विश्व शांति और गांधी के समक्ष नई चुनौतियाँ

यह देखा गया है कि दुनिया भर में, लोगों ने हिंसा के अधिक स्पष्ट प्रत्यक्ष और संरचित स्वरूपों और हिंसा के अधिक असंरचित विस्तार की चुनौतियों का सामना करने के लिए अभिनव और सफल अहिंसक तरीके अपनाए हैं जो हमारे जीवन में गहरे निहित हैं। लेकिन दूसरी ओर, अपना समूचा विश्व इतिहास गवाह है, जिसने बहुत कम पुरुषों को मानव जाति पर एक मजबूत प्रभाव डालते देखा है। इनमें से कुछ ने शांति का संदेश दिया, कुछ ने सम्मान और सहिष्णुता की वकालत की; कुछ ने सामाजिक कार्यों के माध्यम से, कुछ ने अधिकारों और मानवीय गरिमा के लिए और कुछ ने राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए कार्य किया। लेकिन बहुत कम लोगों ने इन सभी को एक साथ जोडक़र जीवन को एक इकाई के रूप में देखा है। उनमें प्रमुख थे महात्मा गांधी। एक कमजोर शारीरिक बनावट वाला लेकिन एक दृढ़ निश्चय रखने वाला व्यक्ति जो एक समय में स्वभाव और प्रकृति से बेहद शर्मीला था उसने महा शक्तिशाली औपनिवेशिक साम्राज्य की खिलायत की और अपने नैतिक बल से उन्हें मुकाबला करने के लिए चुनौती दी। इस साधारण आदमी, मोहनदास के आदेशों की, लाखों अशिक्षित जनता पालन करती थी और यह व्यक्ति अहिंसक संघर्ष में उन सबका नेतृत्व कर रहा था, उनकी यह यात्रा एक अनुकरणीय उदाहरण रही। एक आदमी से, जिसने खुद को एक दुर्भाग्यपूर्ण और असहाय स्थिति में पाया जब उसे नस्लीय कारणों से ट्रेन से बाहर फैंक दिया गया था। अंतत: एक शहीद के रूप में उसने अमरत्व प्राप्त कर लिया। उसका जीवन प्रयोगों से भरा था - ‘सत्य’ के उच्चतम मूल्य के साथ वे मूल्य जो अधिकांश धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रंथों में निहित है। उन्होंने निडरता से सच बोला, देखा कि कई आसन्न खतरे दुनिया में बढ़ रहे हैं जैसे कि हिंसा में वृद्धि, सांप्रदायिक असमानता, आर्थिक समस्याएं, सामाजिक विषमताएं, पारिस्थितिक गिरावट और सांस्कृतिक पतन। उसने इन सभी के उत्तर प्रदान किए, लेकिन यह बाद दीगर है कि कई वर्षों तक उन पर अमल नहीं किया गया।

आज, दुनिया उसे पुन: खोज रही है और अपनी समस्याओं का निवारण करने की कोशिश कर रही है और दोहरा रही है कि वह एक दूरदर्शी था। उनका जीवन ही उनका संदेश था। उनके सिद्धांत सरल हैं, फिर भी उनका अनुसरण करना कठिन है,और उनके आदर्श अनुकरण के योग्य हैं, फिर भी मानव जाति ने उनकी उपेक्षा की। क्या वजह है कि आज भी वे इस दुनिया के लिए प्रासंगिक है?क्या महात्मा गांधी द्वारा स्वराज को जनमानस के पटल पर अंकित करने के फलस्वरूप अहिंसा पहली बार एक बड़े पैमाने पर एक शक्तिशाली और प्रभावी सामाजिक ताकत में तब्दील हो गई थी? इसलिए इस लेख द्वारा लेखक शांति, सच्चाई और अहिंसा के संदेश को बेहतर समझने के लिए कुछ उत्तरों का पता लगाने की कोशिश करेगा। यह वे सिद्धांत हैं जिन्हें दुनिया पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है। मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) ने ठीक ही कहा था ‘महात्मा गांधी मानव इतिहास में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यीशु मसीह के प्रेम को नैतिकता से ऊपर उठाया, उसे व्यक्तियों के बीच संवाद तक सीमित न रख कर इसे बड़े पैमाने पर एक शक्तिशाली और प्रभावी सामाजिक शक्ति के रूप में बनाया। अगर मानवता की प्रगति करनी है, तो गांधी अपरिहार्य हैं। उन्हें अनदेखा करना मानव के लिए एक जोखिम उठाना सिद्ध होगा।’

