आरक्षण

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और प्रैस कौंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू जालंधर में डा. भीमराव अम्बेडकर जयंती समारोह में शामिल होने आये थे। यहां पत्रकारों से बातचीत के दौरान पूर्व न्यायाधीश काटजू ने कहा कि आरक्षण के नाम पर सभी राजनीतिक दल समाज को विभाजित कर रहे हैं इसलिए देश में आरक्षण को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आरक्षण के नाम पर राजनीतिक दल समाज को विभाजित कर रहे हैं और लोग बिना सोचे जाति के आधार पर मतदान करते हैं। उन्होंने कहा कि संवैधानिक सुधार के लिए आरक्षण को भी खत्म किया जाना आवश्यक है। आरक्षण के कारण लोग मेहनत नहीं करना चाहते। अगर आरक्षित वर्ग का सुधार करना है तो आरक्षण खत्म करना होगा। पूर्व न्यायाधीश काटजू ने एक उदाहरण दी। बोले जब मैं मद्रास हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस था तो एक साथी जज साहिब हमारे घर आए। उनका अपर कास्ट की लड़की से प्रेम विवाह हुआ था। उस लड़की ने मेरी पत्नी को बताया कि जब उनकी शादी हुई तो मेरे परिवार वालों ने मेरा किरया कर्म कर दिया था। उन्होंने हमसे पूरी तरह से रिश्ता तोड़ लिया। देखें जातपात का गोबर किस कदर पढ़े लिखे लोगों के दिमाग में भरा हुआ है। चाहे आपने पीएचडी कर रखी है, डॉक्टर अफसर हैं। 1776 में अमरीका में कहा गया कि सभी इंसान बराबर हैं। फ्रांस में 1789 में बराबरी की बात की गई, भारत में 250 साल से बराबरी नहीं पा सके हैं।

पूर्व न्यायाधीश काटजू ने यह भी कहा कि दलित समाज को लगता है कि उनका भला हो रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है। पूर्व न्यायाधीश काटजू का प्रकट विचारों के लिए विरोध भी हुआ लेकिन धरातल का कटु सत्य यह ही है कि आरक्षण का लाभ पिछड़ों व दलितों के एक छोटे से वर्ग को ही मिल रहा है, जबकि सवर्ण वर्ग यह समझता है कि उनसे अन्याय हो रहा है। आरक्षण को बेशक डा. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान का हिस्सा बनाया लेकिन आरक्षण की मांग तो महात्मा ज्योतिबा फुले ने 1882 में अंग्रेजी हकूमत से शिक्षा व सरकारी नौकरियों में पिछड़ों व दलित वर्ग के लिए आरक्षण की मांग उनके अनुपात के हिसाब से करने की थी। इसके लिए 1891 में आंदोलन भी हुआ। 1901 में महाराष्ट्र, कोल्हापुर राज्य में साहू जी महाराज द्वारा आरक्षण का प्रावधान किया गया। भारत सरकार अधिनियम 1909, 1919 में भी आरक्षण का प्रावधान किया गया था। 1921 में मद्रास प्रेसीडेन्सी में साम्प्रदायिक आधार पर ब्राह्मणों, गैर ब्राह्मणों, मुसलमानों, ईसाइयों एवं आंग्ल-भारतीयों और अनुसूचित जातियों को आरक्षण प्रदान किया गया था। आरक्षण विषय पर सघन चर्चा गोलमेज सम्मेलन के बाद आरंभ हुई और स्वीकारोक्ति पूना समझौते 1932 के बाद हुई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसके पक्ष में 1935 में प्रस्ताव पारित किया और संबंधित प्रावधान भारत सरकार अधिनियम 1935 में भी किए गए। अखिल भारतीय दलित शोषित परिसंघ के माध्यम से 1942 में डा. अम्बेडकर ने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण की मांग की क्योंकि उनका मानना था कि विशेष प्रावधानों के बगैर समाज को न तो सशक्त बनाया जा सकता है और न ही विकसित किया जा सकता है। डा. अम्बेडकर का यह विचार यथार्थ एवं सामाजिक व्यवहार पर आधारित है। उनके द्वारा संविधान में आरक्षण का समर्थन, स्वयं के साथ हुए भेदभाव, अपमान, शोषण एवं संघर्ष से प्रेरित है। अपने साथ हुए पीड़ाजनित व्यवहार का उल्लेख करते हुए डा. अम्बेडकर ने कहा भी है कि जब मेरे जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त, योग्य व्यक्ति को भी इस सामाजिक व्यवस्था में अछूत माना जा सकता है तो उन लाखों-करोड़ों अछूतों की दशा तो और भी गई बीती होगी जो अशिक्षित एवं असभ्य हैं। दलित समाज की स्थिति को ध्यान में रखकर उन्होंने ब्रिटिश सरकार के आयोग के समक्ष कहा था कि दलितों को अल्पसंख्यकों की अपेक्षा ज्यादा राजनीतिक संरक्षण की आवश्यकता है। ...हमारी जनसंख्या के अनुपात में हमारे लोगों को आरक्षण प्रदान किया जाए। आयोग के प्रश्न के उत्तर में पुन: डा. अम्बेडकर ने कहा कि मैं पूरे जोर से कहना चाहता हूं कि मेरे जैसे पढ़े-लिखे लोग भी महत्त्वपूर्ण नौकरियों में हों। और यह तभी सम्भव है जब हमें पर्याप्त आरक्षण प्रदान किया जाए। आरक्षण को लेकर डा. अम्बेडकर का उद्देश्य एकदम स्पष्ट था, पिछड़ों एवं दलितों को न्याय तब तक प्राप्त नहीं हो सकता जब तक कि उनकी समस्याओं की तरफ विशेष ध्यान केंद्रित न किया जाए।

डा. भीमराव अम्बेडकर ने दलित व पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए कुछ वर्षों के लिए आरक्षण की बात कही थी लेकिन आज आजादी के सात दशक बाद भी आरक्षण को हटाने की शायद ही कोई राजनीतिक दल बात भी कह सके। क्योंकि देश की राजनीतिक परिस्थितियां ऐेसी हैं कि उपरोक्त बात राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती ही साबित होगा।

पूर्व न्यायाधीश काटजू की इस बात में दम है कि आरक्षण का लाभ भी पिछड़ों व दलितों के एक छोटे वर्ग को ही मिल रहा है। इसलिए चक्र से निकलने तथा इस बात को सुनिश्चित करने के लिए दलितों व पिछड़ों के अति गरीब वर्ग को भी आरक्षण का लाभ मिले। दलितों व पिछड़ों के क्रिमी लेयर जो पिछले सात दशकों में आरक्षण का लाभ लेकर भारत के लाखों-करोड़ों लोगों से कहीं बेहतर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। सत्ता सुख व सरकारी नौकरियों में है। उनको क्रिमी लेयर घोषित कर आरक्षण के लाभ से वंचित करने का समय तो अवश्य आ गया है।

दलितों व पिछड़ों में भी जो अति पिछड़ा वर्ग है उसकी चिंता करते हुए दलितों व पिछड़ों के क्रिमी वर्ग को आगे आकर समाज व सरकार को मिल बैठकर तत्काल हल ढूंढना चाहिए।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।