सुभाष चन्द्र बोस का भारत

बंगाल के युवाओं को 1926 में संबोधित होते हुए सुभाषचन्द्र बोस ने कहा था 'मनुष्य-जीवन में जिस प्रकार शैशव, यौवन, प्रौढ़ावस्था और वार्धक्य आते हैं, राष्ट्रीय जीवन में भी उसी प्रकार उसी क्रम से ये अवस्थाएं देखने को मिलती हैं। मनुष्य मरता है और मृत्यु के बाद नया कलेवर धारण करता है। राष्ट्र भी मरता है और मरण के भीतर से ही नवजीवन प्राप्त करता है। फिर भी व्यक्ति और राष्ट्र में अन्तर यह है कि सब राष्ट्र मृत्यु के बाद जीवन नहीं पाते। जिस राष्ट्र के अस्तित्व की कोई सार्थकता नहीं रह जाती, जिस राष्ट्र की हृदय-गति बिल्कुल स्तब्ध हो जाती है, वही पृथ्वी-तल से विलुप्त हो जाता है अथवा कीट-पतंगे की भांति जीवन धारण करता रहता है और इतिहास के पृष्ठों से बाहर उसके अस्तित्व का कोई निदर्शन नहीं रह जाता। 

भारतीय राष्ट्र एक से अधिक बार मरा है, किन्तु मृत्यु के बाद पुनर्जीवित भी हुआ है। उसका कारण यह है कि भारत के अस्तित्व की सार्थकता थी और अब भी है। भारत का एक संदेश है जिसे संसार के कोन-कोने तक पहुंचाना है, भारत की संस्कृति (कल्चर) में ऐसा कुछ है, जो विश्व-सभ्यता वास्तविक उन्मेष नहीं पा सकती। केवल यही नहीं, विज्ञान, कला, साहित्य, व्यवसाय, वाणिज्य-इन सब दिशाओं में भी हमारा राष्ट्र विश्व को कुछ देगा और सिखाएगा। इसीलिए भारत के मनीषियों ने अन्धकारपूर्ण युगों में भी अपलक भारत का ज्ञानप्रदीप जलाये रखा। हम उन्हीं की संतान हैं। अपना राष्ट्रीय लक्ष्य प्राप्त किये बिना क्या हम मर सकते हैं?

मनुष्य-देह पंचभूत में मिल जाने पर भी जीवात्मा कभी नहीं मरती। उसी प्रकार एक राष्ट्र के मर जाने पर भी उसकी शिक्षा-दीक्षा तथा सभ्यता की क्रमिक धारा ही उसकी आत्मा होती है। जब किसी राष्ट्र की निर्माणशक्ति चुक जाए, तो समझना चाहिए कि वह मरणोन्मुख है। आहार, निद्रा और सन्तानोत्पत्ति ही तब उसकी कार्य-सूची बन जाती है और लोक-लीक चलना ही एकमात्र नीति। इस दशा में भी कोई-कोई राष्ट्र बचा रहता है, यदि उसके अस्तित्व की सार्थकता रही तो। जब कभी अन्धकारपूर्ण युग किसी राष्ट्र को ग्रस लेता है तो वह किसी प्रकार अपनी शिक्षा-दीक्षा और सभ्यता की रक्षा करता रहता है, अन्य राष्ट्रों में विलीन होकर निश्शेष नहीं हो जाता है। उसके बाद अदृष्ट  अथवा भगवान् के इंगित से फिर उसे नव-जागरण की झलक मिलती है। अन्धकार धीरे-धीरे मिटने लगता है, नींद टूटती है, आंखे खुलती हैं और उसकी निर्माण-शक्ति पुन: लौट आती है। सहस्रदल पद्म की भांति उस राष्ट्र का जीवन-धर्म फिर प्रकट होता है और वह अपने-आप को नये-नये रूपों, नये-नये भावों तथा नयी-नयी दिशाओं में अभिव्यक्ति देने लगता है। भारत राष्ट्र इसी प्रकार अनेक मृत्यु और जागरण के अन्तरावलम्बन से गतिशील है, कारण, उसका एक मिशन रहा है-भारतीय सभ्यता का एक उद्देश्य है, जो आज भी सफल नहीं हुआ है।

