Friday, May 24, 2019 12:26 AM

जहरीले बोल

जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय दलों के नेताओं को पिछले सात दशक से जो विशेष मान्यता व सुविधाएं मिली हुई हैं उन सबको यह लोग धारा 370 के साथ जोड़कर देखते व सोचते हैं। धारा 370 के तहत जो विशेष दर्जा वहां के जन साधारण के हित को कुछ समय के लिए सुरक्षित रखने के लिए भारत सरकार ने 50 के दशक में लिया था अब उसे घाटी के नेता फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला सहित वहां के अलगाववादी नेता अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए इस्तेमाल करते चले आ रहे हैं।
धारा 370 को तथा उपधारा 35ए को समाप्त करने की मांग पिछले कुछ वर्षों से जोर पकड़ती चली जा रही है क्योंकि उपरोक्त दोनों धाराओं को घाटी के कुछ नेता व एक वर्ग विशेष इनका इस्तेमाल भारत के विरोध में करने लगा था। स्थानीय लोगों के हित को सुरक्षित रखने के लिए बनी धाराओं को राजनीतिज्ञों ने जब राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया तभी से स्थिति बद से बदतर होती चली गई।

भारतीय जनता पार्टी का संकल्प पत्र जारी होने से ंपहले ही नेशनल  कांफ्रेंस और पीडीपी के नेताओं ने भारत विरुद्ध विषैले बोल बोलने शुरू कर दिए थे। संकल्प पत्र के जारी होने के बाद तो शायद उनकी मानसिक स्थिति ही बिगड़ती दिखाई दे रही है। जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने देश विरोधी बयान देते हुए कहा कि भाजपा अनुच्छेद 370 हटाने की बात कर रही है। अगर यह हुआ तो हम चुनाव के हक से वंचित हो जाएंगे। ना समझोगे तो मिट जाओगे हिन्दुस्तान वालो, तुम्हारी दास्तान भी ना होगी दास्तानों में। नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि अनुच्छेद-370 खत्म होने से जम्मू-कश्मीर आजाद हो जाएगा। भाजपा को दिलों को जोडऩे की कोशिश करनी चाहिए, ना कि उन्हें तोडऩे की।

नेहरू सरकार के समय में हुई गलती को सुधारने की बजाये समय की सरकारों ने तुष्टिकरण की नीति पर चलकर जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक स्थिति को और उलझनदार बनाने का ही काम किया। कांग्रेस ने नेशनल कांफ्रेंस के साथ गठबंधन किया हुआ है और भाजपा ने अतीत में पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। राष्ट्रीय स्तर के दोनों दलों को भली भांति पता है कि पीडीपी और एनसी की विचारधारा क्या है। सत्ता सुख पाने के लिए दोनों ने समय-समय पर समझौता कर उपरोक्त दलों व उनके नेताओं की ही स्थिति मजबूत की है। राष्ट्रीय दलों की राजनीतिक कम•ाोरियों का परिणाम है कि फारूक व महबूबा देश को चुनौती देने की धमकी दे रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य करने के लिए जहां धारा 370 तथा उपधारा 35ए को समाप्त करने की आवश्यकता है वहीं जम्मू और लेह-लद्दाख को भी घाटी से अलग करने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए पिछले सात दशकों में जो करोड़ों-अरबों रुपए जम्मू-कश्मीर को दिए वह अधिकतर घाटी में लगे और या फिर घाटी के विभिन्न नेताओं के आर्थिक विकास में ही लगे।

जम्मू व लेह-लद्दाख के क्षेत्रों की तो अनदेखी ही होती रही है। जम्मू व लेह क्षेत्र के लोग आज भी यही शिकायत कर रहे हैं कि उनके साथ सौतेली मां सा व्यवहार होता है। घाटी के मुस्लिम नेताओं का सांप जैसा रूप अब बाहर आ गया है। अतीत में भारत सरकार ने इनको दूध पिलाने का जो काम किया उसके परिणाम आज सामने आ रहे हैं। समय की मांग है कि इनके विषैले दांत तोड़ दिए जाएं और जहर की थैली हमेशा-हमेशा के लिए दबा दी जाए।
फारूक और महबूबा सहित उन सभी को जो राष्ट्र को चुनौती देने का दु:साहस कर रहे हैं को समझ लेना चाहिए कि उनके दिन अब थोड़े ही हैं, उल्टी गिनती शुरू है।



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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