पैगोंग से नाकुला तक स्थाई हो समाधान

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद समाधान की दिशा में सकारात्मक प्रगति सुखद और स्वागत योग्य है। पैंगोंग झील के संदर्भ में जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह  का बयान आया कि भारत और चीन के बीच अपनी फौज को पीछे हटाने पर सहमति बन गई है। पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारे पर दोनों देशों की सेनाएं प्राथमिक पोस्ट पर तैनात अपने सैनिकों को जल्द ही वापस बुला लेंगी। 
 केंद्र सरकार की यह पहल राष्ट्रहित में जरूरी थी। इसका हमें आर्थिक फायदा भी होगा, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से लद्दाख सीमा पर करीब 50 हजार अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती से हमारे अब तक अरबों रुपए खर्च हो चुके हैं। बल्कि पिछले साल ५ मई से शुरू हुआ टकराव जब झड़प के साथ चरम पर पहुंचा तो जो कीमत न केवल भारतीय जवानों बल्कि चीनी जवानों को भी चुकानी पड़ी थी उसके बाद से पहली बार ऐसा लग रहा है कि चीन तनाव चाहता है। 
 दोनों देशों के बीच अनेक बार की औपचारिक और अनौपचारिक वार्ताओं के बाद कहीं ना कहीं है यह आशा है कि समाधान निकलेगा। चीन अगर चाहता तो न झड़प की स्थिति बनती और न ही विवाद इतना लंबा खिंचता। चीन के भाव में कोई अफसोस नहीं था। उसने तो यह तक नहीं बताया कि उसके कितने सैनिक सीमा पर हताहत हुए। लेकिन गलवान में भारत को जो घाव मिले उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। फिर भी सबसे अच्छी बात यह रही कि गलवान की घटना के बाद दोनों देशों ने अपेक्षाकृत संयम का परिचय दिया। दो विशाल देशों को ऐसे ही संयम का परिचय देते हुए, निरन्तर संवाद करते हुए अपनी समस्याओं का समाधान करना चाहिए। 
 इस बार चीन मुख्यत: दो वजहों से पीछे हटने को तैयार हुआ है। पहला कारण यह है कि गलवान में पिछले साल जून में हुई खूनी झड़प के बाद हमने अपने खंपा सैनिकों को पैंगोंग की दक्षिणी पहाडयि़ों पर तैनात कर दिया। खंपा लड़ाके तिब्बती सेना का हिस्सा रहे हैं और चीनी षडयंत्रों से अपने दलाई लामा की सुरक्षा करते रहे हैं। चूंकि कि सन् 1959 में दलाई लामा भारत की शरण में आ गए इसलिए ये सैनिक भी अब भारतीय फौज का हिस्सा बन गए हैं। पहाड़ों पर जंग लडऩे में इन सैनिकों का कोई भी सानी नहीं है। पैंगोंग के दक्षिणी हिस्से में नियंत्रण जमाते ही उत्तरी हिस्से में तैनात चीनी फौज हमारे निशाने पर आ गई। इतना ही नहीं, दक्षिण की इन पहाडयि़ों से हम उस स्थान पर भी नजर रख सकते हैं जहां इन दिनों भारत और चीन के फौजी कमांडर वार्ता करते हैं। हमारे लिए यह टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ क्योंकि पहाड़ों पर जो ऊपर  रहता है वह अतिरिक्त फायदे में रहता है।
दूसरी बड़ी वजह है. तनावग्रस्त इलाकों में अपने सैनिकों की भारी-भरकम तैनाती। आकलन है लद्दाख सीमा पर हमने 50 हजार जंबाजों को भेजा है। कमोबेश इतने ही फौजी चीन के भी हैं लेकिन हमारी वायुसेना चीन से कहीं बेहतर मानी जाती है। इतना ही नहीं हमारी सर्वेक्षण प्रणाली और टैंक सिस्टम भी उससे बढि़य़ा हैं। भारतीय फौज काफी ऊंची पहाडयि़ों पर भी लडऩे में सक्षम है, जबकि यह योग्यता चीन ही नहीं, विश्व के किसी अन्य देश के सैनिकों के पास नहीं है। इसका अर्थ है कि आत्मविश्वास के मामले में हम चीनी फौज से कहीं अधिक धनी हैैं। यह विश्वास दुश्मन का मनोबल तोडऩे के लिए काफी है।
 अगर हम नाकुला की चर्चा न करें तो पैंगोंग विवाद सुलझने का ज्यादा मतलब नहीं रहेगा। हमारे रक्षा मंत्री ने भारी जोर देकर कहा है कि हम अपनी एक इंच जमीन भी चीन को नहीं देंगे ,लेकिन इस पड़ोसी मुल्क पर विश्वास करना खतरे से खाली नहीं है। सैन्य और राजनीतिक कूटनीति साथ -साथ चलेगी तभी हम इस देश के साथ कोई स्थाई सुलह समझौता कर सकेंगे।
  हालांकि यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि विभिन्न विश्व मंचों पर चीन भारत के खिलाफ आक्रामक रहा है चाहे पाकिस्तान की कारगुजारिओं का समर्थन हो या सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता की चर्चा । चीन तो भारत विरोधी आतंकियों के समर्थन में भी खड़ा दिखता रहा है। चीन के व्यवहार की तुलना करें, तो पता चलेगा कि भारत ने कितने संयम का परिचय दिया है  ।
यह अवसर है जब चीन व्यापकता में भारत की उपयोगिता समझे और यह भी माने कि भारत की जमीन कुतरने के जमाने लद गए। आज विश्व में भारत की आर्थिक, कूटनीतिक और राजनीतिक स्थिति बहुत सशक्त है। चीन के लिए भारत एक विशाल और करीबी बाजार साबित हो सकता है। पर इसके लिए जरूरी है कि वह सीमा विवादों का स्थाई व व्यावहारिक समाधान करे। 
 गौरतलब है कि चीन ने अपने विशाल पड़ोसी देश रूस के साथ जब अपने सीमा विवादों का समाधान किया, तभी दोनों देशों के बीच संबंध नई ऊंचाइयों पर पहुंचे, ठीक उसी तरह की ऊंचाई भारत-चीन संबंधों को भी हासिल हो सकती है। अच्छे संबंधों को संजोने और सशक्त करने की जिम्मेदारी चीन पर ज्यादा है, क्योंकि उससे भारतीयों का विश्वास उठ चुका है। कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक सीमाओं पर शांति और शालीनता बहाल होनी चाहिए, तभी दोनों देश ईमानदारी से एक- दूसरे के साथ खड़े हो सकेंगे। दोनों बड़े देश अगर मिलकर चलें, तो ना केवल एशिया, बल्कि दुनिया में  न्याय,शांति और समृद्धि को बल मिलेगा। चीन की मंशा अगर सही है, तो यह मौका है कि दोनों देश अपनी- अपनी हदों-सरहदों को ठीक से पहचान लें और एक बड़ी जरूरत सीमावर्ती इलाकों में बुनियादी ढांचे के निर्माण कार्यों को गति देने की भी है।

-डा. एस.पी. सिंह
-लेखक लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं।