राहुल गांधी का विकल्प

गोवा के 10 विधायकों का कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाना, कर्नाटक के कांग्रेस के 10 विधायकों का त्यागपत्र, विभिन्न प्रदेशों की कांग्रेस इकाईयों में अंतर्कलह और बागियों की आवाज बुलंद होने से स्पष्ट है कि देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल का संकट बढ़ता ही चला जा रहा है। संकट का तत्कालीक कारण लोकसभा चुनावों में हार के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा हार की जिम्मेवारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र देना ही है। राहुल के त्यागपत्र के बाद गांधी परिवार द्वारा इस मुद्दे को लेकर साधी चुप्पी के कारण स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही है।

संकट की इस घड़ी से निकलने के लिए कांग्रेस ने अपने कार्यसमिति के सदस्यों को अध्यक्ष पद के लिए नाम सुझाने के लिए कहा है। ऐसे संकेत हैं कि 15 जुलाई को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हो सकती है और इसमें राहुल गांधी का त्यागपत्र स्वीकार कर नये अध्यक्ष की घोषणा हो सकती है।

सूत्रों के अनुसार कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों से नये अध्यक्ष को लेकर अनौपचारिक बातचीत हो रही है। सभी नेताओं से उनकी पसंद पूछी जा रही है। पार्टी ने वेणुगोपाल को ही यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे किसी एक नाम पर सहमति बनाने का प्रयास करें। अध्यक्ष पद के लिए युवा नेताओं में पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट और मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा तो बुजुर्ग नेताओं में सुशील कुमार शिंदे और मल्लिकार्जुन खडग़े के नाम आगे चल रहे हैं। सीडब्ल्यूसी के एक सदस्य अनुसार यह सही है कि नए अध्यक्ष को लेकर सभी सदस्यों से अपनी राय और पसंद बताने के लिए कहा गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि वे दिल्ली में ही बने रहें क्योंकि नए अध्यक्ष के चयन को लेकर सीडब्ल्यूसी की बैठक कभी भी हो सकती है। कांग्रेस के नए अध्यक्ष के चयन में हो रही देरी को लेकर पार्टी सूत्रों ने कहा कि राजनीतिकारों के समक्ष सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि गांधी परिवार ने इस पूरे मामले में खुद को बिल्कुल अलग कर लिया है। राहुल गांधी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य पार्टी का अध्यक्ष नहीं बनेगा और परिवार अपनी ओर से पार्टी पर कोई अध्यक्ष नहीं थोपना चाहता, लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि इस कुर्सी तक वही पहुंचेगा जो पार्टी व गांधी परिवार के बीच तालमेल बनाएगा।

गौरतलब है कि कांग्रेस में युवा वर्ग और बुजर्ग वर्ग नये अध्यक्ष को लेकर आमने-सामने हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डा. कर्ण सिंह ने स. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुला इस अनिश्चितता के दौर को समाप्त करने की बात कही थी, लेकिन कांग्रेस के एक अन्य दिग्गज नेता जनार्दन द्विवेदी ने कांग्रेस में हो रहे सलाह-मशविरे के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। द्विवेदी ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि राहुल गांधी का इस्तीफा आदर्श स्थापित करता है। मगर अध्यक्ष के इस्तीफे के बाद भी पार्टी ज्यों की त्यों चल रही है, कोई पद छोडऩे को तैयार नहीं तो आगे वे कुछ पाने के भी हकदार नहीं। द्विवेदी ने कहा कि पांच साल पहले युवा चेहरों को मौका देने की बात उठी थी तब उन्होंने महासचिव पद से अपना इस्तीफा सोनिया गांधी को सौंप दिया था और इसलिए वे सवाल उठा रहे हैं। नए अध्यक्ष की तलाश में जुटे पार्टी नेताओं की मंत्रणा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए द्विवेदी ने कहा इसके लिए कोई 'मैकेनिज्मÓ होना चाहिए। जो लोग चर्चा कर रहे हैं वे कौन हैं? यह समन्वय समिति नहीं हो सकती क्योंकि लोकसभा चुनाव के लिए बनी समन्वय समिति चुनाव खत्म होते ही समाप्त हो गई। उन्होंने कहा कि जब सोनिया गांधी 2014 में इलाज के लिए लंबे विदेश प्रवास पर गईं तो चार नेताओं के समूह को अध्यक्ष के कामकाज का जिम्मा सौंप गईं। उनके अनुसार राहुल तकनीकी रूप से अब भी अध्यक्ष हैं और इसीलिए वे पैनल बनाएं या कार्यसमिति तुरंत इसका फैसला करे। गौरतलब है कि तब इस समूह में राहुल गंधी, एके एंटनी और अहमद पटेल के साथ जनार्दन द्विवेदी भी शामिल थे। द्विवेदी ने कहा कि उनकी जानकारी के मुताबिक एके एंटनी जैसे वरिष्ठ नेता अध्यक्ष की मंत्रणाओं में शामिल नहीं है तो यह सवाल स्वाभाविक है कि वह कौन सी कमेटी है जिसमें एंटनी भी नहीं गए। दशकों तक गांधी परिवार के करीबियों में रहे द्विवेदी ने कहा कि 134 साल के इतिहास में केवल चार-पांच बार कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ है। हमेशा कार्यसमिति ही अध्यक्ष का नाम तय करती है और बाद में एआईसीसी में प्रस्ताव पारित कर उसे चुना जाता है। पीवी नरसिम्हा राव, सीताराम केसरी और सोनिया गांधी भी इसी प्रक्रिया से अध्यक्ष बनी थीं। कांग्रेस की रीति नीति से जुड़े कुछ मुद्दों पर असहमत और मुखर रहने के लिए चर्तित रहे द्विवेदी ने कहा कि पार्टी की मौजूदा पीड़ा की वजह बाहरी कम भीतरी ज्यादा है।

कांग्रेस को अगर मौजूदा स्थिति से बाहर निकलना है तो सबसे पहले पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रणाली की बहाली कर अध्यक्ष पद का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से करवाना चाहिए, तभी कांग्रेस की रगों में नया खून दौड़ेगा और वह वर्तमान और भविष्य की चुनावी चुनौतियों के लिए अपने को तैयार भी कर पाएगी। गांधी परिवार ने जो रवैया अपनाया है उससे यह संकेत भी मिलते हैं कि इस परिवार की टांगे खींचने वाले नेताओं को वह उनकी औकात बताने के बाद ही अपना कोई निर्णय देगा। लेकिन दोनों स्थितियों को ले कांग्रेस नेतृत्व निर्णय लेने में जितनी देरी करेगा कांग्रेस को उतना अधिक राजनीतिक नुकसान होगा। कांग्रेस राहुल गांधी का विकल्प जितनी जल्दी ढूंढ लेगी उतना उसके लिए बेहतर होगा।

इरविन खन्ना,  मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।