Monday, May 20, 2019 02:37 AM

फसाद की जड़ है धारा-370

1972 में बी. ए. की परीक्षा देने के बाद हम चार दोस्त कश्मीर घाटी घूमने गए थे। बस शाम के समय श्रीनगर पहुंची थी, जब हम दोस्त नीचे उतरे और सामान उतारने के लिए जो कश्मीरी व्यक्ति हमारे पास आया, उसने पहला प्रश्न यही पूछा कि क्या आप लोग हिन्दुस्तान से आए हो? उससे मेरा तत्काल प्रश्न था कि क्या तुम हिन्दुस्तान के नहीं हो? इस प्रश्न के पश्चात वह व्यक्ति बात को और आगे बढ़ाने की बजाय बस की छत से सामान उतारने में रूचि दिखाते हुए आगे बढ़ गया। उस समय से आज तक उस व्यक्ति द्वारा पूछा वह प्रश्न अब भी दिमाग में घूमता है। 
पिछले तीन दशकों से घाटी में जो हालात बिगड़े हैं, उनका मूल कारण यह भावना ही है जो जम्मू-कश्मीर के विशेषतया घाटी के मुस्लिम समाज के मन में बैठी हुई है। समय की मांग तो यह थी कि उपरोक्त फासले को समाप्त किया जाए लेकिन समय की सरकारों ने तुष्टिकरण की राह पर चलते हुए घाटी में भारत विरोधी तत्वों के प्रति नरम नीति अपनाई। उसी का परिणाम है कि आज महबूबा मुफ्ती धारा-370 को आधार बनाकर अलगाववादी बयान दे रही हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक कहा है कि धारा-370 का अपने राजनीतिक स्वार्थोंं के लिए इस्तेमाल कर घाटी के विभिन्न दलों के नेताओं ने घाटी की ऐसी छवि बना दी है कि वहां कोई निवेश करने को ही तैयार नहीं है। सरकार समर्थित उद्योगों को छोड़ दें तो और बड़ा उद्योग वहां दिखाई नहीं देता। उपरोक्त विषचक्र को तोडऩे के लिए धारा 370 को तोडऩा ही समाधान है। 
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कह चुके हैं कि अगर नरेन्द्र मोदी पुन: प्रधानमंत्री बनते हैं तो धारा-370 को खत्म कर दिया जाएगा। धारा-370 को लेकर जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने अपनी पुस्तक 'कश्मीर समस्या और विश्लेषण' में लिखा है 'कभी-कभी एक तर्क यह भी दिया जाता है कि अगर धारा 370 को रद्द कर दिया गया, भारत से कश्मीर के सम्बन्धों की कड़ी टूट जाएगी। यह तर्क बहुत अधिक कानूनी है और क्रियात्मक रूप में इसका कोई अर्थ नहीं। अगर ब्रिटेन की संसद भारत स्वतंत्रता अधिनियम को भूतकालीन प्रभाव सहित भंग कर दे, जैसा कि करने की वह कानूनी सामथ्र्य रखती है तो क्या उसके परिणामस्वरूप भारत फिर से उपनिवेश बन जाएगा।

 उपर्युक्त तर्क भारतीय संविधान की धारा 1 और अन्य प्रावधानों की भी अनदेखी करते हैं। वे यह धारणा बनाकर चलते हैं कि धारा 370 को भंग करने के बाद व्याख्या, विस्तार या परिशोधन के रूप में कुछ भी जोड़ा नहीं जाएगा। ये तर्क यह धारणा भी बना लेते हैं कि भारत आज वही कुछ है जोकि ब्रिटेन की संसद चाहती थी और इससे पूर्व कश्मीर भारत का अंग नहीं था। भारत जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक हजारों वर्षों से लोगों के दिल और दिमाग में बसा रहा है, भारत जिसने भावनाएं और बौद्धिकता, कविता और दर्शन, जीवन और साहित्य दिया-उस भारत की मूल सच्चाई की अवहेलना कर यह संकीर्ण कानूनी तकनीक को महत्व देता है। नोबल पुरस्कार विजेता साहित्यकार सोल्झेनित्सन ने ठीक ही कहा है-''एक समाज जो कानूनी शब्दों पर आधारित है और उससे ऊपर कभी विचार नहीं करता, वह मानव की उच्च संभावित शक्तियों का लाभ नहीं उठा सकता। कानून के शब्द इतने निर्जीव होते हैं कि वे समाज पर कोई लाभदायक प्रभाव नहीं डाल सकते। ''इसी स्वर में थॉमस जेफर्सन ने कहा है-''कानून और संस्थाओं को मानवीय मस्तिष्क की प्रगति के साथ-साथ ही चलना चाहिए। जिस प्रकार एक वयस्क आदमी वह कोट नहीं पहन सकता जो वह लड़कपन में पहना करता था, उसी प्रकार सभ्य समाज हमेशा अपने पूर्वजों की सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत नहीं रह सकता।''

 इतिहास हमें यह भी बताता है कि सभ्यताएं जब अपने-आपको धोखा देने लगती हैं और जब वेे मूलभूत न्याय से अधिक कानूनी तकनीक में खो जाती हैं, उनका पतन हो जाता है। एक विकासशील और प्रगतिशील समाज की कानूनी संस्थाओं को परिवर्तनशील समाज तथा आर्थिक सच्चाइयों के अनुकूल बनना पड़ता है। उन्हें नई प्रवृत्तियों और आकांक्षाओं को स्वीकार करना चाहिए।

 स्पष्ट है कि धारा 370 और उससे संबद्ध प्रावधानों और जम्मू-कश्मीर के पृथक संविधान को अवश्य ही समाप्त कर देना चाहिए, केवल इसलिए नहीं कि ऐसा करना कानूनी और संवैधानिक रूप से सम्भव है वरन इसलिए भी कि हमारे पिछले इतिहास और वर्तमान जीवन की मूल और विस्तृत आवश्यकता की महत्वपूर्ण पूर्ति के लिए यह जरूरी है। इस धारा तथा इससे सम्बन्धित प्रावधानों को समाप्त करने की आवश्यकता है। यह असमानता तथा अन्याय को बनाए रखने का साधन बना हुआ है। यह भ्रष्ट कुलीनतंत्र के विकास और उसके बने रहने को सुविधाएं देना है। यह रूढि़वादी और पक्षपातपूर्ण शक्तियों को जीवित रखता तथा बढ़ावा देता है। यह दो राष्ट्रों के सिद्धान्त को परोक्ष रूप से मान्यता देता है। यह अलगाववादी भावनाओं को जन्म देने के केन्द्र के रूप में कार्य करता है। यह युवाओं के मस्तिष्क में झूठी धारणाएं भरता और संकीर्ण भावनाएं तथा संकुचित वफादारी पैदा करता है। यह क्षेत्रीय तनावों और संघर्षों को उठाता है और उपलब्ध स्वायत्तता को भी क्रियात्मक रूप में अनुपलब्ध बना देता है। इस धारा के बिना भी कश्मीर का विशिष्ट व्यक्तित्व तथा सांस्कृतिक अस्मिता की सुरक्षा की जा सकती है। 

समय की मांग है कि फसाद की जड़ धारा-370 को समाप्त किया जाए और जम्मू-कश्मीर में निवेश के लिए रास्ता खोल वहां विकास किया जा सके।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

देश की सबसे बड़ी और तेज WhatsApp News Service से जुड़ने के लिए हमारे नंब 7400023000 पर Missed Call दें। इस नंबर को Save करना मत भूलें।