राजनीति को साफ-सुथरी करने में जुटा सुप्रीम कोर्ट

10:46 AM Feb 18, 2020 |

राजनीति के अपराधीकरण पर सुर्पीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। उसने राजनीतिक दलों को आदेश दिया है कि वे अपने उम्मीदवारों पर दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारियां और इनके बावजूद इन उम्मीदवारों के चयन के कारण अपनी वेबसाइटों पर डालें। सुर्पीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा उम्मीदवारों के चयन के ४८ घंटे के भीतर हो जाना चाहिए। राजनीतिक दलों को ये जानकारियां अपने फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के अलावा एक राष्ट्रीय और एक स्थानीय अखबार में भी देनी होंगी। सुर्पीम कोर्ट ने कहा है कि ७२ घंटों के भीतर ये जानकारियां चुनाव आयोग के पास भी पहुंच जानी चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘उम्मीदवारों को चुनने की वजह उनकी योग्यता होनी चाहिए, यह नहीं कि वे जीत सकते हैं। जीतने की संभावना अकेला कारण नहीं हो सकती।’ सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक अगर राजनीतिक दल जानकारियां नहीं देते या चुनाव आयोग इस आदेश का पालन सुनिश्चित नहीं करता तो इसे अदालत की अवमानना माना जाएगा। सितंबर २०१८ में सुर्पीम कोर्ट की एक पांच सदस्यीय पीठ ने केंद् सरकार से इस मुद्दे पर तुरंत कानून बनाने के लिए कहा था। उसका कहना था कि इसके जरिये ऐसे लोगों के चुनाव लडऩे और पार्टी पदाधिकारी बनने पर प्रतिबंध लगाया जाए जिन पर गंभीर मामले चल रहे हैं, लेकिन कुछ नहीं हुआ। भाजपा नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इसके बाद सुर्पीम कोर्ट में एक अवमानना याचिका दाखिल की थी। 

इसकी सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा था कि उम्मीदवारों के खिलाफ मामलों की जानकारियां सार्वजनिक किए जाने का कोई असर नहीं हो रहा और राजनीतिक दलों को निर्देश दिया जाना चाहिए कि वे ऐसे लोगों को टिकट ही न दें। जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस एस रवींद् भट की पीठ ने इसे राष्ट्रहित का मामला बताते हुए बीती ३१ जनवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। पीठ ने कहा था कि इस समस्या को रोकने के लिए कुछ कदम उठाने होंगे। २०१९ में लोकसभा चुनाव जीतने वाले ४३ फीसदी नेता आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं।  बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण को समाप्त करने को लेकर फ्रेमवर्क तैयार करने का चुनाव आयोग को निर्देश दिया था। न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन और न्यायमूर्ति रवीन्द् भट की पीठ ने आयोग से कहा था, ‘‘राजनीति में अपराध के वर्चस्व को खत्म करने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार किया जाए।’’ न्यायालय ने इस पर जवाब के लिए आयोग को एक सप्ताह का समय भी दिया था। न्यायालय ने राजनीति के अपराधीकरण पर सख्त टिप्पणी की है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि देश में राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए कुछ तो करना ही होगा। चुनाव आयोग का कहना है कि चुनाव लडऩे वाले तमाम उम्मीदवारों द्वारा उनकी आपराधिक रिकॉर्ड देने मात्र से समस्या हल नहीं हो सकती। 

आयोग ने न्यायालय के वर्ष २०१८ में दिए गए उस फैसले की याद दिलाई जिसके तहत उम्मीदवारों से उनके आपराधिक रिकॉर्ड को इलेक्ट्रॉनिक एवम् प्रिंट मीडिया में घोषित करने को कहा गया था। आयोग ने कहा कि राजनीति का अपराधीकरण रोकने में उम्मीदवारों द्वारा घोषित आपराधिक रिकॉर्ड से कोई मदद नहीं मिली है। साल २०१८ के सितंबर माह में ५ जजों की संविधान पीठ ने केंर्द सरकार से कहा था कि वह गंभीर अपराध में शामिल लोगों के चुनाव लडऩे और पार्टी पदाधिकारी बनने पर रोक लगाने के लिए तत्काल कानून बनाए।  आयोग ने सुझाव दिया कि उम्मीदवारों से आपराधिक रिकॉर्ड मीडिया में घोषित करने के बजाय ऐसे उम्मीदवारों को टिकट से वंचित कर दिया जाना चाहिए जिनका पिछला रिकॉर्ड आपराधिक रहा हो। ५४२ सांसदों में से २३३ यानि ४३ फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। हलफनामों के हिसाब से १५९ यानि २९ र्पतिशत सांसदों के खिलाफ हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर मामले लंबित है। भाजपा के ३०३ में से ३०१ सांसदों के हलफनामे के विश्लेषण में पाया गया कि साध्वी प्रज्ञा सिंह सहित ११६ सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। २०४ लंबित मामलों वाले केरल से नवनिर्वाचित कांग्रेसी सांसद डीन कुरियाकोस हैं सूची में प्रथम हैं। कांग्रेस के ५२ में से २९ सांसद भी आपराधिक मामलों में घिरे हैं।

सत्तारूढ़ राजग के घटक दल लोजपा के सभी छह निर्वाचित सदस्यों, बसपा के आधे (१० में से ५), जदयू के १६ में से १३, तृणमूल कांग्रेस के २२ में से नौ और माकपा के तीन में से दो सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। इस मामले में बीजद के १२ निर्वाचित सांसदों में सिर्फ एक सदस्य ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले की हलफनामे में घोषणा की है। आपराधिक मामलों में फंसे सर्वाधिक सांसद केरल और बिहार से चुन कर आए। केरल से निर्वाचित ९० फीसदी, बिहार से ८२ फीसदी, पश्चिम बंगाल से ५५ फीसदी, उत्तर र्पदेश से ५६ और महाराष्ट्र से ५८ प्रतिशत सांसदों पर केस लंबित। वहीं सबसे कम नौ प्रतिशत सांसद छत्तीसगढ़ के और १५ प्रतिशत गुजरात के हैं।  २०१४ के चुनाव में निर्वाचित ऐसे सांसदों की संख्या १८५ (३४ प्रतिशत) थी, ११२ सांसदों पर गंभीर केस चल रहे थे।