भारत के इस मिशन में जिसकी आस्था है वह भारतवासी ही मात्र जीवित है न कि वे तैंतीस कोटि लोग जो सिर्फ जिन्दा रहने के लिए जिन्दा हैं। भारत के और बंगाल के युवकों का यह विश्वास है, तभी वे जीवित हैं। जब मुझे महीनों-महीनों भारत के बाहर जेलखानों में रहना पड़ा तो उन दिनों अकसर मेरे मन में यह प्रश्न उठता-किसके लिए, किसकी प्रे्ररणा से हम जेल की यातनाएं सहकर भी टूटे नहीं बल्कि और अधिक शक्तिशाली हो उठे हैं? भीतर से इस प्रश्न का जो उत्तर मिलता उसका आशय है-भारत का एक मिशन है, एक गौरवपूर्ण भविष्य है, भारत के उस भविष्य के उत्तराधिकारी हम हैं। नये भारत के मुक्ति के इतिहास की रचना हम ही कर रहे हैं हम ही करेंगे। यह आस्था है तभी सब दु:ख-कष्ट सह सकता हूं, भविष्य के अंधेरे को अस्वीकार कर सकता हूं, यथार्थ के निठुर सत्यों को आदर्श के कठोर आघात से धूल में मिला सकता हूं। यही वह अटल, अचल आस्था है, जो बंगाल की युवक-शक्ति को मृत्युंजी बनाये है। 

यह श्रद्धा, यह आत्म-विश्वास जिसमें है वही व्यक्ति स्रष्टा है, वही देश-सेवा का अधिकारी है। संसार में जो कुछ भी महत् प्रचेष्टा है, वह मानव-मन का आत्म-विश्वास और निर्माण-शक्ति की प्रतिच्छाया मात्र है। अपने और अपने राष्ट्र के ऊपर जिसे भरोसा नहीं है वह व्यक्ति कभी कोई निर्माण कर सकता है भला?...

नीलकंठ को आदर्श मानकर जो व्यक्ति कह सकता है-आनन्द का उत्स मेरे अन्तर में है, इसलिए मैं संसार के सब दु:ख कष्टों को अपने हृदय में समाहित कर सकता हूं, जो व्यक्ति कह सकता है-कठोर से कठोर यन्त्रणा और क्लेश मेरे सर-माथे, क्योंकि इसी के द्वारा मुझे सत्य का संधान मिला है, वही व्यक्ति साधना में सिद्धि प्राप्त कर सकता है। हमें आज इस साधना में सिद्ध होना है। जो नये भारत का निर्माण करना चाहते हैं उन्हें मात्र अपना सब-कुछ खोना है। जीवन भर सिर्फ उत्सर्ग करते जाओ, यहां तक कि अपने-आप को पूर्णत: देकर कंगाल हो जाओ-प्रतिदान में कुछ चाहो मत। सम्पूर्ण जीवन खोकर ही जीवन पाया जा सकता है। जो ऐसे साधक होंगे उनकी सम्पदा होगी मात्र अन्तर का आत्मविश्वास, आदर्श के प्रति अनुराग और आनन्द-बोध।'

भारत के जिस मिशन की बात सुभाषचन्द्र बोस कर रहे हैं वह तभी पूरा होगा जब भारतवासी राष्ट्र की एकता व अखण्डता के लिए एकजुट होकर कार्य करेंगे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वार्थ व सकीर्णता की राह को त्यागकर त्याग व परमार्थ की राह पर चलना होगा। जिस दिन हम भारतवासी त्याग व परमार्थ की राह पर चलने को अपने जीवन का लक्ष्य बना लेंगे उस दिन बोस का भारत प्रति जो सपना था वह साकार हो जाएगा।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।