चीन को लेकर सतर्क रहने की जरूरत

चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। वो लगातार ऐसे प्रयास कर रहा है जिससे एलएसी पर तनाव बरकरार रहे। भारतीय सैनिक भी चीन की सेना को उसी की भाषा में जवाब दे रहे हैं। लेकिन जिस तरह से चीन पिछले कुछ महीनों से व्यवहार कर रहा है, वो वाकया ही चिंता बढ़ाने वाला है। पाकिस्तान तो पिछले काफी सालों से हमारे देश में अस्थिरता फैलाने की कोशिशों में लगा हुआ है। अब चीन भी पाकिस्तान के तरह सिरदर्द बनता जा रहा है। हाल फिलहाल दोनों ओर से बातचीत का रास्ता खुला है। बातचीत के दौर जारी हैं। बहरहाल दोनों पक्षों के विदेश मंत्री कमोबेश इस निष्कर्ष पर तो पहुंचे कि साझा बयान देना चाहिए और समझौता ऐसा होना चाहिए, ताकि एलएसी पर दोनों सेनाएं पीछे हटना शुरू करें। मंत्री स्तर के संवाद का ही निष्कर्ष है-पांच सूत्रीय करार। लेकिन अभी यह सवालिया है। हालांकि ऐसे समझौते उम्मीद जगाते हैं कि हालात शांत होंगे और लगातार संवाद के आधार पर सहमतियां बनेंगी। क्या इस समझौते से कोई बर्फ  पिघलेगी और सर्दियां शुरू होने से पहले ही सेनाएं पीछे हटना शुरू करेंगी? इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीन विश्व की बड़ी शक्ति है, लेकिन हाल के वर्षों में भारत भी हर क्षेत्र में आगे आया है। इसलिए आज वह चीनी सेना से टकराने का साहस दिखाता है और आर्थिक मोर्चे पर उसके बहिष्कार की हिम्मत जुटा पाता है। इसीलिये चीन चाहे जितनी धमकी और धौंस देता रहे किन्तु उसकी समझ में ये बात आ चुकी है कि भारत के साथ टकराव से उसे भी बड़ा नुकसान होगा और इसीलिये वह सीमा पर शरारत करते रहने के बावजूद वार्ता के लिए लालायित है।

1962 में चीन ने दोस्ती की आड़ में धोखा देकर हमला किया और हमारी हजारों वर्गमील जमीन पर कब्जा ली। बाद में उसने पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर का अक्साई चिन इलाका भी बतौर उपहार ले लिया। उसके बाद भी भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के बावजूद सामान्य सम्बन्ध बने रहे। और फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था विकसित होने के बाद आर्थिक सम्बन्ध इस तेजी से विकसित होते गये कि सीमा विवाद मानो भुला सा दिया गया। हालांकि बीच-बीच में चीन अपने स्वभाव के मुताबिक शरारतें जारी रही।  भारतीय अर्थव्यवस्था पर चीन की छाया इतनी व्यापक हो गई कि पूरा बाजार मेड इन चायना से भर गया। इसका दुष्प्रभाव घरेलू उद्योगों पर पडऩे के बावजूद भारत ने चीन से आयात पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई। यहां तक कि नरेंद्र मोदी तक चीन के साथ इकतरफा व्यापार को रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से उनकी दोस्ती बड़ी राजनायिक कामयाबी मानी गई। लेकिन चीन कश्मीर और आतंकवाद के मसले पर सदैव पाकिस्तान की तरफदारी करता रहा। और फिर आ गया कोरोना जिसके बाद पूरी दुनिया उसे खलनायक मान बैठी। भारत में भी ये मानने वाले कम नहीं हैं कि दुनिया को इस महामारी के चंगुल में फंसाने वाला चीन ही है फिर भी उसके साथ व्यापारिक रिश्ते बरकरार रखते हुए कोरोना संबंधी अनेक उपकरण और बचाव के साधन वहां से मंगाए गये। लेकिन वैश्विक महामारी के इस दौर का लाभ लेकर उसने लद्दाख क्षेत्र में घुसपैठ कर दशकों से शांत पड़ी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य हलचल बढ़ा दी। परन्तु इस बार उसे भारत से जो जवाब मिला उसके कारण वह न सिर्फ  चौंका बल्कि शर्मिन्दगी का शिकार भी हुआ।  दो देशों के बीच मित्रता और शत्रुता दोनों के समय यदि कोई बात कायम रहती है तो वह कूटनीति ही है।

