श्रीराम मंदिर निर्माण

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए 11 मई से चल रहे समतलीकरण के काम में एक दर्जन से अधिक पाषाण स्तंभ पर बनी मूर्तियों के अलावा बड़ी संख्या में देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, नक्काशीदार शिवलिंग और चौखट आदि मिले हैं। जिस स्थान पर ढांचे के तीन गुंबद थे, उनमें से एक के नीचे कुआं भी मिला है। इसके अलावा कई स्थानों से चांदी के छत्र, सिंहासन और रामदरबार से जुड़े कई महत्वपूर्ण अवशेष मिले हैं, जिसकी जानकारी रामजन्मभूमि ट्रस्ट आने वाले दिनों में देगा। पुरातत्वविद केके मोहम्मद इन अवशेषों को 8वीं शताब्दी का बता रहे हैं। श्रीरामजन्म भूमि को दर्शाने वाले उस पिलर को समतलीकरण में भी जस का तस रखा गया है, जो अंग्रेजों के जमाने मेें लगाया गया था। पीपल और बरगद के वृक्षों से घिरे श्रीरामजन्मभूमि गर्भगृह टीले को भी समतल कर दिया गया है। 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गर्भगृह से कुछ ही दूरी पर मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास किया था, उस हिस्से को भी समतल किया जाएगा। 2.77 एकड़ भूमि का पश्चिमी हिस्सा बेहद गहराई में और पूर्वी हिस्सा जहां गर्भगृह मौजूद है, टीलेनुमा ऊंचाई वाला था। इन दोनों हिस्से को समतल किया जा रहा है। यहीं श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण होना है। यहां करीब 40 फिट की नींव खोदी जाएगी। बाकी 67.7 एकड़ में तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं, प्रसादालय आदि बनना है। रामघाट पर मौजूद राममंदिर निर्माण कार्यशाला अगले कुछ दिनों में परिसर में स्थानांतरित की जाएगी। भारी पत्थरों को लाने के लिए सडक़ भी कुछ दिनों में बन जाएगी।

समतलीकरण के दौरान बड़ी मात्रा में पुरावशेष प्राप्त हुए। इनमें सात ब्लैक टन स्टोन के स्तंभ और छह रेड सैंड स्टोन के स्तंभ शामिल भी हैं। ब्लैक टच स्टोन के स्तंभ का समीकरण कसौटी के उन स्तंभों से स्थापित करता है, जिन पर दो हजार वर्ष पूर्व भारतीय लोक कथाओं के नायक महाराज विक्रमादित्य ने अत्यंत भव्य मंदिर का ढांचा खड़ा किया था। मान्यता है कि 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने तोप से राम मंदिर को ध्वस्त तो कराया, पर उसके अनेक अवशेष रह गए और इन्हीं अवशेषों में कसौटी के वे स्तंभ भी थे, जिस पर विक्रमादित्य युगीन मंदिर स्थापित था। हालांकि विक्रमादित्य के समय का मंदिर कसौटी के 84 स्तंभों पर स्थापित था। मीर बाकी ने मंदिर की जगह मस्जिद का जो ढांचा निर्मित कराया, उसमें कसौटी के प्राचीन 84 स्तंभों में से 12 का उपयोग किया गया। मस्जिद के ढांचे में प्रयुक्त यह स्तंभ 6 दिसंबर, 1992 को ढांचा पराभव से पूर्व तक मस्जिद के ढांचे में जहां के तहां स्थापित थे। ढांचा ध्वंस के दौरान इक्का-दुक्का स्तंभों को छोड़ कर बाकी स्तंभ ढांचा के मलवे में जमींदोज हो गए। अब इन स्तंभों के सामने आने के साथ श्रीराम मंदिर की प्रामाणिकता के परिचायक माने जाने वाले कसौटी के स्तंभों से जुड़ा विमर्श नए सिरे से फलक पर उभर रहा है।

युगों पीछे जाएं तो पायेंगे कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का निर्णय श्रीराम के बेटे महाराज कुश ने लिया था और अयोध्या को राजधानी भी घोषित की थी। ‘जब महाराज कुश की देखरेख में कसौटी के चौरासी खम्भों पर भव्य श्रीराम मंदिर निर्मित हो गया। तब चैत्र शुक्ल नवमी पर मंदिर में भगवान राम की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई और अयोध्या पुन: राजधानी घोषित कर दी गई। इस मंदिर में कसौटी के जिन चौरासी खम्भों को लगाया गया था इनकी चर्चा आज तक किसी न किसी रूप में चल रही है। सहस्राब्दियां बीत जाने के बाद भी यह देव दुर्लभ खम्भे अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं भले ही संख्या में बहुत कम ही क्यों न रह गए हों। यह खम्भे श्रीराम के कुल की एकमात्र स्मृति हैं। लोमश रामायण में ‘वर्णित बालकाण्ड’ के अनुसार यह खम्भे श्रीराम के पूर्वज महाराजा अनरण्यक के आदेश पर विश्व प्रसिद्ध शिल्पी विश्वकर्मा के द्वारा घड़े गए थे। इन खम्भों के ऊपर राजदरबार का एक विशेष कक्ष निर्मित किया गया था। जिस धातु से यह खम्भे बने थे इसी धातु से सोने की परख की जाती थी।’

अयोध्या आज बेशक देश की राजनीतिक राजधानी नहीं है लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से आज भी अयोध्या ही रामभक्तों के लिए राजधानी है। देश व दुनिया में जहां भी रामभक्त हैं उनके दिलों में अयोध्या बसती है, क्योंकि यह श्रीराम का जन्म स्थान है। अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थल पर श्रीराम मंदिर के निर्माण का विरोध करने वाले और श्रीराम भक्तों पर गोलियां चलाने वालों के सिर आज शर्म से अवश्य झुक गए होंगे। सत्ता के मोह में अपने अराध्य और उसके जन्मस्थान के प्रति दिखाई उदासीनता का परिणाम ही है कि श्रीराम मंदिर विरोधी आज सत्ता से बाहर हैं और जिन पर श्रीराम की कृपा रही वह सत्ता में हैं।

भारत की सभ्यता व संस्कृति के आज दो केंद्र बिन्दू हैं, श्रीराम और श्रीकृष्ण। इन द्वारा दिखाये मार्ग को अपना कर ही देशवासी अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं। इस बात को समझते हुए व्यक्तिगत स्तर पर तथा सार्वजनिक जीवन में मर्यादित जीवन जीकर व्यक्ति आगे बढ़ सकता है। भारत की पहचान भी श्रीराम और श्रीकृष्ण से है। इसलिए श्रीराम जन्मभूमि और श्रीकृष्ण जन्मभूमि भारतवासियों विशेषतया हिन्दुओं के लिए विशेष महत्व रखती है। अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हो गया है। लॉकडाउन समाप्त होने के बाद निर्माण कार्य में तेजी आ जाएगी व जल्द ही श्रीराम भक्तों का श्रीराम जन्मभूमि पर एक भव्य श्रीराम मंदिर बनने का जो स्वप्न था वह साकार हो जाएगा। श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए जिन लोगों ने संघर्ष किया, अपना जीवन दिया उन सबको प्रणाम। भारतवासी विशेषतया हिन्दू समाज उनके त्याग व बलिदान का हमेशा ऋणी रहेगा।        जय श्रीराम

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।