गलतियों से सीखने एवं लघु उद्योग को संभालने का वक्त

कोरोना संकट को लेकर हालात सुधरते नहीं दिख रहे। दुनियाभर में कोरोना संक्रमण के मामले इस साल मई के अंत तक 51 लाख से ज्यादा का आंकड़ा पार कर गए हैं और 3.35 लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई है। अमरीका में तो संक्रमण के मामले 15 लाख से अधिक हो गए हैं। उसके बाद रूस, ब्राज़ील और ब्रिटेन में सबसे अधिक केस पाए गए हैं। भारत में अब तक कुल 1.26 लाख से अधिक लोग संक्रमित हुए हैं, जिनमें से 53 हज़ार से अधिक ठीक हुए और 3720 लोगों की मौत हो चुकी है। हर तरफ विशेषज्ञ इस चर्चा में लगे हैं कि किसने कहां गलती की और कौन सा देश मौका भुना गया। जानकारों का मानना है कि दुनिया में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की असल संख्या और भी अधिक हो सकती है क्योंकि कई देशों में टैस्टिंग अब भी बहुत कम हो रही है। दूसरा भारत सहित कई देशों ने लॉकडाउन में ढील देते हुए कुछ कामकाज को खोलने की मंजूरी दे दी है। 25  मई से 200 नई ट्रेन भी शुरू हो रही हैं। 
एविएशन मिनिस्टर हरदीप पुरी ने कह दिया है कि घरेलू उड़ानों के दौरान बीच की सीट खाली नहीं रहेगी। ऐसे में लोगों को लग रहा है कि कम्युनिटी संक्रमण से तो बच गए अब कहीं ये क्लस्टर संक्रमण जान न ले ले। मुंबई और चेनई के लोग पहले ही क्लस्टर संक्रमण के शिकार हैं। ये तो रहा जान-माल का नुक्सान लेकिन दूसरी जो सबसे ज्यादा परेशानी वाली बात है वो है-आर्थिक मंदी। एक ओर जहां ये बात हो रही है कि कोरोना की दूसरी लहर ज्यादा तबाही लाएगी वहीं ये भी चर्चाएं हैं कि कहीं भुखमरी का दौर न देखना पड़े।  

अर्थ शास्त्रियों का अनुमान है कि कोरोना संक्रमण से बचने के लिए घोषित लॉकडाउन के दौरान अब तक कऱीब 12 करोड़ लोग बेरोजग़ार हो चुके हैं। इनमें से अधिकतम आते हैं निम्न वर्ग यानी देश के असंगठित क्षेत्र से-दिहाड़ीदार या कामगार। मिडल या मध्यम वर्ग की बात करें तो कऱीब इतने ही दो महीनों से बिना सैलरी घर बैठे काम शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी पुष्टि की है कि महामारी का बड़ा असर जीडीपी पर पड़ सकता है। हो सकता है कि साल 2020-21 में जीडीपी निगेटिव रहे। उन्होंने बैंकों का लोन चुका रहे लोगों को राहत देते हुए लोन चुकाने की मियाद को और 3 महीनों के लिए आगे बढ़ाने की घोषणा की। अर्थ शास्त्रियों के अनुसार, पहले बड़े उद्योगपतियों की गिनती औसतन 48 करोड़ थी जो लाकडाउन के बाद से घट कर 6  करोड़ रह गई है। हालांकि टूरिज़्म, होटल, रेस्टोरेंट, सैलून आदि कई व्यवसाय बंद हैं जिनके खुलने के बाद ही आर्थिकता की असली तस्वीर सामने आएगी। वित्त जानकार तो ये भी कह रह हैं कि देश में गरीब यानी बीपीएल वाले 40 करोड़ से भी ऊपर हो जायेंगे।  

ये हालात सिर्फ भारत में ही नहीं हैं। दुबई चेंबर ऑफ़ कॉमर्स के एक सर्वे के अनुसार दुबई के तकरीबन 70 प्रतिशत बिजऩेस अगले छह महीने में इस महामारी की वजह से बंद हो सकते हैं। सर्वे के मुताबिक, वैश्विक आर्थिक सुस्ती का सबसे ज़्यादा असर छोटे और मझौले उद्योगों पर पड़ा हैं। सर्वे में शामिल 48 प्रतिशत कंपनियों ने कहा है कि उनके पास इससे निपटने का कोई प्लान नहीं है। ब्रिटिश विमानन कंपनी फ़्लाईबी एयरलाइंस मार्च में ही बंद कर दी गई थी। उधर, दुनिया की जानी-मानी कार रेंटल कंपनी हट्जऱ् ने कोरोना संकट के दौरान कारोबार ठप होने के बाद अमरीका में दिवालिया होने के लिए अर्ज़ी दे दी है।  यूरोप में लोग खाने व काम को लेकर परेशान हैं। जिन देशों ने आंशिक तालाबंदी अपनाई, उन्हें भी आर्थिक विकास में रुकावट का खतरा सता रहा है। अब सभी देश भारत की ओर देख रह हैं कि पूरा लॉकडाउन करके किस तरह ये देश मंदी से निपटेगा। चौथा लॉकडाउन 31 मई को खत्म हो रहा है। क्या भारत अगले लॉकडाउन में जायेगा या फिर कोरोना के साथ ही जि़न्दगी को मुड़ पटरी पर लाने की जद्दोजेहद में जुट जाएगा।  

