दल बदलू कानून नहीं, जागरूक मतदाता रोक सकते हैं दल बदल का रोग

भारत की राजनीति में दल बदल शायद अब मान्यता प्राप्त प्रथा हो गई है। यद्यपि 1985 में दल बदल विरोधी कानून तो बन गया, पर दल बदलुओं ने अपने लिए बीच में से सुराख ढूंढ लिए और दल बदलते रहे। वैसे एक दल बदलू ऐसा व्यक्ति है जिसे मान, अपमान, कीर्ति अपकीर्ति की कोई चिंता नहीं। इसलिए विश्वास कीजिए कि दल बदल एक बीमारी है। इस बीमारी के रोगी को दल बदलू कहा जाता है। इनकी मानसिक स्थिति निश्चित ही अस्वस्थ है। इसीलिए जब भी चुनाव के दिन निकट आते हैं तो ये अपने अंतर में छिपे असंतोष या लालच या और पाने की इच्छा को दबा नहीं पाते और पूरी राजनीतिक मार्केट में यही देखते हैं कि कौन उन्हें बढिय़ा पद चुनावी टिकट, मंत्री पद का भरोसा और अकूत धन लाभ वाली स्थिति में पहुंचा सकता है। उत्तर भारत में दल बदल का रोग पहले हरियाणा से चर्चा में आया। आयाराम गयाराम के नाम से हरियाणा को पहचाना जाने लगा। इस आयाराम गयाराम के नाम से हरियाणा क्यों प्रसिद्ध हुआ, इसका कारण यह रहा कि अक्टूबर 1967 में हरियाणा के एक विधायक गयालाल ने पंद्रह दिनों के भीतर तीन बार दल बदलकर इस विषय को राजनीतिक मुख्यधारा में ला खड़ा किया। इसके साथ ही हरियाणा के साथ गयाराम का नाम पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया। इसके बाद तो धीरे-धीरे पूरे देश में दल बदल की बीमारी कोरोना से भी ज्यादा तेजी से फैल गई और कोई नहीं जानता था कि उसके निकटस्थ मित्र-बंधु, कार्यकर्ता के हृदय में यह दल बदल का रोग पल रहा है। काश उस समय कोई आरोग्य सेतु जैसे दल बदल सेतु भी होता। वैसे यह आरोगय सेतु भी आज कहीं प्रभावी होता दिखाई नहीं दे रहा। अगर कोई विश्वविद्यालय दल बदलुओं पर शोध करवाए तो यह जानकारी मिलेगी कि थोड़े बहुत अनुपात के अंतर से सभी राजनीतिक दलों में इसके रोगी हैं, पर यह निश्चित है कि जिस पार्टी का ग्राफ नीचे गिरता दिखाई देता है उसके अधिक सदस्य दल बदलते हैं। अपनी जिस पार्टी में उन्होंने वर्षों तक राज पद का आनंद लिया, सत्ता का उपभोग किया, उसी के लिए यह घोषणा हो जाती है कि उनका दम घुटता है, उन्हें पूरा आदर नहीं मिलता, उनकी अनदेखी की जाती है आदि-आदि। आश्चर्य है कि यह अनदेखी और दम घुटने का रोग वर्षों तक दबा रहता है। जैसे ही संसद या विधानसभा के चुनावों की घोषणा हो जाती है तब जिन राजनेताओं का दम घुटता है उन्हें उस पार्टी की खोज रहती है जहां उनको सत्ता की आक्सीजन पूरी तरह मिल जाए। वह फिर मंत्री बन जाएं और मंत्री बनने के लिए अपनी पूर्व पार्टी के जिनके भी अवगुण सार्वजनिक रूप से गिना सकते हों, उसमें कोई कमी न रहने दी जाए। वास्तव में यह स्वार्थपरता और राजनीतिक धोखेबाजी की अति है। आज का सवाल यह है कि इन दल  बदलुओं को कैसे यह समझाया जाए कि वे जो अपराध कर रहे हैं उसको अब देश की जनता सहने वाली नहीं। केवल मतदाता ही इन्हें सुमति दे सकते हैं। जब देश में दल बदल विरोधी कानून बना तब यह भरोसा हो गया था कि इन दल बदलुओं पर अब नियंत्रण रहेगा, पर इस कानून में भी कुछ ऐसे रास्ते छोड़ दिए जिसमें बड़ी सुविधा से राजनीति की मार्केट में नए आका खोज लिए जाएं। अगर कानून यह बनता कि दल बदलने के बाद नई पार्टी में कम से कम तीन वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकते तब संभवत: यह बीमारी इतनी तेजी से न फैलती। अच्छा होता तीन वर्ष के लिए दल बदल के लिए लाकडाउन लागू किया जाता। आज की स्थिति तो यह है कि एक मंच से अपनी पार्टी की निंदा करो और शीघ्र ही दूसरी पार्टी का चिन्ह गले में धारण कर लो वैसे ही जैसे एक चैपाया बिकता है तो अगले ही पल उसके गले में नई रस्सी और नए मालिक की घंटी बजने लगती है।

