सोनिया गांधी के लिए असमंजस के क्षण

10:51 AM Feb 16, 2020 |

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के सामने हालांकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में न तो कुछ खोने के लिए था और न कुछ पाने के लिए था, फिर भी वहां कलह मची हुई है। पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी की भूमिका कांग्रेस को संजीवनी देने वाली रही है। उन्होंने २००४ में कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति में शामिल कर यूपीए बनायी थी और यूपीए ने १० वर्ष तक सरकार चलायी। राज्यों में भी उसने सफलता प्राप्त की थी। भाजपा का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी के हाथ में आने के बाद कांग्रेस से लगाताार सत्ता छिनती चली गयी लेकिन अब भी कांग्रेस ही देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव से चिंतित होने की जरूरत तो भाजपा को है जिसने अपनी पूरा ताकत लगा दी, फिर भी सिर्फ ८ विधायक मिल पाये हैं। भाजपा ने ब्रांड मोदी जरूर सुरक्षित रखा लेकिन अमित शाह को दांव पर लगा ही दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी दो जनसभाएं की थीं और दिल्ली के लिए भाजपा ने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न करके मोदी के नाम पर ही वोट मांगे, फिर भी कहा जा सकता है कि अमित शाह और मनोज तिवारी को आगे करके भाजपा ने मोदी ब्रांड को बचा लिया। कांग्रेस के पास तो ऐसा कोई ब्रांड भी नहीं था। इसके बावजूद वहां घमासान मच गया। श्रीमती सोनिया गांधी के लिए इस विवाद को सुलझाने में दिक्कत तो आएगी क्योंकि सवाल २०१९ के लोकसभा चुनाव  से शुरू हुआ है। पीसी चाको और शीला दीक्षित के बीच विवाद उसी समय शुरू हुआ था। इसका संबंध तो दिल्ली के विधानसभा चुनाव से है। 

दिल्ली के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को एक भी विधायक नहीं मिला और उसके ६२ प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गयी है। दिल्ली पर लगातार १५ वर्षों तक शासन करने वाली कांग्रेस के लिए यह निश्चित रूप से शर्म की बात है। दिल्ली में कांग्रेस को यह शानदार सफलता दिलाने वाली थी श्रीमती शीला दीक्षित जो आज इस दुनिया में नहीं है। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली शर्मनाक असफलता को शीला दीक्षित के ही एक फैसले से जोड़ा जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री स्व- शीला दीक्षित से ही अरविन्द केजरीवाल ने २०१३ में सत्ता छीनी थी लेकिन कांग्रेस के समर्थन से ही उनको सरकार भी बनानी पड़ी थी। कांग्रेस को उस समय भी सिर्फ ८ विधायक मिले थे लेकिन मुख्यमंत्री रहते हुए शीला दीक्षित पर अरविन्द केजरीवाल ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था, जिसे श्रीमती शीला दीक्षित कभी भूल नहीं पायीं। माना जाता है कि इसी के चलते २०१९ में जब लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस से मिलकर चुनाव लडऩे की इच्छा जाहिर की तो श्रीमती शीला दीक्षित इसके विरोध में खड़ी हो गयी। कांग्रेस का एक वर्ग चहता था कि आम आदमी पार्टी से समझौता करके लोकसभा चुनाव और हरियाणा का विधानसभा चुनाव लड़ा जाए। हरियाणा में तब भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। इसलिए पीसी चाको और कुछ अन्य नेताओं ने शीला दीक्षित का विरोध किया। आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविन्द केजरीवाल ने कई प्रयास किये लेकिन कांग्रेस ने समझौता नहीं किया। उस समय राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे और उन्होंने श्रीमती शीला दीक्षित का ही समर्थन किया।

स्व- शीला दीक्षित के पक्षधर रहे मिलिंद देवड़ा, पवन खेड़ा और सुभाष चोपड़ा आज भी उस फैसले को सही ठहराते हैं। इनका कहना है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ही दिल्ली में दूसरे नम्बर की पार्टी रही थी। मुस्लिमबहुल कई विधानसभाएं ऐसी थीं जहां कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा वोट मिले थे। आम आदमी पार्टी तीसरे स्थान पर चली गयी थी। इसलिए श्रीमती शीला दीक्षित ने उस समय जो फैसला लिया था,  वो सही था। पवनखेड़ा कहते हैं कि २०१३ में जब हम दिल्ली में पराजित हुए थे तब कांग्रेस को २४-३५ फीसद मत मिले थे। शीला दीक्षित २०१५ के विधानसभा चुनाव में शामिल नहीं थीं लेकिन २०१९ में फिर से प्रदेश कांग्रेस की कमान शीला दीक्षित को ही सौंपी गयी थी और कांग्रेस का वोट प्रतिशत २०१५ से बढक़र २२-४६ फीसद हो गया था जो इस बार पांच फीसद से भी नीचे चला गया है। मिलिंद देवड़ा भी कहते हैं कि शीला जी बेहतरीन राजनीतिक थीं। उनके कार्यकाल के दौरान दिल्ली की तस्वीर बदली। सुभाष चोपड़ा भी कह रहे हैं कि शीला जी ने ही दिल्ली में कांग्रेस को खड़ा किया था और अब उनके निधन के बाद उनको दोष देना ठीक नहीं है।

