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे। ये बॉन्ड एक हजार रुपये, दस हजार रुपये, एक लाख रुपये, दस लाख रुपये और एक करोड़ रुपये के मूल्य वर्गों में बिक्री के लिये जारी किये गये थे। आरटीआई के तहत मुहैया कराये गये आंकड़ों के मुताबिक आलोच्य अवधि में चंदादाताओं ने दस लाख रुपये मूल्य वर्ग के कुल 1,459 बॉन्ड और एक करोड़ रुपये मूल्य वर्ग के कुल 1,258 चुनावी बॉन्ड खरीदे। यानी दोनों सबसे महंगे मूल्य वर्गों में कुल मिलाकर 1,403.90 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे गये। सियासी दलों को दिये गये चुनावी चंदे का यह आंकड़ा सभी पांच मूल्य वर्गों के बॉन्ड की बिक्री की कुल रकम यानी 1,407.09 करोड़ रुपये का लगभग 99.8 फीसद है। आंकड़ों से पता चलता है कि आलोच्य अवधि में एक लाख रुपये मूल्य वर्ग के कुल 318 चुनावी बॉन्ड की खरीद से 3.18 करोड़ रुपये, 10,000 रुपये मूल्य वर्ग के कुल 12 बॉन्ड की खरीद से 1.20 लाख रुपये और 1,000 रुपये मूल्य वर्ग वाले कुल 24 बॉन्ड की खरीद से 24,000 रुपये का चुनावी चंदा दिया। हालांकि, आरटीआई से यह खुलासा भी हुआ है कि सम्बद्ध सियासी दलों ने आलोच्य अवधि के दौरान खरीदे गये 1,407.09 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड में से 1,395.89 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड को ही भुनाया। यानी 11.20 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड बिना भुनाये रह गये जिनमें एक करोड़ रुपये मूल्य वर्ग वाले 11 बॉन्ड, दस लाख रुपये मूल्य वर्ग के दो बॉन्ड और 1,000 रुपये मूल्य वर्ग के 15 बॉन्ड शामिल हैं। आरटीआई के आंकड़ों से एक और अहम बात सामने आती है कि सातों चरणों में ऐसा एक भी चरण नहीं है, जिसमें दस लाख रुपये और एक करोड़ रुपये के मूल्य वर्गों वाले चुनावी बॉन्ड नहीं बिके हों। यानी सियासी दलों को चंदा देने वालों का रुझान सबसे महंगे मूल्य वर्ग के दोनों बॉन्ड की ओर हर बार बना रहा। गौड़ ने अपनी अर्जी में यह भी पूछा था कि आलोच्य अवधि में किन-किन सियासी दलों ने कुल कितनी धनराशि के चुनावी बॉन्ड भुनाए? हालांकि, एसबीआई ने इस प्रश्न पर आरटीआई अधिनियम के सम्बद्ध प्रावधानों के तहत छूट का हवाला देते हुए इसका खुलासा करने से इंकार कर दिया। सियासी सुधारों के लिये काम करने वाले स्वैच्छिक समूह एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) ने चुनावी बॉन्ड की बिक्री पर रोक की गुहार लगाते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले में अदालत ने चुनावी बॉन्ड के जरिये राजनीतिक फंडिंग पर रोक लगाने से हालांकि इंकार कर दिया, लेकिन उसने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिये कई शर्तें लगा दी है।

मोदी सरकार द्वारा चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए ही उपरोक्त कदम उठाया गया था, लेकिन एक वर्ग का यह सोचना कि इससे अवैध धन के इस्तेमाल की गुंजाइश है को भी ठुकराया नहीं जा सकता। देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए चुनावी चंदे में जितनी अधिक पारदर्शिता होगी उतनी ही अधिक लोकतांत्रिक प्रणाली मजबूत होगी।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।
   

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