‘आप’ की आपसी जंग

आम आदमी पार्टी के असंतुष्ट विधायकों का नेतृत्व कर रहे तथा पूर्व नेता प्रतिपक्ष सुखपाल खैहरा की बठिंडा रैली में उन्हें भंवर वाली स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। बठिंडा रैली में सुखपाल खैहरा के साथ कुल छ: विधायक खड़े दिखाई दिए। इसी कारण सुखपाल खैहरा ने आम आदमी पार्टी से अलग होने की जगह आतंरिक आजादी की बात कर अपनी राजनीतिक स्थिति को और खराब होने से अभी बचा लिया है। अपने को राजनीतिक भंवर से बाहर निकालने हेतु कन्वेंशन के दौरान जो प्रस्ताव पारित किए हैं वह इस प्रकार हैं । कन्वेंशन में न पहुंचने वाले विधायकों को लोग अपने गांव में घुसने न दें। इन नेताओं ने दिल्ली के नेताओं के पीछे लगकर पंजाब के लोगों को धोखा दिया है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के सभी पदों को निरस्त कर दिया गया। आने वाले दिनों में पद सृजित किए जाएंगे। हरपाल चीमा की बतौर नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को रद्द किया गया।  जरूरत पडऩे पर हमख्याली पार्टियों से गठबंधन का फैसला। फिलहाल सभी आप के साथ ही रहेंगे। द्य पंजाब के 22 जिलों में वर्करों के साथ लगातार बैठकें करेंगे।  बतौर नेता प्रतिपक्ष सुखपाल खैहरा के किए गए काम को सराहा गया।


आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल के विरुद्ध बगावत करते हुए सुखपाल सिंह खैहरा ने कहा कि पंजाब ईकाई को दिल्ली के भ्रष्ट नेताओं के चुंगल से आजाद कराना मेरा पहला मकसद होगा। खैहरा ने कहा कि पंजाबियों की सबसे बड़ी गलती तब हो गई जब वह दिल्ली से आये लुटेरों के पीछे लग गए। सुखपाल खैहरा वह भाषा बोल रहे है जो विदेशों में बैठे भारत विरोधी अलगाववादी बोलते हैं। दिल्ली को आज भी पंजाब विरोधी ठहराए जाने का यह खेल बहुत पुराना है।


देश में जब मुगल शासन था और मुस्लिम बादशाहों के कहर के विरुद्ध गुरुओं के नेतृत्व में पंजाबियों विशेषतया सिखों ने जब मोर्चा संभाला था और अपने खून से पंजाब के इतिहास को लिखा था तब दिल्ली के सत्ताधारियों को पंजाब विरोधी के रूप में ही देखा जाता था और यही सत्य भी था। लेकिन आज दिल्ली एक आजाद लोकतांत्रिक देश की राजधानी है और उसमें सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के मुख्यालय हैं और जो भी सत्ता में अतीत और वर्तमान में आये, भविष्य में आयेंगे वह जनता के प्रतिनिधि ही होंगे।


सुखपाल खैहरा दिल्ली को मुगल समय की दिल्ली के रूप में पेश कर मात्र कार्यकर्ताओं की भावना से खेल रहे हैं और विदेशों में बैठे पंजाब व देश को खण्डित करने वाले अलगाववादियों जिन से उन्हें सहायता व समर्थन मिलता है उनको खुश भी कर रहे हैं।


पंजाब के पिछले विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने विदेशों के उस वर्ग से ही सहयोग व समर्थन लिया था जो अलगाववाद को बढ़ावा देता आ रहा है और आज भी दे रहा हैं। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को अपने मुखौटे के रूप में ही विदेशों में बैठे अलगाववादी देख रहे थे। विदेशों में बैठे लोग आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के कंधे व चेहरे का इस्तेमाल कर रहे थे तो केजरीवाल उनका इस्तेमाल अपने राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने के लिए कर रहे थे। एक समय और सीमा के बाद दोनों को उपरोक्त स्थिति से मुक्त तो होना ही था। सुखपाल खैहरा की बठिंडा रैली उस दिशा में उठा पहला कदम ही कहा जा सकता है।


सुखपाल खैहरा और उनके अधिकतर सहयोगी विधायक विदेशों में बैठे पंजाबियों के सम्पर्क में है जिनकी पंजाब में ‘वोट’ तो नहीं लेकिन उनका ‘नोट’ पंजाब चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अरविंद केजरीवाल तथा उनके दिल्ली बैठे सहयोगियों की कमजोर होती साख का लाभ लेते हुए ही पंजाब इकाई के असंतुष्ट विधायकों ने बगावती रुख अपनाया है लेकिन आम आदमी पार्टी को नुकसान तो तभी हो सकता था अगर खैहरा के साथ 13 और विधायक मंच पर आते तब पार्टी दो फाड़ हो सकती थी। सात विधायकों की स्थिति तो न घर के न घाट के वाली है। इसलिए खैहरा व उनके सहयोगी विधायक वह रुख अपना रहे हैं ताकि राष्ट्रीय नेतृत्व उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई करे। निलम्बन होना ही खैहरा व उनके सहयोगी विधायकों का लक्ष्य रह गया है। अरविंद केजरीवाल यह मौका अभी तो खैहरा व उनके सहयोगियों को देने वाले नहीं है। अरविंद केजरीवाल व उनके सहयोगी विधायकों का पहला प्रयास तो खैहरा के साथ खड़े विधायकों को संतुष्ट कर खैहरा से अलग करना ही होगा। केजरीवाल धड़ा अगर खैहरा के साथ खड़े दो या तीन विधायकों को संतुष्ट कर अपने साथ ले आता हैं तो आम आदमी पार्टी की आंतरिक जंग में खैहरा की स्थिति कमजोर पड़ जाएगी और समय बीतने के साथ अलग-अलग पड़ जाने की संभावनाएं अधिक हैं।
सुखपाल खैहरा इस राजनीतिक जंग में अगर विजयी होकर निकले जिसकी आज संभावनाएं कम है लेकिन राजनीति में कुछ भी हो सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि फिर सुखपाल खैहरा एक लम्बी पारी खेलने का लक्ष्य ले सुखबीर बादल, नवजोत सिद्धू और मनप्रीत बादल से आगे बढ़ पंजाब की राजनीति में एक निर्णयक लड़ाई लड़ भावी मुख्यमंत्री के रूप में अपने को पेश करेंगे।


इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।