बात तो बिल्कुल सही है लेकिन कांग्रेस के दिल्ली प्रभारी पीसी चाको यह मामला उठाते हैं कि यदि २०१९ में अरविन्द केजरीवाल का प्रस्ताव मान लिया जाता तो शायद दिल्ली में कांग्रेस को सांसद भी मिलते और आज दिल्ली में कांग्रेस की साझा सरकार होती। पीसी चाको का यह सपना हो सकता है लेकिन हकीकत से बहुत ज्यादा दूर भी नहीं है। आम आदमी पार्टी ने अब प्रचण्ड बहुमत से सरकार बनायी है और कांग्रेस को एक भी विधायक नहीं मिला। भाजपा को ८ विधायक जरूर मिले लेकिन दो विधायक तो तीन हजार मतों से कम के अंतर से जीते हैं। भाजपा को २०१५ में तीन विधायक ही मिले थे। इसलिए उसके कुछ नेता यह कहकर पीठ थपथपा रहे कि पांच विधायकों का इजाफा हुआ है और वोट प्रतिशत भी बढ़ा। यह अलग बात कि लोकसभा के चुनाव में भाजपा को जो मत प्रतिशत था, उसको याद करके अब शर्म आ जाती है। पीसी चाको ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया लेकिन यह टिप्पणी भी कर दी कि कांग्रेस का पतन यहां २०१३ में शीला दीक्षित के रहते शुरू हो गया था। इस पर विवाद शुरू हुआ तो चाको ने सफाई दी कि उनका यह आशय नहीं था बल्कि वे कहना चाहते हैं कि कैसे धीरे-धीरे कांग्रेस का प्रदर्शन खराब होता चला गया। कांग्रेस के इसी प्रदर्शन को एक नयी दिशा देने का कुछ लोग प्रयास कर रहे हंै। हालांकि कांग्रेस के ही कुछ नेता उसका विरोध करने लगे हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार ने यह कहा कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने विशेष प्रयास यही किया कि उसकी मुख्य प्रतिद्वन्द्वी भाजपा पराजित हो जाए। उन्होंने महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा था कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना से वैचारिक मतभेद होते हुए भी कांग्रेस ने इसीलिए सरकार बनायी ताकि भविष्य में केन्द्र में सरकार बनाने के लिए वे क्षेत्रीय दल भाजपा के साथ खड़े न हो सकें, तब कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनने की संभावना होगी।

हालांकि ये भी एक दिवास्वप्न जैसा है क्योंकि क्षेत्रीय दलों के नेता भी अब पीएम बनने का सपना देखने लगे हैं। अरविन्द केजरीवाल तो इसमें सबसे आगे हैं और दिल्ली में दो बार भाजपा को जिस तरह से उन्होंने बुरी तरह धराशायी किया है, उससे उनका दावा और पुख्ता हो जाता है। इसलिए कांग्रेस के नेताओं को भी इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि केन्द्र में सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस को ही समर्थन देंगे। पूर्व वित्तमंत्री पी- चिदम्बरम  ने फिलहाल यही सपना देखा है कि शिवसेना और आप जैसी पार्टियां कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार कर लेंगी। दिल्ली महिला कांग्रेस अध्यक्ष शर्मिष्ठा मुखजी दिल्ली विधानसभा चुनाव की मतगणना के नतीजे मिलने के बाद ही कड़ी प्रतिक्रिया जताने लगी थी। उन्होंने कांग्रेस के लिए गहरे आत्ममंथन की जरूरत बतायी है। शर्मिष्ठा ने पार्टी के उन नेताओं पर निशाना साधा जो दिल्ली के जनादेश को कांग्रेस की विशेष रणनीति के तौर पर पेश कर रहे हैं। शर्मिष्ठा मुखर्जी कहती हैं कि क्या कांग्रेस ने भाजपा को पराजित करने के लिए प्रादेशिक स्तर के दलों को आउट सोर्स कर रखा है? अगर ऐसा है तो हमें अपनी पराजय की चिंता करने की बजाय आम आदमी पार्टी की विजय पर जश्न मनाने का हक है लेकिन क्या इस पर अरविन्द केजरीवाल  भी नोटिस ले रहे हैं? क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस के रिश्तों को नया आयाम देना श्रीमती सोनिया गांधी के लिए असमंजस भरा कदम होगा क्योंकि महाराष्ट्र में ही रिश्ते संभल नहीं रहे हैं।     - अशोक त्रिपाठी