आसान नहीं भीड़ पर काबू पाना 

भीड़ कुछ लोगों के लिए अतिवादी एजेंडे की भांति रही है जिसका इस्तेमाल जरूरत पडऩे पर किया जाता रहा है। भीड़ आंधी के समान होती है। लोकतंत्र पर जब भीड़तंत्र हावी होने लगे तो उसके दुष्परिणाम दिखने में देर नहीं लगती। भीड़ से अब तक देश में कई बड़ी घटनाएं घटी लेकिन विगत वर्षों में ज्यादा इजाफा हुआ है। एक सच्चाई यह भी है कि भीड़ पर तुरंत पार पाना न कानून के बस की बात है और न ही सरकारी सुरक्षा तंत्र की। बेकाबू भीड़ पर किसी का जोर नहीं चलता। 
कई बार देखने को मिला है कि पुलिस व सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी में ही लाखों की संख्या में एकत्र लोगों ने भयंकर कृत्य को अंजाम दे दिया। घटना को सुरक्षाकर्मी सिर्फ तमाशबीन बनकर देखते रहे लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट की इस समस्या पर चिंता व्यक्त करना भीड़तंत्र पर काबू पाने का कारगर हथियार साबित हो सकता है। गोरक्षा के नाम पर पिछले कुछ सालों में भीड़ ने कई बेगुनाह लोगों को सरेआम कुचलकर मौत के घाट उतार दिया। प्रधानमंत्री खुद ऐसी घटनाओं से बेहद चिंतिंत हैं। इसके अलावा बच्चा चोरी के मामलों में निर्दोष लोगों को बलि का बकरा बनाने की भी खबरें आए दिन सामने आ रही हैं। 
विगत दिनों दिल्ली में एक ऐसी ही घटना घटी। अस्पताल का एक कर्मचारी अपने काम से अस्पताल परिसर से होते हुए मरीजों के वार्ड में जा रहा था। परिसर में उसे एक छोटा सा बच्चा दिखाई दिया। कर्मचारी उस बच्चे को दुलार भाव से बात करने लगा। तभी पीछे से किसी ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया। बच्चा चोर, बच्चा चोर, चिल्लाने लगा। कुछ ही समय में वहां दर्जनों लोग एकत्र हो गए। अस्पताल कर्मचारी इससे पहले कोई सफाई देता, उसकी जमकर धुनाई कर दी। गनीमत इस बात की रही कि समय रहते दूसरे कर्मचारियों ने उसे बचा लिया नहीं तो उसका काम तमाम कर देते। यह घटना मात्र एक उदाहरण है। ऐसी घटनाएं लगातार पूरे देश में घट रही हैं। 
भीड़ पर प्रतिबंध का व्यापक असर तभी देखने को मिलेगा जब ऐसी अराजकता के खिलाफ जनमानस की एकजुटता और सरकारी तंत्र का ईमानदारी से आह्वान करना होगा। कानून बना देने मात्र से ही समस्या का समाधान नहीं हो सकता। भीड़ से उत्पन्न समस्या को रोकने के लिए जागरूकता जरूरी है क्योंकि हिन्दुस्तान का बहुसंख्यक आवाम मिल-जुलकर, शांति से रहने में ही भरोसा रखता है। भीड़ अपना उग्र रूप तभी धारण करती है जब उन्हें पीछे से कोई उकसाता है। कुछ सियासी लोग अपने लाभ के लिए लोगों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोभियों से हमें बचने की जरूरत है। 
गोरक्षा के नाम पर भीड़ का किसी निर्दोष पर हमला करना जायज नहीं। कुछ समय पहले गिरिडीह में घटी घटना को याद करके रूह आज भी कांप उठती है। गिरिडीह जिले के दस किलोमीटर दूरी पर स्थिति बारवाबाड़ गांव के रहने वाले मोहम्मद उस्मान पर हमला इसलिए हुआ क्योंकि उनके घर के बाहर एक मरी पड़ी गाय को लोगों ने देख लिया। आसपास के लोगों को लगा कि उस्मान ने उस गाय को मारा था। कुछ ही समय में गाय के मरने की झूठी खबर पूरे इलाके में आग की तरह फैल गई। थोड़ी ही देर में उस्मान के घर सैंकड़ों लोग एकत्र हो गए। एकत्र लोगों ने उस्मान के घर के एक हिस्से को आग के हवाले कर दिया। कुछ उन्मादियों ने तो उस्मान को भी आग में फेंकने की कोशिश की। दरअसल उस्मान सिर्फ गाय पालता है। उनके पास कई गायें हैं। उनका परिवार बारवाबाड़ और पड़ोस के मांद्राव गांव में दूध बेचने का काम करता है। गनीमत इस बात की रही कि समय पर पुलिस घटना स्थल पर पहुंच गई और हालात पर काबू पा लिया, नहीं हालात और बिगड़ सकते थे। फिर भी लोगों ने उस्मान को अधमरा करके ही छोड़ा। पुलिस ने उसे इलाज के लिए तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया जिससे उसकी जान बच सकी।
समय की दरकार है कि सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बाद केंद्र व राज्य सरकारों को अराजक भीड़तंत्र पर अंकुश लगाने के ठोस उपाय उठाने ही होंगे। आम जनता के अलावा सियासी दलों, सामाजिक संगठनों को भी इसमें सक्रियता दिखानी चाहिए। हिन्दुस्तान जैसी बड़ी आबादी और बहुविध संस्कृति वाले देश में लोगों को उकसाना आसान होता है। 
 एक बात यह भी सच है कि भीड़ की घटनाओं को रोकने की पहली जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। इस बाबत केंद्र सरकार की ओर से बार-बार एडवाइजरी भी जारी की जाती है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी अफवाहों को रोकने के लिए भी एजेंसियों से कहा गया था लेकिन असर ज्यादा कुछ नहीं हुआ। 
भीड़ रोकने की नई व्यवस्था पर नजर डालें तो सुप्रीम कोर्ट का चाबुक चलने के बाद सभी राज्य सरकारें भीड़ पर काबू पाने के लिए अपने प्रत्येक जिलों में एक-एक नोडल अफसर नियुक्त करेंगी जिनका मुख्य: काम इंटेलिजेंस यूनिट और स्थानीय थानाध्यक्षों के साथ मिलकर सोशल मीडिया पर भडक़ाऊ सामग्री के प्रचार-प्रसारों पर निगरानी करनी होगी। सभी राज्य एक और बड़ा कदम उठाएंगे। दरअसल भीड़ जैसे अपराधों की खुफिया सूचना एकत्र करने को स्पेशल टास्क फोर्स गठित की जाएगी क्योंकि भीड़ को हमेशा उकसाया जाता है। उसके पीछे की शक्तियों को खोजना होगा। 
इसके अलावा राज्य तीन सप्ताह में ऐसे जिलों-गांवों को चिह्नित करें जहां पिछले पांच साल में भीड़ द्वारा घटनाओं को अंजाम दिया गया समय-समय पर राज्य के डीजीपी व गृह सचिव जिले के नोडल अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठकें भी किया करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सभी राज्य एक और बड़ा फैसला लेंगे। सोशल मीडिया पर आज झूठ व भ्रामकता का जो जाल फैला पड़ा है उसे किसी भी सूरत में समेटने की चुनौती होगी। अब भडक़ाऊ संदेश और वीडियो प्रचारित करने वालों के खिलाफ 153ए में एफआइआर दर्ज होगी। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि ये कदम कागजी नहीं होंगे। इसे ईमानदारी से लागू किया जाएगा।
रमेश ठाकुर