Thursday, November 15, 2018 01:13 AM

गंगा और गाय

गंगा और गाय का हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति में भी एक विशेष स्थान है। विश्व के किसी भी भाग में आप उपरोक्त दो का नाम ले तो आपको भारत की ही याद आएगी। यह दोनों भारत के जनसाधारण की जीवन रेखा ही हैं। इसी कारण इन्हें हिन्दू तो मां की तरह ही देखता और पूजता है। गौ और गंगा दोनों के नाम पर मर-मिटने वाला हिन्दू उपरोक्त दोनों के प्रति लापरवाह भी है। इस लापरवाही का ही कारण है कि गंगा मैली होती जा रही है और गाय सडक़ पर दुत्कारी जा रही है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने गंगा नदी की स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के उन्नाव शहर के बीच गंगा का जल पीने और नहाने योग्य नहीं है। एनजीटी ने कहा कि मासूम लोग श्रद्धापूर्वक नदी का जल पीते हैं और इसमें नहाते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि इसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर हो सकता है। अगर सिगरेट के पैकेटों पर यह चेतावनी लिखी हो सकती है कि यह ‘स्वास्थ्य के लिए घातक’ है, तो लोगों को (नदी के जल के) प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जानकारी क्यों नहीं दी जाए?’ एनजीटी प्रमुख ए के गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘हमारा नजरिया है कि महान गंगा के प्रति अपार श्रद्धा को देखते हुए, मासूस लोग यह जाने बिना इसका जल पीते हैं और इसमें नहाते हैं कि जल इस्तेमाल के योग्य नहीं है। गंगाजल का इस्तेमाल करने वाले लोगों के जीवन जीने के अधिकार को स्वीकार करना बहुत जरूरी है और उन्हें जल के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए।’ एनजीटी ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को सौ किलोमीटर के अंतराल पर डिस्प्ले बोर्ड लगाने का निर्देश दिया ताकि यह जानकारी दी जाए कि जल पीने या नहाने लायक है या नहीं। एनजीटी ने गंगा मिशन और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दो सप्ताह के भीतर अपनी वेबसाइट पर एक मानचित्र लगाने का निर्देश दिया जिसमें बताया जा सके कि किन स्थानों पर गंगा का जल नहाने और पीने लायक है।
सदियों से गंगा भारतीयों की जीवन रेखा है। गंगा के किनारे करोड़ों लोग बसे हैं न तो गंगा के किनारे लोगों ने और न ही गंगा में डूबकी लगाकर अपने धन्य मानने वाले लोगों ने गंगा प्रति अपने कर्तव्य को समझने और निभाने की कोशिश की है। अपनी जीविका कमाने और अपनी आस्था की मांग को पूरा करने वाले अगर गंगा के प्रति अपने कर्तव्य को निभाते तो आज गंगा की यह स्थिति न होती।
गंगा को लेकर पद्म पुराण में लिखा है कि जैसे अग्नि को छूते ही रूई और सूखे तिनके क्षण भर में भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार गंगाजी अपने जल का स्पर्श होने पर मनुष्यों के सारे पाप एक ही क्षण में धो देती है।
इंसान के बढ़ते पापों का बोझ अब गंगा उठाने में असफल हो रही है। इसी कारण उसका पानी आज पीने के काबिल भी नहीं रहा है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने सरकार व समाज को चेतावनी देते हुए अपने-अपने कर्तव्य को निभाने को कहा है। अगर सरकार व समाज अब भी सतर्क हो अपना कर्तव्य नहीं निभाते तो हमारी भावी पीढिय़ों का भविष्य ही अंधकारमय हो जाएगा।
