राजनीति: बाढ़, विनाश और सवाल

मानसून शुरू होने के कुछ दिन बाद ही असम, उत्तर प्रदेश और बिहार के कई शहर बाढ़ में डूब से अस्त-व्यस्त हो गए। उधर, हर बार की तरह इस बार भी मुंबई और दिल्ली जैसे शहर सामान्य बरसात के बाद ही बार-बार जलमग्नता की स्थिति में फंसते दिखाई दिए। जिन शहरों में बाढ़ ने जीवन को अस्त-व्यस्त किया, उन शहरों के निवासी कहते दिखे कि नदी का पानी उनके घरों में घुस गया। लेकिन क्या यह सच है? विकास की दौड़ में शामिल आदमी के मन में जमीन की भूख इस तरह बढ़ी कि उसे जहां मौका मिला, वहीं उसने जमीन पर कब्जा कर लिया। इस भूख से नदियों के किनारे भी अछूते नहीं रहे। बड़े हो चुके या बड़े हो रहे किसी भी शहर की बसावट यदि नदी के किनारे है, तो उस नदी का कोई भी तट शायद ही ऐसा बचा होगा, जिसके सहारे कच्चे-पक्के मकानों की बस्ती नहीं खड़ी हो गई हो। अब नदी के आंगन तक तो हमने अपने स्वार्थों के डेरे तान लिए हैं और शिकायत यह करते हैं कि पानी की जरा-सी आवक बढऩे पर नदी हमारे घरों में घुस आती है। क्या किसी भी दृष्टि से इस शिकायत को तर्कसंगत कहा जा सकता है?

उधर, विकास के क्रम में नगर नियोजन के आवश्यक तत्वों तक को भुला दिया गया। पानी को अपने निकास के लिए समुचित मार्ग चाहिए, लेकिन अधिकांश शहरों में पानी के निकास के मार्ग में ही इमारतें खड़ी कर दी गईं। अब ऐसे में पानी बिफरे नहीं तो क्या करे? पुरानी कहावत है कि आग, पानी, राजा और सांप अपना स्वभाव कभी नहीं बदलते। जिन बड़े शहरों के आसपास छोटी-छोटी नदियां कभी लोगों की आवश्यकताओं को पूरा किया करती थीं, उन बड़े शहरों की जमीन की भूख ने उन छोटी नदियों को पहले नाले में तब्दील किया और फिर नदी के बचे-खुचे हिस्से को भी अतिक्रमण का शिकार बना दिया। मुंबई की मीठी नदी इसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। अब जब कभी नदी के अतिक्रमित हो चुके अपवाह क्षेत्र में पानी की आवक होगी, तो संचित पानी बस्तियों को घेरेगा ही।

ऐसा सौतेला बर्ताव केवल नदियों के साथ ही हुआ हो, ऐसा नहीं है। विकास के नाम पर मची आपाधापी में मनुष्य ने पुराने तालाबों, झीलों, जोहड़ों, कुंडों और कुंओं तक को पाट कर उन पर कोई दुकान या रिहायशी ईमारत खड़ी कर दी। गोया, आने वाले समय में मनुष्य अपनी प्यास ईंट और सीमेंट की दीवारों के माध्यम से बुझा लेगा। राजस्थान की मध्यप्रदेश की सीमा से लगने वाला एक कस्बा है- बकानी। बकानी कस्बे में प्रवेश करते ही मुख्य बाजार में एक बावड़ी कुछ दशक पहले तक सबका मन आकर्षित कर लेती थी। लेकिन अब इस बावड़ी के ऊपर कुछ दुकानें बना दी गई हैं। बावड़ी की सीढिय़ों पर एक छोटा-सा दरवाजा है, जिस पर हमेशा ताला लगा रहता है। बावड़ी में कस्बे की गंदगी डाली जाती है। इसलिए कि कोई सहज ही इस बावड़ी में प्रवेश न करे, यह अफवाह उड़ा दी गई है कि बावड़ी में जिन्न है। कुछ जासूसी उपन्यासों में ऐसा कथानक आता है कि कुछ असामाजिक तत्व किसी पुराने किले पर कब्जा करने के लिए उस किले के अस्तित्व को भूत-प्रेत या जिन्न की कल्पनाओं से जोड़ देते थे, जिससे आम आदमी भयवश उस ओर जाने की हिम्मत न करे और अफवाह फैलाने वालों को अपनी मनमर्जी करने का मौका मिल जाए। कोचिंग केंद्र के लिए देश भर में चर्चित कोटा शहर में एक प्राचीन बावड़ी को इसी तरह जिन्न की बावड़ी कह कर उस पर कुछ लोगों ने लगभग कब्जा कर लिया।