अनेक उदाहरण हैं जब सेनाओं के बीच घमासान चलता रहता है वहीं सरकार के स्तर पर राजनयिक वार्ताओं के जरिये शान्ति की कोशिश भी जारी रहती हैं। वास्तव में धोखा चीन के खून में शामिल है। बीते दिनों मास्को में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के हाशिए पर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच करीब 2.30 घंटे तक बातचीत हुई। ऐसे संवाद सुखद और सकारात्मक होते हैं, क्योंकि युद्ध के बाद भी बातचीत की मेज पर आना पड़ता है। मौजूदा तनाव तब है, जब भारत के प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बीते 6 साल के दौरान 18 बार मुलाकातें कर चुके हैं। जाहिर है कि सीमा विवाद और सेना के आक्रामक अतिक्रमण पर बातचीत जरूर हुई होगी! भारत और चीन के बीच पहली बार समझौता नहीं हुआ है या किसी प्रस्ताव पर शीर्ष स्तरीय सहमति नहीं हुई है। बीते तीन दशकों के दौरान कमोबेश आधा दर्जन समझौते प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के स्तर पर किए गए हैं। भारत के प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंह राव, देवगौड़ा, अटलबिहारी वाजपेयी और डा. मनमोहन सिंह ने चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के साथ समझौते किए, ताकि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता कायम रखी जा सके। किसी भी स्थिति में युद्ध की नौबत न आ सके। उन समझौतों के बावजूद पूर्वी लद्दाख वाली एलएसी पर युद्ध सरीखा माहौल और तनाव है।  अब यह देखना अहम होगा कि यह पांच-सूत्रीय समझौता जमीन पर कब और कैसे लागू होगा। अभी तो दोनों ओर की सेनाएं मुस्तैदी से मोर्चे पर डटी हैं। पैंगोंग और गोगरा तथा फिंगर इलाकों से चीनी सेना हटने से इंकार कर रही है। चीन के लड़ाकू विमान लगातार युद्धाभ्यास कर रहे हैं। कैलाश मानसरोवर के पुराने रास्ते पर हमारा कब्जा हो गया है, जबकि 1962 के युद्ध के बाद से चीन का लगातार कब्जा रहा है, लिहाजा चीन क्षुब्ध है।

सेटेलाइट तस्वीरों से साफ  हो रहा है कि ब्लैक टॉप, हेलमेट टॉप, गुरंग हिल, मगर हिल आदि चोटियों पर भारतीय सेना का ही कब्जा नहीं रहा है, बल्कि एक हिस्से पर चीन भी काबिज हो गया है। दोनों पक्षों में कमांडर स्तर की बातचीत भी होनी है, ताकि पांच-सूत्रीय करार को लागू करने की शुरुआत की जा सके।  पिछले दिनों चीनी सैनिकों ने पूर्वी लद्दाख में नये सिरे से घुसपैठ की, जिसका मुंहतोड़ जवाब भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों को खदेड़ कर दिया था। भारतीय सैनिकों ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दक्षिणी पैंगोंग झील के निकट के ठिकानों पर कब्जा करके चीन के मंसूबे ध्वस्त कर दिये थे। बहरहाल, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन का बड़ा सैन्य जमावड़ा आक्रामक मुद्राएं सशस्त्र संघर्ष की स्थितियां पैदा कर सकती हैं। भारतीय सैनिकों का मनोबल ऊंचा है। लेकिन ऐसे वक्त में जब देश बड़े कोरोना संकट से जूझ रहा है, सैन्य संघर्ष देशहित में नहीं होगा। समझौतों और सहमतियों से पीछे हटना चीन का स्वभाव है।  असल में चीन इस मुगालते में है कि भारत के पास कोई विकल्प नहीं है, बल्कि उसे जमीन पर नए तथ्यों को स्वीकार करना पड़ेगा। भारत इसके लिए तैयार नहीं है। भारत यथास्थिति की लगातार मांग करता रहा है। पड़ोसी होने के नाते चीन समझे कि द्विपक्षीय वार्ता से ही सीमा के मुद्दे सुलझाये जा सकते हैं। वहीं भारत में चीनी निवेशकों के लिये पैदा हुई प्रतिकूल परिस्थितियां चीन के आर्थिक हितों के लिये एक बड़ी चुनौती है, जिसे चीन बखूबी महसूस कर रहा है। बहरहाल हमें कुछ दिन सब्र से इंतजार करना चाहिए कि चीनी सेना अपने विदेश मंत्री के वचनों को कितना आदर करती है। वैसे अब तक चीन को जो व्यवहार हमारे प्रति रहा है, उसके हर कदम और समझौते पर फूंक-फूंककर कदम रखना ही समझदारी होगा, भले ही चीन अपने व्यापारिक हितों को बचाने के लिये वार्ता या सहमति के किसी स्तर पर उतर आए, लेकिन उससे पर पूरा विश्वास करना स्वयं को धोखा देना ही माना जाएगा।         -राजेश माहेश्वरी