सनी दयोल का स्टारडम

2019 के लोकसभा चुनाव का छठा चरण पूर्ण होने के बाद अब सबकी नजर हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और पंजाब सहित 19 मई को होने वाले सातवें चरण के मतदान पर टिक गई हैं। पंजाब, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ की तमाम सीटें अपने आप में विशेष महत्व रखती हैं। अधिकतर सीटों पर एनडीए लाभ वाली स्थिति में है लेकिन मुकाबला भी बहुत कठिन है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की पहली राजनीतिक परीक्षा है तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की आखिरी राजनीतिक परीक्षा ही लगती है। क्योंकि लोकसभा चुनावों के बाद आगामी विधानसभा चुनावों तक प्रदेश की राजनीति के साथ-साथ कांग्रेस के भीतर भी बड़े बदलाव की पूरी संभावना है। वीरभद्र सिंह की आयु को देखते हुए कहा जा सकता है कि वीरभद्र सिंह को युवा पीढ़ी के लिए जगह छोडऩी पड़ सकती है।

पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच मुख्य रूप से मुकाबला है लेकिन इनके साथ-साथ विचारिक मतभेद होने के कारण बगावत कर चुनावी मैदान में उतरे उम्मीदवार भी कुछ एक सीटों के परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में सबसे चर्चित सीट गुरदासपुर लोकसभा सीट है। इसके बाद बठिंडा तथा फिरोजपुर की सीटें हैं जहां से बंठिडा में हरसिमरत कौर बादल और फिरोजपुर में उनके पति सुखबीर सिंह बादल चुनाव लड़ रहे हैं। उपरोक्त तीनों सीटों पर अकाली-भाजपा गठबंधन लाभ वाली स्थिति में अवश्य है लेकिन कांग्रेस ने भी अपना सबकुछ उपरोक्त सीटों पर झोंक दिया है।

दयोल परिवार और जाखड़ परिवार की प्रतिष्ठा तो दांव पर है ही लेकिन सुनील जाखड़ का राजनीतिक भविष्य भी दांव पर है। कै. अमरेन्द्र सिंह ने तो सुनील जाखड़ को पंजाब का भावी मुख्यमंत्री कहकर स्थिति को और रोमांचकारी बना दिया है। कांग्रेस के लिए भी गुरदासपुर सीट अति महत्वपूर्ण है तभी तो प्रियंका गांधी यहां रोड शो करने जा रही हैं।

दयोल परिवार के लिए सनी दयोल का जीतना कितना महत्वपूर्ण है इस बात का अहसास तो सनी के भाई बॉबी दयोल और पिता धर्मेंद्र का वहां डेरा डालकर बैठ जाने से पता चलता है। एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए धर्मेंद्र ने कहा कि वह भाषण देने के लिए नहीं आए, बल्कि अपने लोगों के साथ बातें करने आए हैं। उन्होंने कहा कि सनी की जीत के बाद इलाके की नुहार बदलने और हलके के विकास का जिम्मा उनका है। उन्होंने अपनी जिंदगी के पुराने पलों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने खुद बीकानेर से लोकसभा सांसद होते हुए वह काम करवाए हैं, जो 50 साल के समय दौरान नहीं हो सके थे। उन्होंने कहा कि गुरदासपुर से पूर्व सांसद विनोद खन्ना के हलके के विकास के लिए जो शुरुआत हुई थी, वह पिछले दो साल के समय दौरान आए सांसद की अनदेखी के कारण रुक गई है, उन्होंने कहा कि उनके और सनी की नसों में पंजाब का खून बहता है। उन्होंने न तो अपने सिनेमा जीवन में और न ही राजनीतिक जीवन में हलके स्तर की राजनीति का सहारा लिया है। सनी दयोल सहित पूरे परिवार में यही संस्कार है कि सस्ती शोहरत के बजाय काम किया जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि सनी को जिता दो दयोल परिवार ताउम्र हलके की सेवा करेगा। एक बात तो स्पष्ट है कि सनी दयोल के प्रति लोगों का विशेष आकर्षण है। पिता धर्मेंद्र और भाई बॉबी के वहां डेरा डालने से कांग्रेस उम्मीदवार सुनील जाखड़ की मुश्किल कहीं अधिक बढ़ गई है। दयोल परिवार के स्टारडम को तोडऩा सुनील जाखड़ ही नहीं कांग्रेस पार्टी के लिए भी मुश्किल दिखाई दे रहा है।

सुनील जाखड़ की मुश्किलें उस समय और बढ़ जाती हैं जब मतदाता राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को राजनीतिक तराजू पर तोलता है। राहुल गांधी पहले से अधिक सक्रिय और राजनीतिक रूप से परिपक्व दिखाई दे रहे हैं लेकिन कटु सत्य यह भी है कि वह मोदी के विकल्प के रूप में अपने को स्थापित करने में असफल रहे हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी इसी बात को समझते हुए राहुल गांधी के साथ प्रियंका गांधी वाड्रा को चुनावी महाभारत में उतारा है। देर से लिए इस निर्णय का कांग्रेस को कितना लाभ हुआ इसका पता तो 23 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद ही चल पाएगा लेकिन राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य पर अवश्य प्रश्न चिन्ह लग गया है। 

सनी दयोल का सहज व सरल स्वभाव आमजन को प्रभावित कर रहा है। दयोल परिवार का स्टारडम और मोदी का नाम दोनों ने मिलकर सुनील जाखड़ के सामने चुनौतियों का पहाड़ सा खड़ा कर दिया है क्या सुनील जाखड़ इस पहाड़ को पार कर पाएंगे?

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।