Monday, May 20, 2019 02:01 AM

फिर मोदी

लोकसभा चुनाव अब अपने आखिरी पड़ाव पर हैं। छठे और सातवें चरण के बाद 23 मई की सुबह देश व दुनिया की नजरें लोकसभा चुनावों के परिणामों को लेकर टी.वी. पर ही टिकी रहेंगी। जब चुनावों की घोषणा हुई थी तब लगता था कि चुनावों में मुद्दे विशेष महत्व निभायेंगे, लेकिन अंतिम पड़ाव पर आने तक मुद्दे गौण हो चुके हैं और चुनाव का केंद्र बिन्दू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बन चुके हैं। 'एक बार फिर मोदी सरकार' का नारा देशभर में गूंजता दिखाई दे रहा है।

नरेन्द्र मोदी को चौकीदार चोर के रूप में पेश करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने न्यायालय के आदेश का सहारा लिया था। जिसके लिए अब राहुल गांधी ने बिना शर्त न्यायालय से माफी मांग ली है। मायावती, ममता बनर्जी और अखिलेश तथा लालू यादव के बेटों सहित करीब-करीब एनडीए विरोधी दलों के निशाने पर नरेन्द्र मोदी ही हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को लेकर अमेरिका की विश्व प्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने अपने मुख्य पृष्ठ पर एक बार फिर मोदी की तस्वीर प्रकाशित की है और लिखा है कि मोदी फूट डालने वालों का मुखिया है, इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कवर पेज पर ही कम महत्ता के साथ दूसरी हेडलाइन है, जिसमें 'मोदी द रिफॉमर्र' कहा गया है। आलेख लिखने वाले आतिश तासीर भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर रहे सलमान तासीर के बेटे हैं। सलमान की ईशनिंदा कानून का विरोध करने पर उनके ही अंगरक्षक ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। आतिश ने लिखा-क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र मोदी सरकार को पांच और साल झेल पाएगा? मोदी ने 2014 में मतभेदों को उम्मीद के माहौल में बदला था, लेकिन 2019 में वे लोगों की मतभेदों को याद रखने और देश में फैली हताशा को भूल जाने के लिए कह रहे हैं। पहले वे मसीहा थे, हिन्दू पुनर्जागरण के साथ आर्थिक कार्यक्रम की बात करते हुए रोशन भविष्य की उम्मीद जताते थे। अब वे फिर से चुने जाने की कोशिश कर रहे हैं। इस संस्करण में 'मोदी द रिफॉमर्र' आलेख में पत्रकार इयान ब्रेमर ने मोदी को भारत के लिए आर्थिक सुधारों को सबसे बड़ी उम्मीद बताया। उन्होंने लिखा कि आर्थिक मोर्चे पर मोदी का रिकॉर्ड मिला-जुला रहा। फिर भी भारत को बदलाव चाहिए तो मोदी ही वह ला सकते हैं। चीन, जापान और अमेरिका से संबंध तो सुधारे ही हैं, घरेलू मोर्चों पर लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन में सुधार लाने के लिए ज्यादा काम किया। जीएसटी, आधारभूत संरचनाओं में अभूतपूर्व निवेश, कांग्रेस के समय में बनी आधार पहचान पत्र व्यवस्था का विस्तार, उनकी उपलब्धियां हैं। वे हावी तो होते हैं, लेकिन एक विकासश्ील देश को जो सुधार चाहिए, उन्हें उपलब्ध भी करवाते हैं। आलेख में कांग्रेस की आलोचना में कहा है कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी में राजनीतिक सोच समझ नहीं बची है। वंशवादी राजनीति के अलावा कहने के लिए कोई बात नहीं है। पार्टी केवल राहुल के साथ उनकी बहन प्रियंका को चुनाव में उतारने जितना ही सोच सकती है। यह वैसा ही है जैसे अमेरिका में अगर डेमोक्रेट्स हिलेरी क्लिंटन को राष्ट्रपति चुनाव में फिर से उतारें तो साथ में बेटी चेल्सी क्लिंटन को भी उपराष्ट्रपति पद के लिए उतार कर उम्मीद करें कि इससे मतदाता आकर्षित होंगे। मोदी का सौभाग्य है कि उन्हें ऐसा कमजोर विपक्ष मिला है, जिसके पास गठजोड़ के अलावा मोदी को हराने के लिए कोई एजेंडा नहीं है।

जमीनी सत्य यह है कि आज देश दो विचारधाराओं में बंट चुका है। एक बड़़ा धड़ा मोदी के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है तो दूसरा विरोध में खड़ा है। मोदी विरोधी धड़े की सबसे बड़ी कमजोरी राहुल गांधी हैं। राहुल गांधी से कहीं अधिक जन साधारण उनकी बहन के व्यक्तित्व से अधिक प्रभावित हो रहा है। यही स्थिति राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य को धूमिल कर रही है। वर्तमान में लोकसभा चुनाव राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी के रूप में करीब-करीब बदल चुका है। यह बात कांग्रेस के लिए नुकसानदेय और भाजपा के हित में जा रही है। कटु सत्य यह भी है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में नरेन्द्र मोदी के विकल्प के रूप में कांग्रेस सहित किसी भी राजनीतिक दल के पास उस राजनीतिक कद का नेता ही नहीं है। विपक्षी दलों की यह कमजोरी जगजाहिर है और इसी का लाभ भाजपा व नरेन्द्र मोदी को मिल रहा है।
नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ही एनडीए के दोबारा सत्ता में आने की संभावना सबसे अधिक है। सत्ता में आने के बाद मोदी के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती जन साधारण की आकांक्षाओं को पूरा करना और देश को आर्थिक व सैन्य दृष्टि से और मजबूत करना ही होगा। टाइम ने बेशक 'डिवाइडर इन चीफ' कह कर मोदी को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है लेकिन धरातल का सत्य यह है कि यह विभाजन विचारधारा को लेकर है न कि जात-पात को लेकर। देश में हो रहे वैचारिक मंथन का श्रेय नरेन्द्र मोदी को ही जाना चाहिए।

अतीत में तो देश, जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर ही बंटा हुआ था। वैचारिक मंथन का वर्तमान दौर किसी भी प्रकार से चिंता का विषय नहीं है। हां चिंतन तो एक जीवंत समाज का हिस्सा ही होता है। सो घबराने की कोई आवश्यकता नहीं यह स्वभाविक ही है।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

देश की सबसे बड़ी और तेज WhatsApp News Service से जुड़ने के लिए हमारे नंब 7400023000 पर Missed Call दें। इस नंबर को Save करना मत भूलें।