राजनीति में नाखून-मांस का नहीं, नाखून-नेलपॉलिश का रिश्ता

जब भी किसी राज्य की विधानसभा के या देश में लोकसभा के चुनावों का समय आता है तो सबसे पहले जो सुनाई देता है वह पुरानी रिश्तेदारियां टूटनी और नई रिश्तेदारियां बनने का खेल। सही बात तो यह है कि राजनीति रिश्तेदारियां स्वार्थ और भाई-भतीजावाद पर आधारित हैं। किस दल के जहाज में सवार होकर चुनावी दलदल पार करके सत्तापति बन सकते हैं यही सबसे बड़ा लक्ष्य रहता है। मुझे बहुत अच्छी तरह याद है लालू प्रसाद यादव की बात, जो उन्होंने रामविलास पासवान के लिए कही थी। लालू जी ने कहा था कि रामविलास पासवान बहुत बड़ा चुनावी मौसम का वैज्ञानिक है। जिस दल की तरफ वह चला जाए समझ लिया जाना चाहिए कि उनकी सरकार बनने वाली है। व्यवहार में भी लालू प्रसाद की बात पूरी तरह सत्य सिद्ध हुई। अब आज की चर्चा का विषय है ये राजनीतिक रिश्तेदारियां।

जब दो दल समझौता करते हैं, चुनाव लडऩे से पहले सीटें बांटते हैं, जनता के सामने गले में बांहे डालकर यह कहते हैं कि उनका केवल चुनावी गठबंधन नहीं, यह तो नाखून और मांस का रिश्ता है तो समझ आ जाता है कि यह एक बहुत बड़ा झूठ बोल रहे हैं, जो शायद कुछ समय ही चलेगा। उसके बाद नाखून और मांस अलग हो जाएंगे। सही बात तो यह है कि नाखून से मांस अलग नहीं होता। बहुत पीड़ा देता है, पर राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे की पीड़ा और हित का ध्यान किए बिना अपने स्वार्थ का सुख लेती हैं। पंजाब में जिस तरह 23 वर्षों से नाखून मांस का रिश्ता उठाए अकाली दल और भाजपा चल रहे थे उन्हें रिश्ता तोडऩे में उतना समय भी नहीं लगा जितना नाखून पर लगी नेल पॉलिश को रिमूवर से उतारने में लगता है। मैं तो अब इस निष्कर्ष पर पहुंची हंू कि राजनीतिक रिश्ते नाखून और मांस के नहीं, नाखून और नेल पॉलिश के हैं। जब जी चाहा उतारा, नया रंग लगाया और नए रंगों का गुणगान करने लगे। जो पंजाब में हुआ, वह कुछ समय पहले महाराष्ट्र में हो चुका। कोई सोच भी नहीं सकता था कि सत्ता के मोह में मुख्यमंत्री पद प्राप्त करने के लिए शिव सेना भाजपा से इतनी आसानी से अलग हो जाएगी। अब शिव सेना के श्री उद्धव ठाकरे वैसी भाषा नहीं बोल रहे जैसी भाषा वे भाजपा के घटक के रूप में बोलते थे। अब उन्हें हिंदुत्व की खास चिंता नहीं। यह ठीक है कि अयोध्या में श्रीराममंदिर के लिए एक करोड़ रुपया देकर अपनी रामभक्ति का परिचय दिया है। वैसे मैं जानती हूं कि मन से वे रामभक्त हैं। हिंदुत्व के भी उपासक हैं, पर जब मुख्यमंत्री पद सामने आ जाए तो बहुत सी बातें पीछे रखकर सत्ता का रिश्ता मजबूत करना पड़ता है, किसी से भी हो जाए।

