'हिट विकेट' हुए राहुल गांधी

पंजाब में 'खेती बचाओ' यात्रा के अंतिम दिन पटियाला में पत्रकारों से वार्ता के दौरान जब पत्रकार ने प्रश्न किया कि केंद्र में कमजोर विपक्ष होने के कारण क्या मोदी सरकार एक तरफा फैसले लिए जा रही है। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए राहुल गांधी ने कहा कि मोदी सरकार प्रमुख संस्थाओं पर काबिज हो चुकी है और इसने ऐसा करने के लिए लोकतांत्रिक ढंग नहीं बल्कि जोर-जबरन की विधि अपनाई है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार भारत की आत्मा पर काबिज हो चुकी है जिसको लेकर कांग्रेस पार्टी लड़ाई लड़ रही है। उन्होंने कहा कि आगे लड़ाई और भी तेज़ होती जाएगी। सरकार द्वारा संस्थाओं पर काबिज होने की बड़ी समस्या का जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि दुनिया का कोई भी मुल्क आज ऐसी स्थिति का सामना नहीं कर रहा कि उसकी जमीन किसी अन्य मुल्क ने हथिया ली हो और मीडिया सरकार से सवाल भी न पूछ सकता हो। उन्होंने कहा कि मोदी की भारत के लोगों में कोई रुचि नहीं है बल्कि उनका सरोकार तो सिर्फ अपनी छवि को बचाने और चमकाने तक ही सीमित है और यदि वह चीन की घुसपैठ को मान लेते तो इस छवि को चोट पहुंचनी थी। राहुल गांधी ने कहा कि मीडिया को उनकी छवि को बढ़ाने में मदद करने का दोष लगाया जाना चाहिए और मोदी को अच्छी तरह पता है कि प्रैस उसके एकतरफ़ा बयानों को पेश करेगी। उन्होंने मीडिया को कहा कि आप प्रैस कांफ्रेंसों में उनको सवाल क्यों नहीं करते?

कांग्रेस सांसद व कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी राजनीतिक भूलों और असफलताओं का ठीकरा देश के मीडिया पर फोड़ रहे हैं। जिस मीडिया को मोदी मीडिया दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं उसी मीडिया ने उनकी हाथरस यात्रा के बाद पंजाब की ट्रैक्टर यात्रा को पूरी जगह दी और दिखाया भी। राहुल गांधी भूल रहे हैं कि मीडिया को अगर भारत की आजादी के बाद किसी ने प्रताडि़त किया है तो अतीत में उनकी दादी व तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल की घोषणा कर किया था। इंदिरा गांधी ने मीडिया को अपने कब्जे में लेने के लिए किस-किस तरह के कानून बनाए वह शायद राहुल गांधी जानते नहीं। मंच पर बैठे उनके साथ पंजाब के मुख्यमंत्री कै. अमरेन्द्र सिंह तो भली भांति परिचित हैं।

