'टाइम' के बदलते सुर

अमेरिका से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'टाइम' ने 2019 के लोकसभा के मतदान के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पत्रिका के प्रथम पृष्ठ पर चित्र प्रकाशित कर 'डिवाइडर इन चीफ' करके संबोधित करते हुए जो लिखा था उसके अंश आपके सम्मुख रख रहे हैं। भारत उन महान लोकतांत्रिक देशों में पहला देश है, जो लोकलुभावन नारों और वादों से प्रभावित हो गया। 2014 में नरेंद्र मोदी पिछले 30 वर्षों का सबसे बड़ा जनादेश लेकर सत्ता में आए। इससे पहले आजादी के 67 में से 54 वर्ष तक कांग्रेस पार्टी सत्ता में रही। भारत लोकलुभावनवाद (पॉपुलिज्म) की वैधता और कल्पना की अनूठी झलक दिखाता है। भारत के साथ तुर्की, ब्राजील, ब्रिटेन और अमेरिका में पॉपुलिज्म ने बहुसंख्यक लोगों की शिकायतों को आवाज दी है। इसकी अनदेखी नहीं कर सकते हैं। मोदी ने देश के संस्थापक पितामहों जैसे नेहरू पर प्रहार किए। फिर नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद पर निशाना साधा। कांग्रेस मुक्त भारत की बात की। उन्होंने भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच भाईचारा कायम करने की इच्छा नहीं जताई। उनके उभार ने दर्शाया कि भारत में उदारवादी संस्कृति की बजाय धार्मिक राष्ट्रवाद, मुस्लिम विरोधी भावनाएं और गहरी जातिवादी कट्टरता खदबदा रही है। मोदी के शासनकाल में पुराने उच्च आदर्श शक्तिशाली एलीट क्लास का खेल लगने लगे। 2019 में उन्होंने 2014 की लहर को फिर से स्थापित करने की कोशिश की है। उनके एक ट्वीट पर गौर करें, 'मेरा अपराध यह है कि गरीब परिवार में जन्मा व्यक्ति उनकी सल्तनत को चुनौती दे रहा है।' 2014 में मोदी ने सांस्कृतिक गुस्से को आर्थिक शक्ल दे दी थी। उन्होंने नौकरियों और विकास का वादा किया था। अब वह सब कहीं दिखाई नहीं देता है। उन्होंने जहरीले राष्ट्रवाद का माहौल बनाने में सहायता की है। मुसलमानों के खिलाफ एक के बाद एक हिंसक घटनाएं हुईं। हिन्दुओं की भीड़ ने गाय के नाम पर कई लोगों को पीट-पीटकर मार डाला। मोदी का हिंसा पर नियंत्रण नहीं रहा। एक बार नफरत को स्वीकृति मिलने के बाद उसके लक्ष्य को अलग-थलग करना आसान नहीं है। भाजपा को तकलीफ हुई होगी कि जो लोग मुसलमानों पर हमला कर रहे थे, वे दलितों को भी निशाना बनाने लगे। मोदी के काल में हर तरह के अल्पसंख्यकों-उदारवादियों, मुसलमानों, ईसाइयों और दलितों पर हमले हुए हैं। मोदी ने ऐसा देश खड़ा कर दिया है, जिसमें भारतीय मतभेदों से चिपके हुए हैं। यदि 2014 में उन्होंने उम्मीद जगाई थी तो 2019 में वे लोगों से केवल मतभेदों के सहारे जीने की बात कर रहे हैं। मोदी फिर से जीत सकते हैं, क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष बिखरा हुआ है। फिर भी, मोदी 2014 के सपनों और आकांक्षाओं का कभी प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। उस समय वे मसीहा थे, जो एक ओर हिन्दू जागरण और दूसरी ओर दक्षिण कोरिया जैसे आर्थिक कार्यक्रम के साथ उजले भविष्य के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था। अब वे केवल एक राजनेता हैं, जो नतीजे देने में विफल रहा और फिर से जनादेश मांग रहा है।

गौरतलब है कि उपरोक्त लेख पाकिस्तानी मूल के आतिश तासीर ने लिखा था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक प्रचण्ड जीत के साथ दूसरी बार सत्ता संभालने में सफल हुए हैं तो 'टाइम' पत्रिका के सुर भी बदल गए हैं। अब पत्रिका ने मोदी को देश को जोडऩे वाला नेता स्वीकारते हुए लंदन स्थिति मीडिया संस्थान इंडिया इंक ग्रुप के संस्थापक व मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज लाडवा ने लिखा है कि अपने पहले कार्यकाल व इस चुनावी मैराथन के दौरान भी मोदी की नीतियों की कड़ी और कई बार बेहद अनुचित आलोचनाएं भी हुईं। इसके बावजूद जिस तरह से मोदी ने देश को एक सूत्र में पिरोया, पिछले पांच दशक में कोई प्रधानमंत्री नहीं कर सका। इस लेख में लाडवा ने आगे कहा कि मोदी ने प्रचंड जीत हासिल की, क्योंकि उन्होंने देश में वर्ग विभाजन की सबसे बड़ी चुनौती को पार कर लिया। लाडवा ने लिखा, मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में भारत की कुख्यात रूप से अक्षम और भ्रष्ट नौकरशाही के कुछ बड़े छेद बंद किए। अब इन संस्थानों में सुधार के लिए ज्यादा सख्त कदमों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, ताकि आने वाले दशकों के हिसाब से इन्हें तैयार किया जा सके। इसके लिए मोदी को ऐसा ही व्यावहारिक नेता बने रहना होगा। लेख में कहा गया कि भले ही मोदी सरकार की सभी उपलब्धियां अभी शुरुआती चरण में हैं, लेकिन वल्र्ड बैंक, आइएमएफ और संयुक्त राष्ट्र समेत हर वैश्विक संस्थान ने उन्हें स्वीकारा है। मोदी का भारत अब उस गति से विकास के रास्ते पर बढ़ रहा है, जो इसके आकार और क्षमता के अनुकूल है। लाडवा ने आगे लिखा कि सामाजिक तनाव की कुछ घटनाओं पर चुप्पी के लिए मोदी की आलोचना की जा सकती है। लेकिन उनके काम को मतदाताओं का समर्थन मिला। उनकी नजर में नए भारत का मोदी का सपना काफी हद तक बरकरार है।

समय और परिस्थितियों के अनुसार कैसे बदला जा सकता है यह बात 'टाइम' पत्रिका के सुरों से समझा जा सकता है। 'टाइम' के बदलते सुरों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि दुनिया तो झुकती है केवल झुकाने वाला चाहिए। 

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।