प्रकृति के लिए 35 साल से ये भारतीय कर रहा ऐसा काम, जानकर आप भी कहेंगे शाबाश

पणजी (उत्तम हिन्दू न्यूज): कहते हैं इंसान की हिम्मत और साहस उसे सफलता जरूर दिलाते हैं सिर्फ शर्त ये है कि इंसान अपना ध्येय कभी न छोड़े। कुछ ऐसी ही सफलता को हासिल कर चुके हैं जादव पायंग। असम के जोरहट जिले के कोकिलामुख गांव के रहने वाले जादव पायंग का कहना है कि वह आखिरी सांस तक पेड़ लगाएंगे। पेड़ लगाने के सिलसिले को 35 साल से चला रहे हैं। असम स्थित माजुली आइलैंड दुनिया का सबसे बड़ा रिवर आइलैंड है। हर साल मानसून में ब्रह्मपुत्र नदी का बहाव माजुली आइलैंड का कुछ हिस्सा अपने साथ बहा ले जाता है।
 

नदियों का कटाव और जलवायु परिवर्तन को रोकने का एक और इकलौता उपाय केवल पेड़ ही हैं। यह बात जादव पायंग ने तब समझ ली थी जब उनकी उम्र महज 14-15 साल थी। इसी बात को समझते हुए उन्होंने 1979 में नदी के किनारे पर पेड़ लगाने की शुरूआत की और बीते 48 साल में इसके लगभग 1200 हेक्टेयर इलाके में घना जंगल उगा दिया है। अब इस जंगल में 100 से ज्यादा हाथी, बंगाल टाइगर और बहुत सारे जीव-जंतु-पक्षी रहते हैं। पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित जादव का दिन 35 साल से मौजली जाने के लिए सुबह 3 बजे शुरू जाता है और 5 बजे वह पहुंच जाते हैं ताकि अपने जंगल और पौधों की देखभाल कर सकें।  असम सरकार ने इस जंगल का नाम अब जादव मोलाई पायंग के नाम से मोलाई सेंक्चुरी रख दिया गया है। जादव के माता-पिता उन्हें मोलाई कहकर पुकारा करते थे। एक किस्से का जिक्र करते हुए जादव ने कहा कि सैकड़ों सांपों की मौत ने उन्हें इतना विचलित किया कि उन्होंने पढ़ाई-लिखाई छोडक़र जंगल लगाने का काम शुरू कर दिया। बांस के 20 पेड़ों के बीज से जंगल बोने की शुरूआत करने वाले जादव पायंग को असम सरकार ने ‘फॉरेस्ट मैन’ की उपाधि दी है। उन्होंने भारत सरकार ने वर्ष 2015 में पद्मश्री से सम्मानित किया। 
 

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