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विरोधियों को सताने का हथियार है राजद्रोह  कानून!

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विरोधियों को सताने का हथियार है राजद्रोह  कानून!

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमण ने जनसमस्याओं सें जुड़ी धाराओं पर अपनी बात कहने के साथ जिस तरह से सरकार को नसीहत देना शुरू किया है, उससे लगता है कि वह भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं में बदलाव के पक्षधर हैं। अगर उनका मकसद वास्तव में यही है, तो वाकई यह स्वागत योग्य सोच है। दरअसल, जिन कानूनों का हवाला देकर पुलिस अपनी करामात के दम पर अदालत को गुमराह करके निर्दोष जनता को जेलों में सड़ा देती है और दूसरी ओर इन्हीं कानूनों की कमजोर कडिय़ों को तोड़कर बड़े—बड़े गुनहगार सजा से बच जाते हैं, ऐसे कानून के बदलाव पर जो सलाह मुख्य न्यायाधीश महोदय ने दी है, इसके लिए देश की जनता उन्हें धन्यवाद अवश्य देना चाहेगी। अभी हाल ही में भाजपा नेता और वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय ने एक जनहित याचिका दायर की है जिसमें केंदीय सरकार को निर्देश देने का अनुरोध किया है कि वह एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करे, जो भ्रष्टाचार और अपराध के सभी घरेलू आंतरिक कानूनों का अध्ययन करके सख्त कानून वाली आईपीसी का ड्राफ्ट तैयार करे, जो एक देश, एक दंड विधान की अवधारणा पर आधारित हो।
इससे पहले पिछले सप्ताह माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह की धारा 124ए के दुरुपयोग पर सरकार से सवाल किया कि स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों से आजादी पाने वालों के खिलाफ अंग्रेजों द्वारा ही  उपयोग में लाए गए इस कानून को खत्म क्यों नहीं करती? माननीय अदालत ने एक बेहतरीन उदाहरण देते हुए कहा कि राजद्रोह कानून का इस तरह उपयोग हो रहा है, जैसे किसी बढ़ई को लकड़ी का टुकड़ा  काटने के लिए आरी दी जाए और वह पूरा जंगल ही काट डाले।  अदालत ने कहा कि अंग्रेज इस कानून का दुरुपयोग स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए करते थे। सरकार ने कई कानून रद्द किए, पर पता नहीं इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया। कोर्ट ने इस पर आश्चर्य प्रकट किया और केंद्र सरकार को इसके लिए नोटिस भी जारी किया। पीठ ने पुलिस के लिए कहा कि अगर वह किसी को फंसाना चाहती हैं तो 124ए भी लगा देती है। जिस पर भी यह धारा लगती है, वह डर जाता है। इसलिए इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। पीठ ने चिंता जताते हुए कहा कि हमारी चिंता कानून के दुरुपयोग और कार्यपालिका की कोई जिम्मेदारी नहीं होने को लेकर है। 
बता दें कि मौजूदा याचिका मेजर जनरल रिटायर्ड एमजी वोमबटकेरे ने दाखिल की है जिसमें राजद्रोह कानून को रद्द करने की मांग की गई है। वेणुगोपाल की इस टिप्पणी के बाद कि इस कानून को रद्द करने की जरूरत नहीं है, पीठ ने कहा कि एक गुट दूसरे गुट के लोगों को फंसाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल कर सकता है, इसलिए यह लोगों की संविधान प्रदत्त आजादी के मौलिक अधिकार के लिए खतरा है। पीठ ने याचिका को प्रामाणिक और याचिकाकर्ता को वास्तविक बताते हुए कहा, जिसने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में समर्पित किया, इसलिए हम यह नहीं कह सकते हैं कि यह प्रेरित याचिका है। उल्लेखनीय है कि इस कानून को रद्द करने के लिए दो अन्य याचिकाएं भी लंबित हैं। साथ ही इस धारा को खत्म करने के लिए एडिटर्स गिल्ड आफ़ इंडिया तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के माध्यम से दायर किया है। 