उपर्युक्त प्रश्नों के संदर्भ में, महात्मा गांधी के बारे में, यह सर्वविदित है कि उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों, किसानों और सभी अछूतों की दुर्दशा पर ध्यान दिया। वे उन्हें गरिमा, स्वतंत्रता और बेहतर जीवन प्रदान करके उनके हालात को बदलना चाहते थे। उन्होंने समाज को विकसित करने के एक शुरुआती बिंदु के रूप में गांव के उत्थान की बात की जिसे अंतत:, 1992 के 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के माध्यम से पंचायती राज संस्थानों में लागू किया गया। गरीबी और उससे संबंधित मुद्दों को दूर करने का यह एक एकमात्र तरीका है। विभिन्न लेखन और दृष्टिकोणों के माध्यम से, गांधी ने इस विश्वास को दृढ़ किया कि उनके पास दुनिया को देने के लिए बहुत कुछ है जो अपने आप में अद्वितीय है। भारत में आजादी मिलने के बाद से ही ‘क्या आज गांधी प्रासंगिक हैं’ सवाल पूछे गए हैं और लगातार यह खोज चल रही है जो यह दर्शाता है, कि अधिक से अधिक संख्या में लोगों ने अब यह विश्वास करना शुरू कर दिया है कि गांधी के विचारों द्वारा दुनिया की गहन और विकट समस्याओं का समाधान ढूंढा जा सकता है।

गांधी का दृष्टिकोण हमेशा अभिन्न और एकीकृत है। यह पूर्ण रूप से समाहित भी है क्योंकि विकास के बारे में उनका दृष्टिकोण न केवल भौतिक संपदा, बल्कि संवादात्मक प्रक्रिया में प्रकृति के साथ सामंजस्य भी स्थापित करता है। उनका विकास प्रतिमान राष्ट्रों और क्षेत्रों की प्राचीर को भी पार कर जाता है। उसका सार्वभौमिक प्रतिरूप है। लेकिन कार्रवाई नीचे से लोगों की सक्रिय भागीदारी के साथ होती है न कि ऊपर से। वे लोगों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि एक समुदाय के रूप में देखते थे जो सामाजिक और आर्थिक विश्लेषण करने में सक्षम है। मानवता प्रणालियों में दृढ़ता से विश्वास करती है चाहे वह शासन या प्रशासन अथवा अर्थव्यवस्था के लिए हो, जिसका उद्देश्य समाज को अपनी बेहतरी के लिए विनियमित करना हो। उन्होंने निर्विवाद रूप से तर्क दिया कि प्रणालियां मानव की रचनाएं हैं और जब तक मनुष्य विकसित नहीं होते हैं और स्व-अनुशासित व्यक्तियों में नहीं बदल जाते हैं, तब तक प्रणालियों का कोई लाभ नहीं होगा और वे लोगों का शोषण ही करेगी ।

