सरदार बूटा सिंह के निधन से कमज़ोर और पिछड़े वर्ग की आवाज़ हुई ख़ामोश 

सरदार बूटा सिंह की मृत्यु से आज देश से कमज़ोर और पिछड़े वर्ग की वह आवाज़ छिन गई, जिसका दृढ़ विश्वास था कि डा. बी.आर. अम्बेडकर का दलित  सशक्तिकरण का स्वप्न सिर्फ राजनीतिक शक्ति से ही पूरा किया जा सकता है

उनका जन्म सन 1934 में पंजाब के जि़ला जालंधर के गांव मुसतफापुर में एक गरीब मजहबी सिख परिवार में हुआ था । सरदार बूटा सिंह एक श्रद्धालु सिख, जो माक्र्सवाद और डा. बी. आर. अम्बेदकर की विचारधारा में पूरा विश्वास करते थे, जानते थे कि शिक्षा ही दलित सशक्तिकरण की असली कुंजी है। उन्होंने अधिक से अधिक शिक्षा प्राप्त की, जिससे न सिर्फ उनको ज्ञान प्राप्त करने में सहायता मिली बल्कि भाषण के हुनर को भी निखारा। उनकी भाषण कला, वफ़ादारी और गरीबों के कल्याण प्रति दृढ़ वचनबद्धता उनको मरहूम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी के नज़दीक ले आई।

    हालांकि वह श्रीमती गांधी के कार्यकाल के दौरान रस्मी तौर पर कांग्रेस में शामिल हुए थे परन्तु यह पंडित नेहरू थे, जिन्होंने उनको अकाली संसद मैंबर के तौर पर पंजाबी राज्य पर उत्तम भाषण के लिए संसद के केंद्रीय हाल में प्रोत्साहन दिया था। 1962,1967, 1971, 1980, 1984, 1991, 1998 और 1999 में आठ बार लोक सभा के लिए चुने गए सरदार जी गृह, कृषि, खेल, शहरी विकास, ख़ुराक और सिविल सप्लाईज़, रेलवे, संचार और अन्य समेत 17 से अधिक विभागों के मंत्री रहे। नेहरू -गांधी राज के  समय दौरान कांग्रेस में सबसे शक्तिशाली और कांग्रेसी नेता होने के बावजूद वह कभी राज्य सभा के द्वारा संसद में दाखि़ल नहीं हुए क्योंकि वह इस बात के हक में थे कि एक राजनेता को लोगों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, जिसके लिए लोगों का फ़ैसला ज़रूरी है।

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उन्होंने 1962 और 1967 में दो बार अकाली टिकट पर मोगा का प्रतिनिधित्व किया और फिर कांग्रेस की टिकट पर 1971 और 1980 में रोपड़ का। सन 1984 में जब पंजाब जल रहा था, श्री राजीव गांधी ने उनको जलोर संसदीय क्षेत्र के प्रतिनिधित्व के लिए चुना, जो उसके बाद उनकी 'कर्म भूमि'  बन गया और वह इस क्षेत्र से 1984, 1992, 1998 और 1999 में चुने गए। दिलचस्प बात यह है कि सीनियर कांग्रेसी नेता सीता राम केसरी के नेतृत्व में पार्टी ने टिकट देने से इन्कार कर दिया गया था परन्तु 1998 की लोकसभा मतदान में वह आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर 1.65 लाख वोटों से बड़ी जीत दर्ज करके एक बड़े नेता साबित हुए।

बहुत कम लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि जब 1977 में जनता लहर के बाद कांग्रेस अपनी हार उपरांत भाग गई थी, तो सरदार बूटा सिंह श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली आल इंडिया कांग्रेस समिति के एकमात्र महासचिव थे। यहां तक कि चुनाव आयोग की तरफ से गाय और बछड़ों के प्रतीक को फ्रीज कर देने के बाद पार्टी के लिए भारतीय चुनाव आयोग  से मौजूदा 'हाथ' के चिह्न को सुरक्षित करने में भी उन्होने अहम भूमिका निभाई। सरदार बूटा सिंह गर्व से कहते थे कि वह श्रीमती गांधी की वन -मैन आर्मी थे क्योंकि वह 1977 -79 से पूर्व प्रधानमंत्री के कार्यालय के इंचार्ज -कम -निजी सहायक -कम -चालक -कम -गनमैन थे।

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एशियन खेल की प्रशासनिक समिति के चेयरमैन के तौर पर सरदार बूटा सिंह ने नई दिल्ली में 1982 की एशियन खेल को सफलतापूर्वक आयोजित करके देश के लिए प्रशंसनीय कार्य किया। उनकी तरफ से किये योग्य प्रबंधों ने राष्ट्रीय स्तर पर उनके कद को और ऊँचा कर दिया। इसी तरह 1984 में श्रीमती गांधी की हत्या के बाद सरदार बूटा सिंह ने केंद्रीय गृह मंत्री के तौर पर प्रधानमंत्री समेत वीवीआईपीज़ की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) और स्पैशल प्रोटेक्शन ग्रुप के रूप में विशेष शक्ति तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।

पंजाब में काले दिनों के दौरान देश के गृह मंत्री होने के नाते सरदार बूटा सिंह आतंकवादियों की हिट लिस्ट में थे परन्तु एक सच्चे देशभक्त सरदार बूटा सिंह ने बिना किसी डर के अपना फर्ज निभाया, जिस कारण उनके परिवार के कई मैंबर भी मारे गए। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान असम, गोरखालैंड जैसी अन्य बड़ी समस्याओं को हल करने में भी मुख्य भूमिका निभाई।

अपनी पूरी जि़ंदगी में सरदार बूटा सिंह ने गरीब वर्ग के लिए सरकारी नौकरी को विश्वसनीय करने के माध्यम से न सिफऱ् दलित  सशक्तिकरण के लिए काम किया बल्कि यह विश्वास भी दिलाया कि दलित आंदोलन की पूर्ति उसके समर्थन से हो सकती है। उन्होंने न सिर्फ राम विलास पासवान और कांशी राम जैसे नेताओं की वित्तीय सहायता को  विश्वसनीय बनाया  बल्कि जब भी ज़रूरत हुई, सरकारी मशीनरी के द्वारा सहायता को भी विश्वसनीय बनाया। अपने समर्पण और नम्रता भाव से उन्होंने पार्टी लाईन से परे मित्र बनाऐ, जिस कारण लाल कृष्ण आडवानी, हरकिशन सिंह सुरजीत, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, डा. फारूक अब्दुला, प्रकाश सिंह बादल, सुरजीत सिंह बरनाला और अन्य सबने उनकी प्रशंसा की।

    हालांकि सरदार बूटा सिंह को अकसर एक दलित नेता कहा जाता रहा है परन्तु वास्तव में वह मानवता के नेता थे। उनके धर्म -निष्पक्ष और प्रगतिशील नज़रिए के लिए उनको सभी धर्मों और संप्रदायों की ओर से बराबर का सम्मान मिला। उनकी मौत विशेष तौर पर कमज़ोर और दबे -कुचले वर्गों के लिए एक बहुत बड़ा कमी है, जिनकी न सिफऱ् अपनी आवाज़ छिन गई बल्कि उनकी ताकत का एक बड़ा स्तम्भ आज गिर गया है।

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प्रस्तुति : मनविंदर सिंह, डि़प्टी डायरेक्टर लोक संपर्क विभाग, पंजाब