सोशल मीडिया और किसान आंदोलन?

तकनीकी विकास ने अभिव्यक्ति की आजादी को नया मुकाम और आयाम दिया है। आज की दुनिया में सोशल मीडिया अभिव्यक्ति की आजादी का नया मंच बन गया है। इंटरनेट ने वैचारिक आजादी का नया संसार गढ़ा है। अब अपनी बात कहने के लिए अखबारों और टीवी के कार्यालयों और पत्रकारों की चिरौरी नहीं करनी पड़ती है। उसका समाधान खुद आदमी के हाथों में है। वर्चुअल प्लेटफार्म खुद खबर का जरिया और नजरिया बन गया है। टीवी और अखबार की दुनिया वर्चुअल मीडिया के पीछे दौड़ रहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कुछ भी लिखा- पढ़ा जा सकता है। किसी को रोक-टोक नहीं है लेकिन यह किस दिशा की तरफ जा रहीं है कहना मुश्किल है। किसान आंदोलन में भी सोशलमीडिया पर बहुत कुछ लिखा- पढ़ा जा रहा है। सोशलमीडिया पर बदले दौर में सबकी निगाहें टिकी रहती हैं। इंटरनेट और आधुनिक मोबाइल फोन ने सब कुछ सम्भव बना दिया है। टीवी पत्रकारिता का अधिकाँश कार्य वर्चुअल मंच और गूगल कर देता है। राजनेता और सेलिब्रेटी के ट्वीट करने भर की देर है। बाकी का काम टीवी पत्रकारिता कर देती है। टीवी एंकर तत्काल इस तरह के ट्वीट चलाने लगते है। ट्वीट पर वाक्युद्ध छिड़ जाता है जिसके बाद टीवी वालों को ब्रेकिंग खबर मिल जाती है। फिर लगातार उसी ट्वीट पर हो रहे वार और पलटवार को प्रसारित किया जाता है।  विचार के नाम पर ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सप, इंस्टाग्राम और न जाने कितनी अनगिनत सोशल साइटों पर कुछ लोगों की तरफ से गंदगी फैलाई जा रही है। अनैतिक बहस और विचारों के शाब्दिक युद्ध को देख एक अच्छा व्यक्ति कभी भी सोशल मीडिया पर कुछ कामेंट नहीं करना चाहेगा। वर्चुअल मंच पर विचारों का द्वंद देखना हो तो किसी चर्चित मसले पर ट्विटर और फेसबुक के कामेंट्स आप देख सकते हैं। इसमें कोई दो राय नहीँ कि वर्चुअल प्लेटफार्म ने लोगों को बड़ा मंच उपलब्ध कराया है लेकिन उसका उपयोग सिर्फ सामाजिक, राजनैतिक और जातिवादी घृणा फैलाने के लिए किया जा रहा है। इतने भ्रामक और आक्र ोश फैलाने वाले पोस्ट डाले जाते हैं कि जिसे पढ़कर दिमाग फट जाता है। समाज में जिन्होंने अच्छी प्रतिष्ठा, पद और मान हासिल कर लिया है, उनकी भी वाल पर कभी-कभी कितनी गलत पोस्ट की जाती है। आजकल पूरी राजनीति वर्चुअल हो गई है। कोरोना संक्र मण काल में यह और तीखी हुई है। सत्ता हो या विपक्ष, सभी ट्विटर वार में लगे हैं। तकनीक के बदले दौर में सारी लड़ाई सोशल मीडिया पर हो गई है। राजनीति में यह प्रचलन अधिक तेजी से चला है क्योंकि वर्चुअल मंचन पर कहीँ गई बात अधिक तेजी से प्रसारित होती है जिसकी वजह से राजनेताओं और सेलिब्रिटी की पहली पसंद आजकल ट्विटर बन गया है। जब भी किसी व्यक्ति को भड़ास निकालनी होती है तो वह सोशल मीडिया पर आ जाता है। 

