Monday, September 24, 2018 09:07 AM

भावनाओं से खिलवाड़ का परिणाम

पिछले दिनों कश्मीर घाटी में नेशनल कांफ्रेंस के सर्वेसर्वा व जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला विरुद्ध मस्जिद में नमाज पढऩे के दौरान नारेबाजी व जूता फेंकने की घटना और अमेरिका में दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष मनजीत सिंह की पगड़ी उतारनी व उनकी पिटाई करनी व पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री और अकाली दल बादल के अध्यक्ष सुखबीर बादल के ओएसडी की जमकर पिटाई तथा लंदन में अलगावादी सिखों द्वारा भारत विरोधी नारों की गहराई में जाए तो पायेंगे कि यह सब घटनाएं कोई अचानक नहीं हुई है। इन सभी घटनाओं को जो एक बात जोड़ती है वह है राजनीतिज्ञों व राजनीतिक दलों द्वारा धर्म व क्षेत्र के नाम पर लोगों की भावनाओं से किया गया खिलवाड़।

जम्मू-कश्मीर और पंजाब के राजनेताओं ने पिछले 4 दशकों से जिस तरह सत्ता हासिल करने के लिए स्थानीय लोगों की धर्म व क्षेत्र के नाम पर भावनाओं को भड़काया तथा दिल्ली जो कि देश की राजधानी है उसे उसी तरह लोगों सम्मुख रखा जैसे वहां जनप्रतिनिधियों का राज न होकर कोई मुगलिया या अंग्रेजी हकूमत का प्रतिनिधि वहां बैठा है। प्रत्येक प्रदेश की अपनी समस्याएं होती हैं। यह राजनीति से लेकर आर्थिक व सामाजिक हो सकती है, लेकिन जब हम प्रत्येक पर्व व त्योहार पर केवल विरोध के लिए विरोध करते हुए दिल्ली को क्षेत्र व धर्म के विरुद्ध बताते चले जाएंगे तो उस बात के परिणाम भी तो भुगतने ही पड़ेंगे।

जम्मू-कश्मीर संबंधी आई एक रिपोर्ट अनुसार घाटी में आतंकवाद के प्रति युवाओं का रुझान पिछले एक दशक में बढ़ा है, विशेषतया पिछले वर्ष स्थानीय युवा सबसे अधिक आतंकवादी समूहों से जुड़े हैं। अधिकारियों के अनुसार 31 जुलाई तक 131 युवा विभिन्न आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इसमें सबसे बड़ी संख्या दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले की है, जहां से 35 युवा शामिल हुए हैं। पिछले साल 126 स्थानीय लोग इन गुटों से जुड़े थे। अधिकारियों ने बताया कि कई युवा अंसार गजवत-उल-हिंद में शामिल हो रहे हैं। यह समूह अलकायदा के समर्थन का दावा करता है और इसका नेतृत्व जाकिर रशीद भट उर्फ जाकिर मूसा करता है। वह पुलवामा जिले के त्राल क्षेत्र के एक गांव का रहने वाला है। इस समूह की स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है क्योंकि मूसा एकमात्र ऐसा आतंकी है जिसने हुर्रियत कांफ्रेंस के अलगाववादी नेताओं का दबदबा खत्म किया है और कश्मीर को राजनीतिक मुद्दा बताने पर सर कलम कर देने की धमकी दी है। कश्मीर घाटी में सुरक्षा स्थिति पर नजर रखने वाले अधिकारियों का मानना है कि 'शरीयत या शहादत' के मूसा के नारे ने पाकिस्तान के समर्थन वाले वर्षों पुराने नारे की जगह ले ली है। उसने इंजीनियरिंग कॉलेज की पढाई बीच में ही छोड़ दी। हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद इस 24 वर्षीय युवक ने युवाओं को आकर्षित किया है। वानी 2016 में मारा गया था। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि वह पढ़ाई के साथ खेल में भी अच्छा था और अंतर राज्यीय कैरम चैंपियनशिप में उसने राज्य का प्रतिनिधित्व किया था। यह बड़ी वजह है कि वह घाटी में कई नौजवानों के लिए नायक की तरह उभरने लगा। सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों ने कहा कि शोपियां, पुलवामा, अनंतनाग, कुलगाम और अवंतीपुरा जिलों वाले सबसे अशांत दक्षिण कश्मीर में सबसे ज्यादा युवा आतंकवादी संगठनों में शामिल हो रहे हैं। कश्मीर घाटी में इन पांच जिलों से 100 से ज्यादा युवक विभिन्न आतंकी समूह में शामिल हुए हैं।

