पाकिस्तान के साथ रिश्ते

एशिया सोसायटी द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन कार्यक्रम में बोलते हुए भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि पाकिस्तान के साथ संबंध सामान्य करना भारत के लिए बहुत मुश्किल है। जयशंकर ने कहा, पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद उनकी सरकार द्वारा सार्वजनिक रूप से स्वीकार की गई ऐसी नीति बना हुआ है जिसे वह जायज ठहरा रहे हैं, इसलिए उनके साथ रिश्ते सामान्य करना बहुत मुश्किल हो गया है। जयशंकर ने कहा कि केवल आतंकवाद ही नहीं है, बल्कि पाकिस्तान भारत के साथ सामान्य कारोबार नहीं करता। उसने भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) का दर्जा नहीं दिया है। उन्होंने कहा, हमारे सामान्य वीजा संबध नहीं हैं और वे इस मामले में बहुत प्रतिबंधात्मक हैं। उन्होंने भारत और अफगानिस्तान के बीच व अफगानिस्तान से भारत एक कनेक्टिविटी बाधित की है। जयशंकर ने कहा कि सामान्य पड़ोसी वीजा और कारोबारी संबंध रखते हैं। वे आपको कनेक्टिविटी प्रदान करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि वे आतंकवाद को बढ़ावा नहीं देते। विभाजन के बाद से कश्मीर के घटनाक्रम के सवाल पर जयशंकर ने कहा, भारत की बाहरी सीमाएं नहीं बदली हैं। जहां तक हमारे पड़ोसी देशों की बात है, तो उनके लिए हमारा कहना है कि यह हमारे लिए आंतरिक विषय है। हर देश अपने प्रशासनिक न्यायक्षेत्र को बदलने का अधिकार रखता है। चीन जैसे देश ने भी अपने प्रांतों की सीमाएं बदली हैं और मुझे विश्वास है कि अन्य कई देश ऐसा करते हैं। उन्होंने कहा कि पड़ोसी तभी प्रभावित होते हैं जब आपकी बाहरी सीमाएं बदलती हैं। इस मामले में ऐसा नहीं है।
पाकिस्तान की भारत के प्रति नकारात्मक नीति और सोच का वर्णन पाकिस्तान के एक पूर्व मेजर जनरल अकबर खान ने अपनी पुस्तक 'रेडर्स इन कश्मीर में किया है। अपनी किताब में भारत की आजादी के बाद कश्मीर हथियाने के मंसूबे को लेकर अभियान की कमान संभालने वाले तत्कालीन पाकिस्तान के मेजर जनरल अकबर खान ने लिखा कि 26 अक्तूबर, 1947 को पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने बारामूला पर कब्जा किया, जहां 14,000 के मुकाबले सिर्फ 3,000 लोग जिंदा बचे थे। जब पाकिस्तानी सेना श्रीनगर से 35 कि.मी. दूर रह गई, तब महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार से कश्मीर के अधिग्रहण के लिए पत्र लिखा। किताब में बताया गया है कि पाकिस्तान ने कश्मीर हथियाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया, मगर भारतीय सैनिकों ने वक्त रहते पाकिस्तानी सेना के मंसूबों पर पानी फेर दिया। अकबर खान ने लिखा है कि 1947 में सितंबर की शुरुआत में तत्कालीन मुस्लिम लीग के नेता मियां इफ्तिखारुद्दीन ने उनसे कहा था कि वह कश्मीर अपने कब्जे में लेने की योजना बनाएं। आखिरकार, मैंने योजना बनाई, जिसका नाम 'कश्मीर में सैन्य विद्रोह रखा गया। हमारा मकसद था आंतरिक तौर पर कश्मीरियों को मजबूत करना, जो भारतीय सेना के खिलाफ विद्रोह कर सकें। यह ध्यान में रखा गया कि कश्मीर में भारत की ओर से किसी तरह की कोई सैन्य मदद नहीं मिल सके। अकबर खान ने लिखा, मुझे लाहौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत खान से मिलने को कहा गया। मैं वहां पहुंचा, मगर पहले मैं प्रांतीय सरकार के सचिवालय में एक सम्मेलन में गया। आयोजन पंजाब सरकार में मंत्री रहे सरदार शौकत हयात खान के दफ्तर में हुआ। मैंने देखा कि मेरी प्रस्तावित योजना की प्रति किसी के हाथ में थी।

22 अक्तूबर को पाकिस्तानी सेना ने सीमा पार की और 24 अक्तूबर को मुजफ्फराबाद और डोमेल पर हमला किया, जहां डोगरा सैनिकों को पीछे हटना पड़ा। अगले दिन हम श्रीनगर रोड पर निकले और फिर उरी में डोगराओं को पीछे हटाया। 27 अक्तूबर को भारत ने कश्मीर में सेना भेज दी। पाकिस्तान के पीएम ने 27 अक्तूबर की शाम हालात के मद्देनजर लाहौर में बैठक बुलाई। इसमें तत्कालीन रक्षा सचिव और बाद में पाकिस्तान के गवर्नर जनरल रहे कर्नल इसकदर मिर्जा, महासचिव चौधरी मोहम्मद अली, फ्रंटियर प्रांत के मुख्यमंत्री अब्दुल कयूम खान, पंजाब के सीएम नवाब मामदोत, ब्रिगेडियर स्लायर खान और मैं था। बैठक में मैंने प्रस्ताव दिया कि कश्मीर में घुसपैठ के लिए सेना को इस मकसद के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। सिर्फ आदिवासियों को वहां भेजा जाए। अकबर खान ने लिखा है कि पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में घुसपैठ के लिए आदिवासियों की मदद ली। 28 अक्तूबर, 1947 को अकबर खान को पाकिस्तान के पी.एम. का सैन्य सलाहकार बना दिया गया।
पाकिस्तान आज भी उसी नकारात्मक नीति पर चलते हुए जहां आतंकियों को संरक्षण व समर्थन दे रहा है, वहीं भारत विरुद्ध उनका इस्तेमाल भी करता है। जम्मू-कश्मीर से लेकर मुंबई या देश के किसी हिस्से में आतंकी हमले की तह में जाएं तो अधिकतर पाकिस्तान खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटीलीजैंसी (आईएसआई) का हाथ ही आपको दिखाई देगा। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में एक नहीं अनेक आतंकियों के कैम्प हैं और सैकड़ों की तादाद में वहां आतंकी ट्रेनिंग ले रहे हैं। उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए कहा जा सकता है कि पाकिस्तान कोई सामान्य पड़ोसी नहीं है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ठीक कह रहे हैं कि पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध सामान्य नहीं हो सकते। पाकिस्तान और चीन की नजदीकियों ने तो स्थिति को बद से बदतर बना दिया है। पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते तभी सामान्य हो सकेंगे जब पाकिस्तान अपनी नकारात्मक नीति और सोच को छोड़ भारत के प्रति सकारात्मक सोच व नीति अपनाएगा।


 - इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।