अब चीन की साइबर जासूसी

एलएसी पर शांति भंग करने की चीन की कोशिशें लगतार जारी हैं। भारतीय सैनिकों के साथ खूनी संघर्ष के बावजूद चीन अपने व्यवहार में बदलाव नहीं ला रहा है। एक ओर बातचीत का दौर जारी है तो वहीं दूसरी ओर एलएसी पर दिनों दिन तनाव का अनुपात बढ़ता जा रहा है। इस बीच चौंकाने वाली खबर सामने आई कि चीन भारत के तमाम महत्वपूर्ण लोगों की जासूसी करवा रहा है। मामला साइबर जासूसी से जुड़ा है। ऐसे में इस मामले की गंभीरता और भी बढ़ जाती है। असल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी व सेना से जुड़ी एक आईटी कंपनी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, विपक्षी नेताओं तथा राज्यों के मुख्यमंत्रियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी जुटाती रही है। गोपनीय ढंग से डेटा जुटाना चीन के ‘हाइब्रिड वारफेयर’ की कुत्सित प्रयासों का महत्वपूर्ण भाग है, जिसके जरिये गैर सैन्य तौर-तरीकों से किसी देश को नुकसान पहुंचाने के प्रयास किये जाते हैं। जाहिर है कि ये डेटा जुटाकर भारत के खिलाफ इन्हें सूचना हथियार के रूप में ही प्रयुक्त किया जायेगा। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया और भारत कोरोना संक्रमण के भयावह संकट से जूझ रहा है, चीन की कुत्सित चालें बताती हैं कि यह देश कितना निर्मम है और अपने साम्राज्यवाद के विस्तार के लिये किसी भी सीमा तक जा सकता है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब चीनी सरकार पर किसी देश के लोगों का डेटा चुराने का आरोप लगा है। रिपोट्र्स के मुताबिक, चीन की सत्तारूढ़ पार्टी, सेना और निजी कंपनियों अमूमन ही ऐसे ऑपरेशन चलाती हैं, जिसमें देशों का टारगेट किया जाता है। साइबर जासूसी चीन की पुरानी आदत है। मार्च 2009 में भी इस तरह की खबरें प्रकाशित हुइ्र थी। तब चीन की जासूस टोली ‘घोस्टनेट’ पुरी दुनिया के कंप्यूटरों पर चोरी छिपे नजर रख रही थी और उसने तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाईलामा समेत कई सरकारी और निजी कार्यालयों के महत्वपूर्ण दस्तावेज चुराए थे। उस समय  ‘द न्यूयार्क टाईम्स’ ने कनाडा के अनुसंधानकर्ताओं के हवाले से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ था। टोरंटो विश्वविद्यालय के मंक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र की टीम ने अखबार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इस जासूस टोली ने पिछले दो वर्षों में 103 देशों में 12 कंप्यूटरों में हैकिंग की है। जासूस टोली ने ब्रसेल्स, लंदन और न्यूयार्क में दूतावासों, विदेश मंत्रालयो, सरकारी कार्यालयों तथा भारत में निर्वासन का जीवन जी रहे दलाईलामा के कंप्यूटरों से महत्वपूर्ण और गोपनीय सूचनाएं चुराईं। हालांकि अमेरिकी सरकार के कार्यालय इससे बचे रहे। अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि चीन में स्थित कंप्यूटरों के जरिए यह जासूसी चल रही है।

ताजा घटनाक्रम में चीन की साइबर जासूसी गतिविधियों का मकसद भारत के राजनीतिक ढांचे में घुसपैठ करना है। ताकि भारत के मुकाबले में उसे अपर हैंड मिल सके। शिन्हुआ की थ्रेट इंटेलिजेंस सर्विस वैसी ही है, जिसका इस्तेमाल आजकल लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियां किसी क्रिमिनल को पकडऩे में करती हैं। यह सर्विसेस किसी देश के भीतर कारगर साबित हो सकती है। मीडिया के माध्यम से जो खबरें लगातार सामने आ रही हैं उनके मुताबिक चीन की जासूस कंपनियां सिर्फ  भारत का ही डाटा इक_ा नहीं कर रही हैं, बल्कि 10 से ज्यादा देशों में करीब 2.5 लाख लोगों की जासूसी की है। एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि अकेली जेन्हुआ डाटा कंपनी करीब 30 लाख वैश्विक हस्तियों पर निगरानी रखे हुए है। अमरीका में सबसे अधिक करीब 52,000 लोगों, ब्रिटेन में शाही परिवार समेत 40,000 से अधिक लोगों, ऑस्ट्रेलिया के करीब 35,000 नागरिकों और संगठनों की जासूसी कर चीनी कंपनी ने एक पुख्ता डाटाबेस तैयार कर लिया है। चीन में ऐसा डाटा सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी को मुहैया कराना कंपनियों की बाध्यता है। सरकार में चीन की सेना भी शामिल है। 

