सामाजिक कारण

कमजोर होते परिवारिक व इंसानी रिश्तों के कारण जहां अकेलापन बढ़ रहा है, वहीं मानसिक रोगी भी बढ़ रहे हैं। पहले संयुक्त परिवार होते थे तो परिवार का कोई भी सदस्य अगर किसी कारण मानसिक रूप से कमजोर महसूस करने लगता था या किसी कारण हताश हो अपने को अकेला महसूस करता था, तो संयुक्त परिवार उसको संभालने के लिए हमेशा तैयार रहता था। समय के साथ परिवार व समाज दोनों में परिवर्तन आता चला गया। परिवार छोटा होता गया और समाजिक रिश्तें कमजोर होते गए इसी कारण जहां अकेलापन बढ़ा वहीं मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ती चली गई। 

स्वयं केंद्रित व्यक्ति अपनी जवानी में तो अपने को सुरक्षित व खुश महसूस करता है लेकिन जब किसी दबाब का सामना करना पड़ता है तो वह अपने को अकेला पाता है। बुढ़ापे में यही अकेलापन उसे मानसिक रोगी तक की स्थिति में ला खड़ा करता है। उपरोक्त स्थिति भारत में ही नहीं बल्कि इंग्लेंड जैसे देश में भी है, जहां प्रत्येक व्यक्ति को बुनियादी सुविधाएं मिली हुई हैं और जीवन की संध्या भी सुरक्षित होती है। ब्रिटेन सरकार ने इसी साल जनवरी में अकेलेपन की समस्या से निपटने के लिए एक अलग मंत्रालय बनाया। ये विपक्षी सासंद जो कॉक्स की याद में शुरू किया गया। जून 2016 में दक्षिणपंथ कट्टरपंथी ने कॉक्स की हत्या कर दी थी। कॉक्स उन दिनों अकेलेपन के विषय पर शोध कर रही थीं, जिसका अधिकांश हिस्सा कंजरवेटिव पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने अपनी नई नीति में अपनाया है। प्रधानमंत्री थेरेसा ने इसके लिए अपने कैबिनेट से सुझाव मांगे थे, जिन पर अंतिम मुहर लग गई है। पॉलिसी में अकेले रहने वाले लोगों की तन्हाई दूर करने के लिए कई प्रावधान हैं। इसके तहत सबसे पहले डॉक्टर हर ऐसे इंसान को डांस क्लास जॉइन कराएगा। साथ ही कुकरी क्लासेज शुरू की जाएंगी। देश के हर डाक कर्मचारी को रोज ऐसे पांच लोगों के घर जाकर मुलाकात करनी होगी। वे ऐसे लोगों की पहचान करेंगे, जिनकी अपने परिवार या रिश्तेदार से महीने में एक बार भी बात न हुई हो। डाक कर्मचारियों को उनके साथ कुछ समय बिताना होगा। उसके बाद उनकी समस्याओं के आधार पर सोशल ग्रुप तैयार किए जाएंगे। ये सोशल ग्रुप हफ्ते में दो-तीन बाद एक जगह जुटेंगे और अलग-अलग सामाजिक गतिविधियों में शामिल होंगे।

 सरकार ने बुजुर्गों को अकेलेपन से बचाने के लिए 2023 तक का प्लान तैयार किया है। इसके तहत स्कूलों में बच्चों को सिलेबस में पढ़ाया जाएगा कि घर में बड़ों का ध्यान कैसे रखना है। अकेलेपन से जूझने के लिए बने मंत्रालय की मंत्री ट्रेसी क्राउच ने बताया कि ये संस्कार बच्चों में स्कूलों से ही शामिल करने होंगे।  मंत्री ट्रेसी क्राउच अनुसार आंकड़े बताते हैं कि बुज़ुर्गों के मुकाबले 16 से 24 साल के युवा ज्यादा तन्हा महसूस कर रहे हैं। सोशल मीडिया फिल्टरिंग के पीछे युवा जो कुछ भी देखते हैं, उसी को जब संपूर्ण मानने लगते हैं तो ये उन्हें प्रभावित करता है। इसलिए हमने इसके लिए अलग पॉलिसी बनाई है। 

पिछले दिनों जालंधर में वल्र्ड मेंटल हेल्थ डे पर एक विचार गोष्ठी कराई गई थी जिसमें मनोरोगियों को लेकर मुख्य वक्ता डॉक्टर निर्दोष गोयल ने 'बताया कि भारत में मनोरोगियों पर कोई भी ऑरिजनल रिसर्च नहीं हुआ है। अमेरिका में हुए रिसर्च में तैयार पैमानों पर गौर करें तो भारत की कुल जनसंख्या के लगभग 12 प्रतिशत लोगों में से कोई न कोई मनोरोगी है। यह पैमाना अमेरिका के रहन-सहन पर बना है। वहां रेल टिकट के लिए लंबी लाइनों या अपने बर्थ सर्टिफिकेट में करेक्शन के लिए दिनों की मेहनत और ढेर सारा तनाव नहीं झेलना पड़ता। उसके बावजूद वहां तनाव है। अगर भारत में छोटे-छोटे काम पर मिलने वाले तनाव को जोड़ लिया जाए तो भारत का आंकड़ा बहुत आगे चला जाएगा।'

उपरोक्त तथ्यों को मध्य में रखते हुए जहां हमें परिवारिक व सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने की आवश्यकता है वहीं सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार तथा उदासीनता के विरुद्ध भी अभियान चलाने की आवश्यकता है। जिस समाज का एक बड़ा वर्ग मानसिक रोगों का और अकेलेपन का शिकार हो वह समाज विकास के पथ पर आगे कैसे बढ़ पायेगा और कैसे विश्व की चुनौतियों का सफलता पूर्वक सामना कर सकेगा। सरकार व समाज दोनों को आत्मचिंतन कर अपनी नीतियों व विभागों को समय अनुसार परिर्वतन कर आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए समय रहते तैयार करने की आवश्यकता है उपरोक्त मामले में विलंब आत्मघाती ही साबित होगा।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।