सोशल मीडिया पूरी तरह सामाजिक वैमनस्य फैलाने का काम कर रहा है। हालांकि वर्चुअल प्लेटफार्म पर देश की नामी-गिरामी सामाजिक, राजनैतिक, साहित्यिक, फिल्मकार, संगीतकार, अधिवक्ता, पत्रकार, चिंतक, वैज्ञानिक और समाज के हर तबके के लोग जुड़े हैं। लोग सकारात्मक टिप्पणी करते हैं। लोगों के अच्छे विचार भी पढऩे को मिलते हैं। इस तरह का तबका काफी है। उनकी बातों का असर भी व्यापक होता है लेकिन इंसान की जिंदगी बाजारवाद बन गई है जिसकी वजह से बढ़ती स्पर्धा, सामंती सोच हमें नीचे धकेल रही है। अपना स्वार्थ साधने के लिए मु_ी भर लोग विद्वेष फैला रहे हैं। दिल्ली सीमा में चल रहे किसान आंदोलन पर भी सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक टिप्पणियाँ की जा रही हैं। किसानों के आंदोलन को गलत दिशा देने की कोशिश की गई। वर्चुअल मंच पर किसानों के आंदोलन को खालिस्तानी तक कहा गया जिसकी वजह से किसानों को गहरी चोट पहुँची। सोशल मंच पर एक धड़ा पूरे किसान आंदोलन को गलत दिशा देना चाहता है, यह गलत बात है। किसानों को खालिस्तानी कहना कहाँ का न्याय है। लोकतंत्र में सबको अपनी माँग रखने का अधिकार है। हम राजनीति में अपना विवेक और विचार दोनों खो चुके हैं। हमें लगता है कि सरकार जो फैसला करती है वह वह ठीक है पर ऐसी बात नहीँ है। हमें किसानों की मांगो पर गौर करना चाहिए। हो सकता है कुछ लोग किसान आंदोलन की आड़ में अपनी सियासी रोटी सेंकना चाहते हों लेकिन इसका यह मतलब नहीँ कि किसान खालिस्तान का एजेंडा चला रहें हैं। 
सोशलमीडिया ने हमें विचारों का नया मंच उपलब्ध कराया है लेकिन अगर मंच पर अपनी बात रखने के बजाय निजी हमले किए जाएँ तो कितना जायज है। किसान हमारा पेट भरता है पूरे लाकडाउन में किसानों की वजह से सरकार ने मुफ्त में अनाज बाँटा है। पंजाब , हरियाणा और देश का किसान अगर अन्न न उपजाता तो लोग भूखों मर जाते लेकिन हमारे किसानों की वजह से कोरोना संक्र मण काल में भुखमरी की समस्या नहीँ पैदा हुई। अगर ऐसा होता तो लाखों लोग भूख से मर जाते। यह मौत कोरोना से मरने वालों से अधिक होती। लोग सवाल उठाते हैं कि पंजाब का किसान ही क्यों आंदोलन कर रहा है। इसका सीधा जवाब है कि सरकार से पंजाब का किसान अधिक लाभ कमाता है जिसकी वजह से वह आंदोलनरत है। देश में एमएसपी का सिर्फ छह फीसदी किसान लाभ उठाते हैं जिसमें सबसे अधिक पंजाब और हरियाणा के किसान शामिल हैं। फिर आंदोलन कौन करेगा। सरकार विचारधारा की नहीं, देश की होती है। वह समाज और देश को साथ लेकर चलती है लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि सरकारें जो फैसला करती हैं वह उचित करती हैं। अगर ऐसा होता तो देश का किसान सड़क पर क्यों उतरता। पंजाब और दूसरे हिस्से का किसान कड़ाके की सर्द में दिल्ली की सीमा में क्यों आंदोलन करता। हमें इसका ख्याल रखना होगा। हम यह नहीँ कह सकते कि सरकार सही और किसान गलत हैं। सरकार को किसानों से संवाद जारी रखना चाहिए। किसानों की बात सरकार को सुननी चाहिए लेकिन अभिव्यक्ति की आड़ में वर्चुयल मंच पर किसानों को  अपमानित करना गलत बात है। हमारी आजादी की सीमा वहीँ तक है जहाँ दूसरों की आजादी प्रभावित न हो। हमें वर्चुअल मंच पर इस तरह की तथ्यहीन बातों से बचना चाहिए। किसान देश का निर्माता है। उसके खिलाफ गलत प्रचार से बचना होगा।
  -प्रभुनाथ शुक्ल