पंजाब में भी 1978 में जब भिंडरावाले का नाम बजने लगा था तब से लेकर आज तक धर्म व क्षेत्र के नाम पर की जाने वाली राजनीति जोर पकड़ती गई। गुरुपर्व हो या कोई अन्य पर्व हो अधिकतर राजनेता एक दूसरे को कोसते-कोसते यह भूल जाते हैं कि वह मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हैं। पंजाब में 1980-90 के दशक में जो खून खराबा हुआ और जम्मू-कश्मीर में 1989 पाकिस्तान द्वारा शुरू की गई आतंक की आग की आज भी खुले शब्दों में निन्दा करने से संबंधित क्षेत्र का एक वर्ग विशेष तथा कुछ राजनेता व बुद्धिजीवी नहीं करते क्योंकि उनको लगता है कि ऐसा करने से उनका आधार कमजोर हो जाएगा।

जम्मू-कश्मीर व पंजाब में अल्पमत समुदाय बहुमत में है और उपरोक्त स्थिति का राजनीतिक लाभ लेने हेतु राजनीतिक दल व उनके नेता जन साधारण की समस्याओं को सुलझाने की बजाय जनसाधारण को धर्म व क्षेत्र के नाम पर उनकी भावनाओं को भड़काते रहते हैं और स्थिति को उलझाकर रख देते हैं। जो कुछ जम्मू-कश्मीर व पंजाब में हुआ या हो रहा है वह देश के अन्य राज्यों में भी देखा जा सकता है। बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तो केंद्र की सरकार पर भी जन भावनाओं से खेलने का आरोप लगा रहा है। कांग्रेस व उनके सहयोगी तो भाजपा को पहले से ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश में है।

उपरोक्त स्थिति ने देश में एक टकराव व अविश्वास की भावना को जन्म दिया है। इसी बात का लाभ लेने के लिए भारत विरोधी शक्तियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हो कार्य कर रही हैं। भारत की आंतरिक राजनीति के नकारात्मक पहलू को अपना आधार बनाकर विदेश में जब कोई कुछ कहता व करता है तो उसकी प्रतिक्रिया में जब स्थानीय नेता उनकी बात को ले चुप्पी साध लेते हैं या समर्थन नहीं करते तो उस कारण विदेशों में बैठे लोग जो हैं तो भारतीय मूल के लेकिन भारत के नागरिक नहीं वह वही कुछ करते हैं जो लंदन या अमेरिका में हुआ। क्योंकि उन्हें लगता है कि कल तक यह स्वयं दिल्ली का विरोध कर रहे थे आज हमारा साथ नहीं दे रहे।

समय की मांग है कि देश की एकता व अखण्डता को चुनौती देने वाले प्रत्येक वर्ग, संस्था तथा देश का चाहे वह पाकिस्तान, इंग्लैंड, कनाडा या कोई अन्य हो उसका विरोध कड़े से कड़े ढंग से होना चाहिए तथा भारतीय नागरिकों के प्रति हिंसात्मक घटना की निन्दा कड़े शब्दों में होनी चाहिए। भारतीय नेताओं जिनकी राजनीति धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र पर आधारित है उनको भी लोगों की भावनाओं से खेलने का खेल बंद करना चाहिए तथा खुलकर देश की एकता व अखण्डता को चुनौती देने वालों का विरोध करना चाहिए। फारुख अब्दुल्ला और मनजीत सिंह ने जिस तरह खुले शब्दों में अलगाववादियों का विरोध किया है उसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। समाज व सरकार का कर्तव्य है कि देश की एकता व अखण्डता के लिए खड़े लोगों का साथ व समर्थन दें।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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