भय बिनु होई न प्रीति 

12:52 PM Jun 30, 2019 |

रामचरितमानस में आता है कि जब भगवान राम तीन दिन समुद्र से रास्ता देने के लिए विनती करते रहे पर समुद्र ने रास्ता नहीं दिया तब वे अपने भाई लक्ष्मण से कहते हैं: - 
बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥

अर्थात तीन दिन बीत गये, यह समुद्र जड़ है विनती नहीं सुन रहा। मैं धनुष वाण से इसे सुखा देता हूं। श्रीराम के क्रोध को देख कर ही समुद्र ने प्रगट हो भगवान से विनती की तथा क्षमा भी मांगी व सेतु बनाने का तरीका भी बताया। उपरोक्त नीति पर चलते हुए ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े दो विधेयकों पर बोलते हुए कहा कि भारत का विरोध करने वालों के मन में भय है, होना भी चाहिए। सरकार की भावी रणनीति का साफ संकेत देते हुए लोकसभा में शाह ने कहा, यह मत भूलिए कि अनुच्छेद 370 अस्थायी है। उन्होंने कश्मीर के हालात बिगाडऩे के लिए कांग्रेस को जिम्मेवार ठहराते हुए पंडित नेहरू से मनमोहन सिंह सरकार तक को आड़े हाथों लिया। शाह ने पूछा कि आज एक-तिहाई कश्मीर हमारे साथ नहीं, इसका जिम्मेदार कौन है? 

विधेयकों पर चर्चा के जवाब में शाह बोले, अभी कुछ ने कहा, वहां डर का माहौल है। मैं बता देना चाहता हूं कि आम आदमी वहां खुश है। जो देश के खिलाफ हैं, जो देश तोडऩा चाहते हैं वे डरे हुए हैं। उन्हें डरना भी चाहिए। उनका डर अभी और बढ़ेगा। हम टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्य नहीं हैं। हमने वहां लोगों को नौकरियां व सरकारी योजनाओं का लाभ देना शुरू कर दिया है। वे हमारे भाई-बहन हैं, हम उन्हें गले लगाना चाहते हैं। इसके लिए आंतक को जड़ से खत्म करना होगा। 

 कश्मीर समस्या के लिए पहले प्रधानमंत्री नेहरू को जिम्मेदार बताते हुए शाह ने कहा, धर्म के नाम पर देश का बंटवारा उनकी बड़ी भूल थी। अगर नेहरू ने अपने गृहमंत्री सरदार पटेल से सलाह ली होती तो आतंकवाद छोडि़ए पाक अधिकृत कश्मीर भी हमारा होता। शाह ने कहा, पूरी राजनीति तीन परिवारों (नेहरू-गांधी, अब्दुल्ला और मुफ्ती) पर केंद्रित कर कांग्रेस ने फर्जी चुनाव कराए। 

शुरूआती तीन चुनाव फर्जी थे। अब्दुल खालिक नामक जिला मजिस्टे्रट परचे ही नहीं लेता था। तीन परिवारों के लोग निर्विरोध चुने जाते थे। निष्पक्ष चुनाव मोरारजी देसाई व वाजपेयी सरकार के दौरान हुए। अब सरकार ने पंचायत चुनाव कर 4000 नुमांइदों को सत्ता की चाबी दी। सवाल है कि कांग्रेस इतने सालों तक चुनाव से क्यों परहेज करती रही? शाह ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक का जिक्र किया और कहा, आतंकवादियों के खिलाफ हमने जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई है। यह भी साबित किया है कि आत्मरक्षा में भारत पड़ोसी देश के घर में घुस कर वार करने से परहेज नहीं करेगा। इसी नीति के तहत सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया गया। पहले दुनिया को विश्वास नहीं हुआ कि भारत वाकई ऐसा कर सकता है। बाद में दुनिया ने माना कि भारत की नीति बदल गई है। 

जम्मू-कश्मीर को लेकर कांग्रेस द्वारा अपनाई नीति का ही परिणाम है कि घाटी में अधिकतर नेता व अलगाववादी अपने को भारतीय कानून से ऊपर समझते हैं। भारत का खाते-पीते हैं और गाली भी देते हैं। कांग्रेस सरकारों की तुष्टिकरण की नीति के कारण ही वहां के अलगाववादी नेता विदेशी आकाओं के इशारों पर भारत सरकार को ही आखें दिखाते हैं। अमित शाह ने शायद पहली बार सदन में जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों और आतंकवादियों सहित वहां के क्षेत्रीय दलों के नेताओं को बड़े स्पष्ट ढंग से वर्तमान सरकार की रीति-नीति बारे बताया है। गृहमंत्री का पद सम्भालते ही अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल मलिक सहित अन्य अधिकारियों से प्रदेश की स्थिति का जायजा लिया था। अमरनाथ यात्रा शुरू होने से पहले वे जम्मू-कश्मीर का दो दिन का दौरा भी करके आयें हैं। लोकसभा में जो भाव शाह ने प्रकट किये उससे स्पष्ट हो जाता है की जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को लेकर विशेषतया धारा 370 और उपधारा 35ए को लेकर कोई स्थाई समाधान ढूंढने में केंद्र सरकार लगी हुई है। जम्मू-कश्मीर में जिस तरह अलगाववादी और आतंकवादी मोदी सरकार के आने से पहले घूमते व बोलते थे अब उस स्थिति में अंतर दिखाई देता है। आतंकवादी सहमे हुए हैं तो अलगावादियों ने अपनी आवाज कुछ धीमी की है, लेकिन भारत का जनसाधारण गृहमंत्री शाह और प्रधानमंत्री मोदी से जम्मू-कश्मीर समस्या को मिले विशेष दर्जे को लेकर स्थाई हल चाहता है ताकि वहां भी देश के अन्य प्रदेशों की तरह सभी भारतीयों के लिए रहने और व्यापार करने के द्वार खुल जायें। शाह और मोदी की जोड़ी अगर जन साधारण के लिए जम्मू-कश्मीर में रहने और काम करने की राह बना देती है तो भारत की राजनीति में इनका नाम हमेशा सूरज और चांद की तरह ही अमर हो जाएगा। 

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।