संसद का मॉनसून सत्र

18 जुलाई से शुरू होकर 10 अगस्त तक चलने वाले संसद सत्र में पहली बार राज्यसभा के सदस्य संविधान में अधिसूचित 22 भाषाओं में बोलने में सक्षम होंगे। अगर भाजपा और विपक्षी दलों के बीच कामकाज को लेकर सहमति बनी तभी बोलने का मौका सांसदों को मिलेगा नहीं तो शोर-शराबे व बिना महत्वपूर्ण कार्य के ही चलेगा सत्र। चुनावी वर्ष में कांग्रेस जहां सरकार पर एकजुट हमला बोलने के लिए विपक्ष को लामबंद कर रही है, वहीं भाजपा भी विपक्षी हमले का उसी अंदाज में जवाब देने की रणनीति पर काम कर रही है। 

पार्टी की योजना मासूमों के साथ रेप पर फांसी, ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा और तीन तलाक को दंडात्मक बनाने संबंधी बिल को किसी भी तरह कानूनी जामा पहनाने की है। दरअसल, चुनावी वर्ष में प्रवेश के साथ ही सरकार और विपक्ष एक-दूसरे को घेरने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। सत्र शुरू होने से पहले जहां कांग्रेस ने महिला आरक्षण बिल पेश करने की मांग की है, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह विपक्ष पर सीधा हमला बोल रहे हैं। कांग्रेस की रणनीति विपक्ष को एकजुट कर हमला बोलने की है। उधर, तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) क्षेत्रीय दलों के समर्थन से लोकसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने जा रही है, वहीं अन्नाद्रमुक के हंगामे के बीच इस पर बहस की अनुमति एक बार फिर खारिज होने की संभावना है। विपक्ष जहां रोजमर्रा की चीजों में महंगाई, किसान को उचित दाम, कश्मीर समस्या और पेट्रोलियम पदार्थों के ऊंचे दामों का मुद्दा उठाएगी तो भाजपा भी इनकी जवाब 'हिंदू पाकिस्तानÓ और कांग्रेस की मुस्लिम परस्ती के मुद्दों के जोरशोर से उठाकर देगी। सूत्रों का कहना है कि ओबीसी, तीन तलाक और मासूमों से रेप पर फांसी संबंधी बिल संसद में अटका तो पार्टी को इन्हें मुद्दा बनाने का मौका मिलेगा। लोकसभा में पारित कराने के बाद सरकार तीन तलाक विधेयक को अब राज्यसभा में पारित कराने की कोशिश करेगी। लेकिन लोकसभा में पारित हो चुके महिला आरक्षण विधेयक को सरकार राज्यसभा में पारित करने की इच्छुक नहीं दिख रही है। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा है कि इस विधेयक की खिलाफत कर रही पार्टियों के साथ कांग्रेस गठबंधन बना रही है। पहले वे उन दलों से महिला आरक्षण बिल के समर्थन का पत्र लाए, फिर हम देखेंगे।

संसदीय कार्य मंत्री अनन्त कुमार द्वारा दिए संकेतों से तो यही समझा जा सकता है कि इस सत्र में मोदी सरकार का एजेंडा आर्थिक और राजनीतिक विषयों का मिश्रण ही होगा। कुछ प्रमुख अध्यादेशों को दोनों सदनों की मंजूरी चाहिए और इन अध्यादेशों की जगह आने वाले विधेयकों पर चर्चा कर उन्हें पारित करना होगा। इन अध्यादेशों में ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (संशोधन) अध्यादेश, भगोड़े आर्थिक अपराधी अध्यादेश और उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों का वाणिज्यिक पीठ बनाने संबंधी अध्यादेश शामिल हैं। आपराधिक विधि (संशोधन) अध्यादेश जो 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को मृत्युदंड समेत कठोर दंड का प्रावधान करता है, उसे भी मंजूरी देनी होगी। इसे लेकर एक विधेयक लाना होगा। भगोड़े आर्थिक अपराधी विधेयक लोकसभा के पास लंबित है। इसे 12 मार्च को सदन में पेश किया गया था। उच्च सदन में भाजपानीत राजग अभी भी सामान्य बहुमत नहीं पा सका है। इस मौके का फायदा वह पिछड़ा वर्ग के एक आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए समर्थन जुटाने में ले सकता है। विपक्ष तीन तलाक के विवादास्पद विधेयक पर भी समर्थन देने से इनकार करता रहा है। लोकसभा में ये दोनों विधेयक पास हो चुके हैं। 

मार्च में बजट सत्र के दूसरे हिस्से में विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ प्रतीकात्मक अविश्वास मत लाकर जो पटकथा लिखी थी वह मॉनसून सत्र में भी दोहराई जाती नजर आएगी। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने उस अविश्वास मत को मंजूरी नहीं दी थी।  संसद के बाहर किसान समूह और मजदूर संगठन सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन का मन बनाए हुए हैं। नौ अगस्त को सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ है। उस दिन कई मजदूर संगठन और किसान संगठन दिल्ली में प्रदर्शन करके कृषि संकट और सरकार की श्रम विरोधी नीतियों का विरोध करेंगे। राज्य सभा के उपसभापति का चुनाव भी होना है। मोदी सरकार को इस सत्र में अपने संकट मोचक और उच्च सदन में उसके नेता अरुण जेटली का साथ भी नहीं मिल पाएगा। जेटली की अनुपस्थिति में राज्यसभा में यह जिम्मेदारी अमित शाह पर आएगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि शाह उपसभापति पद के लिए राजग उम्मीदवार के नाम पर क्षेत्रीय दलों का समर्थन कैसे जुटाते हैं। फिलहाल आंकड़े न तो सरकार के पक्ष में हैं और न ही विपक्ष के पास। विपक्ष की ओर से तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुखेंदु शेखर रॉय उम्मीदवार हो सकते हैं जबकि अटकल है कि राजग शिरोमणि अकाली दल के नरेश गुजराल को उम्मीदवार बना सकता है। बीजू जनता दल के पास नौ राज्यसभा सदस्य हैं और उसका समर्थन निर्णायक हो सकता है।

आशा यही है कि विपक्षी दल अर्थव्यवस्था, दलितों और अल्पसंख्यकों को भीड़ द्वारा मारे जाने, सोशल मीडिया पर होने वाली ट्रोलिंग आदि पर चर्चा चाहेंगी। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव भी करीब हैं। ऐसे में लगता नहीं कि सरकार या विपक्ष एक-दूसरे को जरा भी मौका देंगे। विपक्ष का सरकार को घेरने का लक्ष्य रहेगा और सरकार का लक्ष्य इस संभावित घेराबंदी को तोड़ अपने विधेयकों को पारित कराना होगा। सफल कौन होता है, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। 

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।