गांधी शरीर, मन, कौशल और क्षमता से बहुत आगे निकल गए थे और आत्मा के बल पर बहुत अधिक निर्भर थे।अपने तर्क को बनाए रखने के लिए उन्होंने पश्चिमी सभ्यता को नकार दिया जिसका ढांचा मूलत: भौतिकवादी, प्रतिस्पर्धी और उपभोक्तावादी था। इसके बजाय उन्होंने अपने देश के मूल मार्गों को अपनाया। ऐसा प्रतीत होता है कि गांधी ने इतिहास के पन्नों की भी बदलने की कोशिश की। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन्होंने मानव जीवन और विकास के एक वैकल्पिक प्रतिमान को विकसित करने का प्रयास किया। विकास की भारतीय परंपरा पर भरोसा करते हुए उन्होंने हिन्दू धर्म को सुधारने का प्रयास किया। निस्संदेह उनकी सुधारवादी प्रक्रिया चरित्र में क्रांतिकारी थी। दक्षिण अफ्रीकी यात्रा के दौरान उनके विरोधी, जनरल जॉन क्रिस्टियन स्मट्स ने अपनी नैतिक श्रेष्ठता के लिए गांधी को सबसे अधिक श्रद्धांजलि दी। उन्होंने अपने विचार इस रूप में व्यक्त किए ‘यह मेरा भाग्य था कि मैं एक ऐसे व्यक्ति का विरोधी हूं जिसके लिए तब भी मेरा सबसे ज्यादा सम्मान था। दक्षिण अफ्रीका के एक छोटे स्तर के संघर्ष ने गांधी के चरित्र के कुछ गुणों को लक्षित किया, जो तब से भारत में एक बड़े पैमाने पर हुए परिवर्तनों में प्रमुखता से प्रदर्शित हो रहे हैं और वे दिखाते हैं कि जब वह पूरे तौर पर उन मुद्दों को उठाने के लिए तैयार हो गए थे, जिसके लिए वे आजीवन लड़े थे, उस परिस्थिति में भी वे मानवीय पृष्ठभूमि को कभी नहीं भूले, न कभी उन्होंने अपना आपा खोया और न ही नफरत की । उन्होंने इन सभी प्रयत्नों में अपना मृदु हास्य बनाए रखा। उनके तरीके और भावना तब भी, और बाद में भी उस क्रूरता, और क्रूर बल के स्पष्ट रूप से खिलाफ थी जो इत्तेफाक से आज भी हमारे देश में विद्यमान है।’

महात्मा या महान आत्मा बनने से पहले, इंग्लैंड से दक्षिण अफ्रीका की यात्रा के दौरान, उन्होंने अपने मास्टर पीस को एक छोटी सी पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया, जो ‘हिंद स्वराज’ शीर्षक से समाज के कई संघर्षों को उजागर करती है। इसमें उन्होंने दो प्रमुख संदेश दिए: पहले संदेश में उन्होंने आधुनिक सभ्यता की निंदा की और स्वदेशी संस्कृति और मूल्यों के महत्व का एहसास दिलाया। दूसरे संदेश में उन्होंने हिंसा को दूर करने के लिए तथा ब्रिटिश प्राधिकरण का मुकाबला करने के लिए एवं दुश्मन को परास्त करने के लिए अहिंसा को अंतिम नैतिक हथियार के रूप में अपनाने का सुझाव दिया। सामाजिक दायरे में, गांधी ने भारत के लिए एक जातिविहीन समाज की कल्पना की। प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि, ‘गांधी राजनीतिक इतिहास में अद्वितीय हैं। उन्होंने उत्पीडि़त लोगों के मुक्ति संघर्ष के लिए एक पूरी तरह से नई और मानवीय तकनीक का आविष्कार किया है और यह उन्होंने बड़ी ऊर्जा और भक्ति के साथ किया। वह नैतिक प्रभाव जो उन्होंने सभ्य दुनिया के माध्यम से गंभीर विचारको पर छोड़ा है, वह आज के युग में कहीं अधिक टिकाऊ हो सकता है, चाहे कितना भी क्रूर बल आज के समय में विद्यमान हो। राजनेता का काम तभी परिलक्षित और स्थायी होगा जब वे अपने व्यक्तिगत उदाहरण और शिक्षित प्रभाव के माध्यम से अपने लोगों की नैतिक शक्तियों को जगायेंगे और समेकित करेंगे । हम सौभाग्यशाली हैं और हमें आभारी होना चाहिए कि भाग्य ने आने वाली पीढिय़ों को एक चमकदार मशाल के रूप में एक अनूठा उपहार दिया है।’

-डॉ. मनीष शर्मा

लेखक अध्यक्ष, गांधीवादी और शांति अध्ययन विभाग और मानद निदेशक, गांधी भवन, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ हैं।