राहुल गांधी की जानकारी के लिए आपातकाल के समय मीडिया पर क्या गुजरी उससे संबंधित तथ्य रख रहा हूं 'आपातकाल घोषित होते ही 25 जून, 1975 को मीडिया पर प्री-सेंसरशिप लागू कर दिया गया। प्रेस की स्वतंत्रता को छीनने के लिए प्री-सेंसरशिप के साथ-साथ कई अन्य कदम भी उठाए गए। तत्कालीन राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत 8 दिसंबर, 1975 को तीन अध्यादेश जारी किए। ये अध्यादेश थे-'आक्षेपणीय प्रकाशन निवारण अध्यादेश, 'संसदीय कार्यवाही (प्रकाशन संरक्षण) अधिनियम निरस्त अध्यादेश तथा 'प्रेस परिषद् अधिनियम अध्यादेश। इन तीनों अध्यादेशों के लागू होने से प्रेस की स्वतंत्रता दमित हो गई।... सरकार द्वारा उठाए गए उपर्युक्त कदमों ने प्रेस-जगत् में हलचल पैदा कर दी, पत्रकार भयाक्रांत हो गए। सरकार ने विज्ञापन नीति का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए हथियार और औजार के रूप में किया। आपातकाल की ज्यादतियों की जांच के लिए गठित शाह कमीशन ने इसे प्रमाणित भी किया था। तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री वी.सी. शुक्ल ने 28 जून, 1975 को संपादकों की एक बैठक बुलाकर उन लोगों को चेतावनी दी कि वे संपादकीय का स्थान रिक्त न छोड़ें और उसमें कोई ऐसा उद्धरण न दें, जो आपातकाल विरोधी हो। आपातकाल के दौरान सरकार ने पत्रकारों और संपादकों को डराने-धमकाने के लिए एक से बढ़कर एक कदम उठाए। अखबारी कागजों का कोटा निर्धारित करने, मशीन आदि मांगने हेतु अनुमति प्राप्त करने और विज्ञापन सहित कई मुद्दों पर पत्र-पत्रिकाओं को परेशान किया गया। मीडिया को अपने नियंत्रण में लेना यह प्रमाणित करता है कि सत्ता को इस बात का भय था कि जनता के मन में उसकी खराब छवि न बन जाए। आपातकाल में सेंसरशिप के खौफ के कारण अनेक पत्र-पत्रिकाओं का असामयिक निधन हो गया। 'इंडियन एक्सप्रेस' और 'स्टेटसमैन' को परेशान करने के अनेक मामले सामने आए। आपातकाल के दौरान 3801 समाचार पत्रों के डिक्लेरेशन जब्त कर लिए गए। 290 अखबारों के विज्ञापन बंद कर दिए गए। सभी समाचार-पत्रों के कार्यालय में सेंसर अधिकारी बिठा दिए गए। दिल्ली विद्युत प्रदाय उपक्रम के महाप्रबंधक को कहकर महानगर के सभी समाचार पत्रों की बिजली काट दी गई। जो समाचार पत्र छप गए थे, उन्हें वितरित नहीं होने दिया गया। जे.पी. की गिरफ्तारी की खबर बी.बी.सी. के माध्यम से मिली। जे.पी. आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की व्यापक भागीदारी थी। इसलिए संघ से जुड़ी और उसकी विचारधारा का अनुसरण और अनुपालन करने वाली पत्र-पत्रिकाओं पर सबसे ज्यादा असर हुआ। पांचजन्य, आर्गेनाइजर, मदरलैंड (दैनिक), तरुण भारत, विवेक विक्रम, राष्ट्रधर्म, युगधर्म इत्यादि को सील कर दिया गया था। इसके विपरीत संघ परिवार की ओर से बिहार में लोकवाणी, छात्रशक्ति, भारती इत्यादि पत्र भूमिगत तौर पर छप रहे थे तो हरियाणा में 'दर्पण' ने धूम मचा रखी थी।'

चीन द्वारा भारतीय जमीन पर कब्जे के आरोप को लेकर तथ्य यह है कि चीन ने उस क्षेत्र में घुसपैठ अवश्य की जो विवादित क्षेत्र है और उसके इस कदम को जिस तरह मोदी सरकार ने विरोध किया है उससे देश व दुनिया भली भांति परिचित है और भारत का जन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा चीन विरुद्ध अपनाई नीति के कारण सरकार की आज भी प्रशंसा कर रहा है। क्या राहुल गांधी बता सकते हैं कि उनके परदादा पं. जवाहर लाल नेहरू के समय 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला कर भारत की कितने हजार वर्ग कि.मी. जगह पर कब्जा कर लिया था जिसको वापस लेने का संकल्प भारतीय संसद में लिया गया था। चीन का आक्रमण ही पं. जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु का तत्काल कारण बना था। अगर उस समय चीन का भारतीय जमीन पर कब्जा न हुआ होता तो आज घुसपैठ की हिम्मत भी चीन न करता। भाजपा ने भारत की आत्मा पर कब्जा नहीं किया बल्कि भारत की आत्मा की आवाज सुन कर्म कर रही है।

आजादी से पूर्व सुभाष चन्द्र बोस ने भारतीयों से मांग की थी कि 'तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।' उसी तर्ज पर अपनी बात रखने की कौशिश में राहुल गांधी अतीत की तरह एक बार फिर भटक गए और अपनी पंजाब यात्रा के अंतिम दिन 'हिट विकेट' आऊट हो गए हैं।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।