गौ को लेकर अथर्ववेद के मंत्र (11-3-34) में कहा गया है ‘धेनु सदनंरयीणांम’ अर्थात गाय सम्पत्तियों का भंडार है। ऋगवेद के मंत्र (6-28-6) में गाय की महिमा का गान करते हुए कहा गया है कि ‘यू यं गावो भेदयथा कृशंचिदश्रीर चित् कृणुथा सुप्रतीकम् भद्र, गृहं कृणुथ भद्रंवाचो बृहद वो वय उच्चते सभासु।’ अर्थात् हे गोओं! तुम दुर्बल को भी बलवान बना देती हो और कान्तिरहित मुख को भी सुन्दर बना देती हो, तुम घर को कल्याणमय और सुखमय बना देती हो। हे भद्रवाणी वाली गोओं। सभाओं में तुम्हारे अमृतमय दुग्ध की बड़ी महिमा गायी जाती है। ऋगवेद के एक अन्य मंत्र (8-101-15) में भी गौ महिमा का गान करते हुए कहा गया है कि ‘माता रुद्राणं दुहिता वसूना, स्वसादित्यानाम् मृतस्य नाभि: प्र नु बोचं चिकितुषे मा जनाय गामनागाभदिति वघिष्ट।’ अर्थात गाय/रुद्रों की माता है, वसुओं की पुत्री और आदित्यों की बहन है। वह घी, दूध आदि अमृत की केंद्र है। विचारशील मनुष्यों को कहा गया है कि जो विशेष उपकारी और वध न करने योग्य गाय है, उसका वध मत करो। शतपथ ब्राह्मण के श्लोक (3-3-3-1) में कहा गया है कि ‘महाँस्तवेव गोर्महिमा’ अर्थात् गौ की महिमा महान है। गाय विश्व का समस्त मानव जाति की मां के समान पालन पोषण करती है। इसलिए शास्त्रों में ‘गावो ‘विश्वस्य मातर:’ कहा गया है। मनुष्य की सभी कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ होने के कारण गाय को कामधेनु कहा जाता है। अथर्ववेद के मंत्रों 4-34-8 में भी कहा गया है कि विश्वरूपा घेनु: कामदुधा मेऽस्तु गाय अत्यन्त बुद्धिमान एवं संवेदनशील प्राणी है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पशु कल्याण विभाग के प्रोफेसर श्री डोनाल्ड बूम का कहना है कि ‘गायें बौद्धिक चुनौतियों को हल करने के लिए सदैव उत्साहित रहती हंै। इंग्लैंड के नेशनल फार्मर्स यूनियन के अध्यक्ष श्री टिम सेल का दावा है कि गायों में भावनात्मक उतार-चढ़ाव आते हैं। यज्ञ और दान का तो मुख्य स्तम्भ गाय ही हैं। दानों में गोदान सर्वश्रेष्ठ दान माना जाता है। इसलिए हिन्दुओं में महत्त्वपूर्ण अवसरों पर आज भी गोदान करने की परम्परा है। वाल्मीकि रामायण (1-14-50) में लिखा है कि गवां शतसहस्त्राणि दश तभ्यों ददौ नृप: अर्थात् यज्ञ के अवसर पर महाराज दशरथ ने दस लाख गायें दान कीं। गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरितमानस में गाय के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए लिखा है सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपा हृदय बस आई। राजा जनक ने याज्ञवल्क्य ऋषि को सोने से मढ़े हुए सींगों वाली 1000 गायें दान में देकर अपने को परम सौभाग्यशाली और धन्य माना था। महाभारत के अनुशासन पर्व के 83/17-21 श्लोकों में ब्रह्मा जी द्वारा इन्द्र को गाय का महत्त्व बताते हुए लिखा है-‘गाय यज्ञों का अंग है, बल्कि वह ही साक्षात यज्ञ है। वह अपने दूध और घी से प्रजा का पालन पोषण करती है तथा उसकी सन्तान बैल खेती के काम आते हैं और तरह-तरह के अन्न, दाल, तिलहन, कपास, ईख आदि पैदा करते हैं, जिन से यज्ञ सम्पन्न होते हैं और हव्य-कव्य का भी काम चलता है। महर्षि च्यवन ने अपने शरीर का मूल्य राजा नहुष का चक्रवर्ती राज्य नहीं अपितु एक गाय निर्धारित किया था। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा था, गौओं में कामधेनु मैं हूं।’
गाय और गंगा दोनों भारतीय संस्कृति के आधार स्तम्भ है लेकिन सरकार व समाज दोनों के प्रति ही उदासीन है। इसी कारण गाय सडक़ों पर दुत्कारी जा रही है या गौशालाओं में आये दिन भुखमरी या लापरवाही के कारण मर रही हैं। गंगा का पानी नहाने व पीने लायक नहीं रहा। वर्तमान पर ही हमारा भविष्य आधारित होता है। उपरोक्त तथ्यों को देखकर कह सकते हैं कि समाज विशेषतया हिन्दू समाज का भविष्य अंधकारमय ही है।



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।


 

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