सबरीमाला मंदिर विवाद

सर्वोच्च न्यायालय ने देश में बढ़ती प्रदूषण की समस्या को देखते हुए दीपावली पर्व पर रात 8 से 10 बजे तक पटाखे चलाने की अनुमति दी है और पटाखे भी उन्हीं को बेचने का अधिकार दिया है जिनके पास पटाखे बेचने की इजाजत सरकार द्वारा दी गई है। अपने आदेश को लागू कराने के लिए क्षेत्र के थानेदार को जिम्मेवारी दी गई है। सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय का हिन्दू समाज ने स्वागत किया है, जहां तक पटाखा बेचने वालों की स्थिति है, उन्होंने भी न्यायालय के आदेश का विरोध नहीं किया। अतीत में जाएं तो पायेंगे कि सतीप्रथा, बाल विवाह इत्यादि कई हिन्दू परम्पराओं को गलत ठहराते हुए सरकार ने इन परम्पराओं को समाप्त करने के आदेश दिए और सरकार ने कानून भी बनाये। इसी तरह हाल ही में मुस्लिम समाज में प्रचलित तीन तलाक के रिवाज विरुद्ध भी न्यायालय ने आदेश दिया और इसको लेकर निर्णय से पहले और निर्णय के बाद भी मुस्लिम समाज ही नहीं देशभर में चर्चा आज भी चल रही है।

उपरोक्त माहौल में न्यायालय का सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश को ले वर्षों से चली आ रही पाबंदी को समाप्त करने का आदेश दिया है। न्यायालय के आदेश के बावजूद वहां मंदिर में उपरोक्त आयु की महिलाओं को जनता ने मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया। यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि जिन परिवारों की सबरीमाला मंदिर में आस्था है उन परिवारों की महिलाएं भी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध कर रही हैं।

न्यायालय के आदेश को आधार बनाकर कुछ गैर सरकारी संगठन की महिलाएं जिनमें कुछ मुस्लिम महिलाएं भी थी उन्होंने मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास अवश्य किया लेकिन भारी विरोध के कारण उनका प्रयास असफल रहा। सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश देने की अनुमति के आदेश पर पुन:विचार करने के लिए न्यायालय में एक नहीं अनेक याचिकाएं दाखिल हुई है। देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा उन पर 13 नवम्बर को सुनवाई होने वाली है। 

उपरोक्त विवाद में स्मृति इरानी ने तर्क दिया है कि रजस्वला अवस्था में महिलाएं जब खून से सना पैड लेकर दोस्त के घर नहीं जाती तो मंदिर कैसे जा सकती है? उन्होंने कहा कि पूजा करने के अधिकार का यह मतलब नहीं है कि आपको अपवित्र करने का भी अधिकार प्राप्त है। स्मृति ने कहा, मैं हिन्दू धर्म को मानती हूं और मैंने एक पारसी व्यक्ति से शादी की है। मैंने यह सुनिश्चित किया कि मेरे दोनों बच्चे पारसी धर्म को मानें जो आतिश बेहराम जा सकती है। आतिश बेहराम पारसियों का प्रार्थना स्थल होता है। उन्होंने कहा, जब मैं अपने नवजात बेटे को आतिश बेहराम लेकर गई तो मैंने उसे मंदिर के द्वार पर अपने पति को सौंप दिया और बाहर इंतजार किया क्योंकि मुझे दूर रहने और वहां खड़े न रहने के लिए कहा गया।

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने धरातल के सत्य को ही उजागर किया है। मक्का-मदीना में जिस तरह कोई गैर मुस्लिम नहीं जा सकता वैसे ही कई धार्मिक स्थान देश व दुनिया में है, जहां उनकी अपनी अलग परम्पराएं हैं जिनको विश्व स्तर पर मान्यता भी हैं जो न्यायालय की सीमा से बाहर हैं। अपने ही देश में क्या न्यायालय किसी मुस्लिम को सूअर का मांस बेचने का आदेश दे सकता है? क्या किसी हिन्दू को गाय का मास बेचने का आदेश दे सकता है? कभी नहीं। इसी तरह न्यायालय बिना सिर ढके किसी गैर सिख को गुरुद्वारे जाने का अधिकार दे सकता है। कभी नहीं क्योंकि यह ऐसी परम्पराएं जो न्यायालय की सीमा से बाहर है। तीन तलाक, सती प्रथा या बहु, पत्नी या पति व दहेज संबंधी रिवाजों को समाज हित में बदला जा सकता है, लेकिन उन परम्पराओं को नहीं जो धार्मिक आस्था का अंग बन चुकी हैं।

न्यायालय ने 13 नवम्बर को सबरीमाला मंदिर को लेकर दिए अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने को कहा है। सभी संबंधित वर्गों को तब तक स्थिति को सामान्य बनाकर इंतजार करना चाहिए इसी में सबकी बेहतरी है।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।