कोटा शहर ने तो प्राचीन जल स्रोतों के साथ खिलवाड़ का एक पूरा सिलसिला देखा है। यह शहर हाड़ौती के पठार के सबसे निचले हिस्से में बसा है। पठार के ऊपरी हिस्से में बरसने वाला पानी तेजी से नीचे की ओर आता था और बस्तियों को नुकसान पहुंचाता था। सन 1326 में बूंदी के राजकुमार धीरदेह ने इस पठार पर तेरह तालाब बनवाए। उन दिनों कोटा बूंदी रियासत के अधीन हुआ करता था। ये तालाब न केवल पठार पर तेजी से नीचे की ओर दौड़ते पानी का वेग थाम लिया करते थे, बल्कि वर्षा जल को संचित करके अपने आसपास की बस्तियों के निवासियों को साल भर तक जरूरत का जल भी उपलब्ध कराया करते थे। इतना ही नहीं, ये प्राचीन जलाशय भूगर्र्भीय जल का स्तर कायम रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। लेकिन आजादी के बाद कोटा में विकास के नाम पर किसी तालाब को पाट कर रेलवे स्टेशन में बदल दिया गया, तो किसी तालाब पर बहुमंजिला बाजार खड़ा कर दिया गया, तो कहीं तालाब में बस्तियां बसा दी गईं। इस अनियोजित नगर नियोजन का परिणाम यह हुआ कि बरसों तक मामूली बारिश के बाद ही कोटा में बाढ़ के हालात बनते रहे। बाद में प्रशासन ने शहर को बाढ़ से बचाने के लिए पानी की धारा मोडऩे का उपाय किया, जिसमें पठार के ऊपरी हिस्से में बरसने वाले पानी को शहर में घुसने के पहले ही चंबल नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इससे शहर बार-बार आने वाली बाढ़ की मुसीबत से तो बच गया, लेकिन अब नया संकट पैदा हो गया। तालाब भूजल स्तर को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाया करते थे, लेकिन जब ऊपर की ओर बरसने वाला पानी शहर में प्रविष्ट ही नहीं होता तो भूगर्भीय जल के स्तर को बचाए रखने की तो बात दूर, धरती की प्यास बुझाने का पर्याप्त इंतजाम कैसे हो?

इसका परिणाम यह हुआ कि चंबल के किनारे बसे होने के बावजूद भूजल की दृष्टि से शहर की अधिकांश बस्तियां डार्क जोन में चली गईं। रही सही कसर 1970 के दशक में उन योजनाओं ने पूरी कर दी, जिनके तहत बड़ी संख्या में नलकूप खोदे गए। धरती की गोद से पानी उलीचने का इंतजाम तो हो गया, लेकिन उसके स्तर को बनाए रखने के इंतजामों का गला घोंट दिया गया। ऐसे में आने वाले दिन कितने संकट वाले हो सकते हैं, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
पानी जीवन की बुनियादी जरूरतों में एक है। रहीम ने इसीलिए कहा था-‘रहीमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।’ लेकिन हमने इस बात के मर्म को नहीं समझा। पानी की मानव जीवन में उपयोगिता के कारण ही इसे इतना महत्त्व दिया गया कि इसके बिना कोई पूजा संपन्न नहीं होने की बात कही गई। पानी का महत्त्व रेखांकित करने के लिए ही उस देवता का निवास पानी में माना गया, जिसे सृष्टि का पालनकर्ता कहा जाता है। पुराणों में भी कही गई इन बातों का प्रतीकात्मक अर्थ समझना आवश्यक है। कृष्ण ने तो यहां तक कहा कि पानी और वाणी का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। लेकिन हमने न नारायण के नारा (पानी का एक पर्याय) में रहने के प्रतीकात्मक अर्थ को आत्मसात किया और न पानी के दुरुपयोग से जुड़े पाप के मिथक को समझने की कोशिश की।

पानी के लिए मनुष्य प्रकृति पर निर्भर है, क्योंकि पानी का रासायनिक सूत्र जानने के बावजूद प्रयोगशालाओं में मानव उपयोग के लिए वांछित जल का निर्माण नहीं किया जा सकता। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि पानी की मर्यादा का सम्मान किया जाए और बरसात के जल का समुचित संग्रहण किया जाए। अगर पानी की मर्यादा का सम्मान नहीं किया तो पानी की ऐसी कोई विवशता नहीं है कि वह अपनी सीमाओं को लांघने में संकोच करे। तब बारिश के दिनों में नदियां यदि बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करके सब कुछ तहस-नहस करने पर आमादा हो जाएं तो शिकायत क्यों?          -अतुल कनक