दोषी दल बदलने वाले तो हैं ही, पर वे भी हैं जो प्रतीक्षा करते रहते हैं कि दूसरे दलों के असंतुष्टों को लालच देकर या बहुत से सब्जबाग दिखाकर केवल हाथ खड़ा करने वाले कुछ सदस्य ले लिए जाएं। जिन राजनीतिक दलों की संस्कृृति एकदम नहीं मिलती, वह भी दल बदल की मार्केट में एक दूसरे को गले लगा लेते हैं। सीधी बात है बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया। पिछले पांच वर्षों में गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश जहां-जहां भी विधानसभा के चुनाव हुए, दल बदलुओं की चर्चा समाचारों में छाई रही। वे सत्ता पाने में कामयाब भी हो गए। आज भी यह आश्चर्य है कि जिस गति से पश्चिम बंगाल में लोग अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जा रहे हैं वहां उनके द्वारा ली गई संविधान की शपथ कहां गई, कितना अच्छा हो वहां के मतदाता यह सोचें। जो लोग अपने मतदाताओं के प्रति ही वफादार नहीं रहे, वे देश के और जिस नई पार्टी में जा रहे हैं उनके वफादार कैसे रहेंगे। मुझे आश्चर्य और अफसोस तो उन मतदाताओं पर भी है जो उनके साथ वैचारिक धोखा करने वाले लोगों को फिर वोट दे देती है। वैसे ये दल बदलू सब कुछ सहने की हिम्मत रखते हैं। मान-अपमान में इन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता। एक मंच से दिन को रात कहते हैं और दूसरे में रात को दिन भी कहने लगते हैं। अफसोस तो उन पर है जो इनके हर भाषण पर तालियां बजा देते हैं। देश कभी नहीं भूला होगा कि एक दल बदलू अपने पूर्व प्रधानमंत्री जी के लिए पहले यह कहता था कि न वह सरदार हैं, न असरदार। फिर जब किस्मत उसे उसी मंच पर ले गई जहां वे सरदारजी बैठे थे, तब उसने कहा कि आप सरदार भी हैं और असरदार भी। पिछले दिनों देश का एक जाना पहचाना नेता जिस नई पार्टी की शरण में गया, वहां उसने जैसा वफादारीपूर्ण भावुक भाषण दिया उससे यह कल्पना साकार हो गई कि इनके पूर्वजों ने जब अंग्रेजों के समक्ष घुटने टेके होंगे, तब भी शायद ऐसा ही शब्दजाल बुना होगा। हो सकता है उन शब्दों में अपनी सत्ता बचाने और राज सुविधा बनाए रखने के लिए इन्होंने अपना दिल भी डाल दिया हो। देश में दल बदलुओं पर नकेल डालने के लिए दल बदल विरोधी कानून तो बन गया, पर सत्य यह है कि हर कानून की धज्जियां उड़ाने के लिए कोई न कोई रास्ता यह सत्ता के दलाल ढूंढ लेते हैं। अच्छा हो जनता जागे, मतदान करे पर उनके लिए न करे जो अपनी मत थैले में लेकर मार्केट में उसकी कीमत लगाने के लिए घूमते हैं और जहां से अच्छी कीमत मिल जाए, सत्ता धन की प्राप्ति हो जाए वहीं बिकने को तैयार रहते हैं। जब तक भारत की जनता विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के स्वामी मतदाता इन दल बदलुओं पर नकेल नहीं कसेंगे तब तक संभव ही नहीं कि दल बदलुओं की जनता से और अपनी पार्टी से वफादारी बनी रहे। 

-लक्ष्मीकांता चावला
-लेखिका पंजाब की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रही हैं।