विपक्षी दलों के नेताओं ने और सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी का स्वागत किया है कि क्या इस पुरातनकालीन कानूनी का भारत सरकार द्वारा दुरुपयोग समाप्त होगा? कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी ने इसका स्वागत किया है। इस पर  भाजपा ने आक्रामक जवाब देते हुए कहा कि उनकी ही सरकार वर्ष 2004 से 2014 तक रही, फिर इस कानून को समाप्त करने से उन्हें किसने रोका था। सच तो यह भी है कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में शिक्षा, कानून, गरीबी, किसान को लेकर कई वादे किए थे। उन वादों में एक वादा था,  जिसकी काफी चर्चा भी हुई थी, वह है आईपीसी की धारा 124ए को खत्म करना, लेकिन कांग्रेस की सरकार बनी नहीं और उसका वादा पूरा नहीं हो सका। लेकिन, जो भी हो, यदि सर्वोच्च न्यायालय की गंभीर टिप्पणी का असर सरकार पर होता है तो इससे आमलोगों में सरकार की साख और बढ़ेगी। लेकिन, जब तक सरकार में बैठे उच्चपदस्थ लोगों की इच्छा नहीं होगी, तब तक ब्रिटिशकालीन इस कानून को खत्म नहीं किया जा सकता है। दरअसल, कानून को रद्द बहुमत द्वारा संसद के दोनों सदनों (लोकसभा-राज्यसभा) में पास किए बिना नहीं हो सकता। देखना यह है कि सरकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मांगी गई नोटिस का जवाब  कब और क्या देती है।  अब जानते हैं कि आखिर धारा 124ए है क्या? भारतीय दंड संहिता, यानी इंडियन पीनल कोड की धारा 124ए को ही राजद्रोह का कानून कहा जाता है। अगर कोई व्यक्ति देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधि को सार्वजनिक रूप से अंजाम देता है तो उसकी गतिविधि 124ए के अधीन आती है। साथ ही अगर कोई व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है, ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, राष्ट्रीय चिहृनों का अपमान करने के साथ संविधान को अपमानित करने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 124ए में राजद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है। इन गतिविधियों में लेख लिखना, पोस्टर बनाना भी शामिल है। यह कानून आज से नहीं, बल्कि अंग्रेजों के जमाने का है और आजादी के पहले से भारत में मौजूद है। इस कानून को अंग्रेजों ने वर्ष 1860 में बनाया था और वर्ष 1870 में इसे आईपीसी में शामिल कर दिया गया। उस वक्त अंग्रेज इस कानून का इस्तेमाल उन भारतीयों के खिलाफ किया करते थे, जो उनके खिलाफ आवाज बुलंद करते थे। आजादी की लड़ाई के दौरान भी देश के कई क्रांतिकारियों और आजादी से पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक को भी इस कानून के कारण सजा सुनाई गई थी। तिलक को वर्ष 1908 में उनके एक लेख की वजह से छह साल की सजा सुनाई गई थी, वहीं महात्मा गांधी को भी अपने लेख की वजह से ही इस कानून का आरोपी बनाया गया था। वैसे  आजाद भारत में इस कानून में कई बदलाव भी किए गए हैं, पर पुलिस द्वारा यह धारा केस बनाने जैसे काम में भी उपयोग में आने लगा है। हाल ही के चर्चित मामलों की बात करें तो पिछले सालों में काटूर्निस्‍ट असीम त्रिवेदी, हार्दिक पटेल, कन्हैया कुमार आदि को इसी कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था। इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर आरोपी को तीन साल से लेकर अधिकतम उम्रकैद की सजा का प्रावधान है।

-निशिकांत ठाकुर
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा राजनीतिक विश्लेषक हैं)
(लेखक के निजी विचार हैं) 

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