 वैसे तो राजनीति का मूलमंत्र ही सत्ता पाना और अपनों के लिए सत्ता सुरक्षित करना है। पंजाब में अकाली दल ने भी अपने बेटे, बहू, भतीजे, दामाद आदि के लिए सत्ता सुरक्षित की। सारा पंजाब और अकाली दल दंग रह गया जब श्री बादल ने वरिष्ठ अकाली नेताओं और सांसदों को  छोड़कर अपनी बहू को ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री  बनवाया। महाराष्ट्र में शिव सेना वाले भी परिवार मोह में बुरी तरह फंसे हैं। श्री बाल ठाकरे जी के बाद उद्धव ठाकरे का अध्यक्ष बनना थोड़ा बहुत समझ आता था और अब आदित्य ठाकरे भी सत्तासीन हैं। अगर पहला रंग रहता, जिसे नाखून मांस का रिश्ता कहते थे, तो यह शायद संभव न होता। एक पीढ़ी से तीसरी पीढ़ी तक सत्ता पहुंचा देने की बात। बिहार में भी इन दिनों रंग बदले जा रहे हैं। पासवान जी तो प्रसिद्ध ही रहे हर सरकार में सफलता से स्थान बनाने के लिए। पिछले दो दशकों से ज्यादा समय हो गया। हर सरकार की एक चाबी पासवान के हाथ में रही। समय रहते ही उन्होंने अपना कुलदीपक चिराग तैयार कर दिया और आज की हालत यह है कि चिराग अपने ढंग से चलने जलने को तैयार है।

यह बीमारी किसी एक पार्टी या एक राज्य में नहीं। मध्यप्रदेश में भी पिछले लोकसभा चुनावों के बाद दल बदलने, आस्था बदलने और सत्ता को गिराने उठाने का खेल पूरी तरह खेला गया। कांग्रेस के दो पीढिय़ों से वफादार ज्योर्तिआदित्य सिंधिया ने भी अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने के लिए कांग्रेस को ऐसा झटका दिया कि कमलनाथ का मुख्यमंत्री का सिंहासन औंधे मुंह गिरा। जिस समय ज्योर्तिआदित्य अपनी नई पार्टी के मुख्यालय में नई पार्टी का गुणगान कर रहे थे तो मैं सही अनुमान कर रही थी कि इसके पूर्वजों ने जब अंग्रेजों का साथ दिया होगा तब कुछ ऐसे ही शब्द अंग्रेजी में बोलकर अपनी वफादारी प्रकट की होगी। यही सत्ता का खेल राजस्थान में भी बता गया कि कोई रिश्ता पक्का नहीं। किसी तरह कांग्रेस ने अपनी सरकार संभाल ली, वह डगमगा ही रही थी। बहुत से सरकारी अधिकारी सरकार के शीर्ष पदों पर रहते रिटायरमेंट से पहले सत्ता पक्ष के खेमे में पूरी तरह पहुंच जाते हैं। उनके रंग में रंगे जाते हैं। परिणाम यह रहता है कि उनसे जनता को न्याय नहीं मिलता, अपितु जो रूलिंग पार्टी चाहती है वही मिलता है।

ऐसे कुछ अधिकारी तो महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों के स्वामी बना दिए जाते हैं और कुछ चुनावी वैतरणी पार करने के लिए तैयार किए जाते हैं। पंजाब में भी श्री गिल ने डीजीपी रहते और दरबारा सिंह गुरु ने मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव रहते यही वफादारी दिखाई होगी, तभी तो उन्हें रिटायर होते ही उनके शासकों ने एकदम चुनाव में उतारा। यह अलग बात है कि जनता उन्हें स्वीकार नहीं कर पाई। बिहार में भी चर्चा है कि डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे कुछ समय पूर्व ही सेवानिवृत्त होकर संभवत: जेडीयू से चुनाव लडऩा चाहते हैं, पर न जाने क्यों पहली सूची में उनका नाम नहीं आया। ये कुछ घटनाएं बताने के लिए काफी हैं कि यहां अगर कोई रिश्ता पक्का है तो केवल खून का रिश्ता है और कोई नहीं। कश्मीर में, पंजाब में, हिमाचल में, राजस्थान में, मध्यप्रदेश में खून के रिश्ते पक्के चल रहे हैं। संभवत: उत्तर-पूर्व दक्षिण भारत में भी ऐसा होगा, जिनकी ज्यादा चर्चा पश्चिम भारत में नहीं होती। जनता को याद रखना होगा कि मंचों पर नेताओं द्वारा ली गई कसमें, किए गए वायदे वैसे ही हैं जैसे पांच दशक पहले एक प्रसिद्ध गीत गूंजता था- कसमें वायदे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या, पर बेचारी जनता बातों में ही उलझ जाती है।

Amritsar, ex health minister prof. chawla wrote a letter to pm modi

लक्ष्मीकांता चावला
-लेखिका पंजाब की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रही हैं।