लंबित मुकदमों का भारतीय न्यायिक प्रक्रिया पर प्रभाव

आज लगभग 4 करोड़ लंबित मामले देश के अदालतों में हैं। न्याय में देरी अन्याय के समान होता है। त्वरित न्याय संपूर्ण न्याय होता है। देश के सर्वोच्च न्यायालय में लगभग 62000 मामले लंबित पड़े हैं। देश के उच्च न्यायालयों में 5152921 मामले लंबित हैं। निचली और जिला अदालतों में लगभग 3 करोड़ 47 लाख विवादित मामले लंबित हैं। यदि मौजूदा रफ्तार से लंबित मामलों का निपटारा होता रहा तो सभी विवादित मामलों को निपटाने में न्यायालयों को 300 साल लग जाएंगे। न्यायिक व्यवस्था में देरी का प्रमुख कारण देश में जजों की कमी है। भारत में जजों की संख्या काफी कम है। ऑस्ट्रेलिया में प्रति 10 लाख लोगों पर 42 जज हैं, कनाडा में 75, ब्रिटेन में 51, अमेरिका में 107 जबकि भारत में प्रति 10 लाख व्यक्तियों पर मात्र 11 जज हैं। निचली अदालतों में जजों की संख्या 25750 है जबकि 17900 जज ही कार्यरत हैं। देश को कम से कम 10000 और जजों की आवश्यकता है। सबसे दुखद बात यह है कि देश में 150 मामले ऐसे हैं जो 60 साल से अधिक समय से लंबित पड़े हैं। 90000 मामले 30 साल से अधिक समय से लंबित हैं। 28.23 लाख मामले 10 साल से अधिक समय से और 60 लाख मामले 5 साल से अधिक समय से विभिन्न न्यायालयों में लंबित पड़े हैं। अदालतों को आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। देश के सभी न्यायालय कंप्यूटराइज्ड होने चाहिए। सभी जजों को मुफ्त में लैपटॉप, वाईफाई, आधुनिक टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण की सुविधा दिया जाना चाहिए। न्यायालयों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। देश में जजों के हजारों पद रिक्त पड़े हुए हैं जिनको भरे जाने की सख्त जरूरत है। अगर देश के उच्च न्यायालय की बात करें तो लंबित मामलों के दृष्टि से इलाहाबाद उच्च न्यायालय देश में पहले नंबर पर है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 7.46 लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में 6.07 लाख, मद्रास उच्च न्यायालय में 5.7 लाख, राजस्थान उच्च न्यायालय में 5.07 लाख मामले लंबित पड़े हैं। सिक्किम उच्च न्यायालय में सबसे कम मात्र 240 मामले लंबित हैं। यदि जिला स्तरीय न्यायालयों में लंबित मामलों की बात की जाए तो उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिला स्तरीय एवं निचली अदालतों 82 लाख मुकदमें लंबित हैं। महाराष्ट्र में 42 लाख जबकि बिहार में 31 लाख विवादित मामले पड़े हैं। सबसे कम 681 मुकदमें लद्दाख में लंबित हैं। देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 3677089 सिविल मामले जबकि 1475832 क्रिमिनल मामले लंबित हैं। इसकी उल्टी कहानी देश के निचली अदालतों में है। इस समय देश के विभिन्न जिला अदालतों और निचली अदालतों में 2.5 करोड़ क्रिमिनल मामले जबकि 94.5 लाख सिविल मामले लंबित हैं। अदालतों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया जा रहा है। देश के लगभग 16845 जिला एवं निचली अदालतों को कंप्यूटराइज्ड कर दिया गया है। इस कार्य के लिए केंद्र सरकार ने लगभग 1500 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाना नितांत आवश्यक है। न्यायिक व्यवस्था सुदृढ़ हो इसके लिए जजों की संख्या बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। सरकार को गंभीरता से इस दिशा में काम करने की आवश्यकता है तभी देशवासियों को त्वरित न्याय देने के सपने को साकार किया जा सकता है। 
    प्रोफेसर विवेक सिंह
    लेखक प्रसिद्ध स्तंभकार, विचारक, आर्थिक, 
        राजनैतिक एवं सामाजिक विश्लेषक हैं। 
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