इकोनॉमी के जानकार कह रहे हैं कि सरकार को आर्थिक पैकेज को राज्यों की इकोनॉमी को ध्यान में रखते हुए दोबारा डिज़ाइन करना चाहिए क्योंकि लॉकडाउन के दौरान कुछ नए ट्रेंड सामने आए हैं। जैसे- पंजाब का लोअर मिडल क्लास जो सालों पहले शहर आया था, उसके गांवों में रहते बड़े-बुजुर्ग अब जड़ों की ओर लौट रहे हैं। कारण कई हैं। दूसरे राज्यों की लेबर चली गई। दूसरे राज्यों से कम्बाइन नहीं आई। फसल तो काटनी ही है इसलिए लेबर अपने अपने राज्य वापस आ-जा रही है। जानकारों का सुझाव है सरकार इन्हें काम दे और इनकी ग्रोथ का सोचे ताकि भविष्य में ऐसे किसी विपत्ति की वक़्त दिक्कत न हो। हाल-फिलहाल जहां सरकार की चूकों पर बात हो रही वहीं उसके अच्छे कामों को सराहा भी जा रहा है।  
बिजऩेस स्टैंडर्ड अख़बार की राजनीतिक सम्पादक अदिती फडऩीस ने बताया, लॉकडाउन की प्रक्रिया बेहतर हो सकती थी। जहां  केस कम थे-मिसाल के तौर पर सिक्किम और गोवा तो वहां इंडस्ट्रीज़ को क्यों बंद कर दिया गया। अगर मुंबई हवाई अड्डे को पहले बंद कर दिया होता तो मुंबई में स्थिति भीषण न होती। 

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स की प्रोफ़ेसर जयंती घोष का कहना है कि भारत ने लॉकडाउन की घोषणा करने में देर की और एक लोकतांत्रिक सरकार होते हुए अपने करोड़ों कामगारों के लिए बेहद कम सोचा। स्वराज पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव राज्यों में प्रवासियों के पहुंचने पर संक्रमण के बढ़ते सवाल पर कहते हैं, क़ायदे से जब लॉकडाउन शुरू हुआ अगर सरकार उसी वक़्त ट्रेन चलने देती और लोगों के जाने की व्यवस्था करती तो उस समय संक्रमण होने की आशंका अभी से कम होती क्योंकि उस समय संक्रमण केस 500 के कऱीब थे लेकिन अब जबकि संक्रमण के मामले 1 लाख के पार हो गए हैं तो संक्रमण का ख़तरा 200गुना बढ़ गया है। लेकिन अगर और बाद में इस लागू किया जाएगा तो ख़तरा और बढ़ जाएगा। 

पिछले एक हफ्ते से मज़दूरों की हालत पर मचे घमासान को लेकर कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव के वेंकटेश नायक का कहना है कि लॉकडाउन को मुसीबत में पड़े उन लाखों कामगारों के गौरवपूर्ण और सम्मानित ज़िंदगी जीने के मूल अधिकार पर एक प्रहार के तौर पर देखा जाना चाहिए। हालांकि 19 दिन मेंरेलवे ने 2। ;5  लाख लोगों को घर पहुंचा कर बेहतरीन काम किया पर उन्होंने कहा, भारत में प्रवासियों- जिसमें मज़दूर समेत वो भी शामिल हैं जो दूसरे प्रदेशों का रुख़ करते हैं- उनकी गणना 10 साल में एक बार सेंसस के ज़रिए होती है।  2001 में ये संख्या कऱीब 15 करोड़ थी और 2011 में कऱीब 45 करोड़ थी। सरकार को सबसे पहले इनकी सोचनी चाहिए थी।  
हालांकि पूर्व गृह सचिव बाल्मिकी प्रसाद सिंह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सरकार ने रणनीति के तहत काम नहीं किया। रणनीति थी मज़दूर और दूसरे लोग जहां हैं वहीं रहें और बाहर नहीं जाएं। सरकार उनके लिए व्यवस्था करे लेकिन लोगों में जो आवेश था लौटने का, उसके आगे यह रणनीति धराशायी हो गई।  बाल्मिकी प्रसाद सिंह कहते हैं, अब तो जो है उसी के साथ चलना होगा। कई बार ऐसे मामलों में दूरदर्शिता काम नहीं आती। अब इसका सिर्फ़ सामना करना है।  पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट और इंडियन जर्नल ऑफ़ मेडिकल एथिक्स के सम्पादक, डॉक्टर अमर जेसानी को लगता है कि लॉकडाउन कोविड-19 से निपटने का अंतिम पड़ाव नहीं बल्कि बस एक ज़रिया हो सकता है। -डॉ. अमनप्रीत सिंह