वास्तव में चीन ने जासूसी के तरीके बदले हैं और फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्स एप सरीखे सोशल मीडिया के जरिए सूचनाएं, समाचार, विचार, आलेख, नीतिगत फैसलों और चीन के बारे में देश का औसत अभिमत आदि का डाटा इक_ा किया गया है। चीन के लिए ऐसी जासूसी भी सामरिक रणनीति से कमतर नहीं है। आजकल युद्ध सिर्फ मैदान पर ही सेनाओं के बीच नहीं लड़े जाते, बल्कि साइबर से अंतरिक्ष तक युद्ध के मैदान खुले हैं। जाहिरा तौर पर देश का मन पढऩे और भावी रणनीतियों के निर्धारण के घटकों को समझकर चीन अपनी चालों को चलने की तैयारी में है। ऐसे में लगता है कि भले ही देर से ही सही, भारत सरकार ने पिछले दिनों चीन के जिन दो सौ एप पर प्रतिबंध लगाया है, वह इस दिशा में उठाया गया सही कदम था। इससे बढक़र आगे देखें तो चीन ने भारतीय बाजारों को स्मार्टफोनों से पाट दिया है, जिनके माध्यम से तमाम आम व खास लोगों के डेटा पर आसानी से हाथ डाला जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीन उन्नत तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिये उस मुकाम पर पहुंच गया है कि अमेरिका समेत पूरी दुनिया में उस पर राजनीतिक-सामरिक जासूसी के आरोप लग रहे हैं। निस्संदेह साइबर रूट के जरिये भारत के प्रमुख नागरिकों व संस्थाओं की जासूसी किया जाना राष्ट्रीय चिंता का विषय है। भारत अपने स्तर पर तो कार्रवाई करेगा ही, लेकिन इस विषय को दुनिया के बहुविध मंचों पर भी साझा किया जाना चाहिए, क्योंकि चीन कई देशों में जासूसी का खतरनाक अभियान छेड़े हुए है। नागरिकों की सूचनाओं की गोपनीयता के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी नीतियों पर नये खतरे के संदर्भ में विचार करने की जरूरत है। इसके लिये सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में कड़े प्रावधान शामिल किये जाएं, तभी साइबर सुरक्षा के प्रयासों को कवच प्रदान किया जा सकेगा। इतना ही नहीं, देश को इस बात पर विचार करना होगा कि आने वाले समय का युद्ध महज परंपरागत तौर-तरीकों से ही नहीं लड़ा जायेगा। तीनों सेनाओं को साइबर युद्ध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता लैस तकनीकों से मुकाबले के लिए तैयार करने की जरूरत है। यहां उल्लेखनीय है कि चीनी कंपनी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, आर्मी, नेवी और एयरफोर्स प्रमुखों समेत महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्थानों की निगरानी भी कर रही थी।

सरकार को सूचना प्रौद्योगिकी और आमतौर पर संचार से जुड़ी चीनी कंपनियों या चीनी भागीदारी की कंपनियों पर पाबंदी थोप देनी चाहिए। समीक्षा बाद में होती रहेगी। अब देशहित में लगता है कि 200 चीनी एप्स को बंद करना अथवा 4 जी या 5 जी के कार्यों में चीन की भागीदारी को खत्म करना कितना जरूरी था? क्योंकि ये मामले राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधा जुड़े हैं। निस्संदेह इस हाईटेक षड्यंत्र के दूरगामी घातक परिणाम हो सकते हैं। दरअसल, आज युद्ध परंपरागत तौर-तरीकों के बजाय तकनीक निपुणता के बूते कई मोर्चों पर लड़े जा रहे हैं। हमें अपने विशिष्ट लोगों और महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्थानों की सुरक्षा रणनीति पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है।  चीन की साइबर जासूसी के खबरों के बाद अब यह देखना अहम होगा कि भारत सरकार इसका जवाब किस तरह देगी? कांग्रेस ने लोकसभा में तार्किक मांग की है कि विदेश मंत्रालय को दिल्ली में चीन के राजदूत को तलब करना चाहिए और अपना शुरुआती विरोध दर्ज कराना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि यह डेटा वॉर का जमाना है. हम जब डेटा को टुकड़ों में देखते हैं तो नहीं समझ पाते हैं कि आखिर इससे कोई क्या हासिल कर सकता है? लेकिन इन्हीं छोटी-छोटी जानकारियों को एक साथ जुटाकर और उनका किसी खास मकसद से हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। देश के आतंरिक मुद्दों, राष्ट्रीय नीति, सुरक्षा, राजनीति, अर्थव्यवस्था सबसे में सेंधमारी के प्रयास किए जा सकते हैं।    -डॉ. श्रीनाथ सहाय