कृषि सुधार कानून भारत का मोदी पल

1861 में नवनिर्वाचित राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अमेरिका में, सदियों से चली आ रही गुलाम प्रथा को तेजी से समाप्त करने की ओर कदम बढ़ाए। यह आसान निर्णय नहीं था, पर अमेरिका में लोग प्रथम रिपब्लिक राष्ट्रपति से ऐसे ही गैर पारंपरिक फैसलों की अपेक्षा कर रहे थे। हालांकि कुलीन और उच्च वर्ग इस मुद्दे पर पूरी तरह से विभाजित था। जहां एक वर्ग, सिमोन बोलीवर के नेतृत्व में स्पेनिश क्षेत्रों को मुक्त करवाने के लिए हुई सम्पूर्ण क्रांति से प्रभावित होकर इसका समर्थन कर रहा था वहीं दक्षिण पूर्व के राज्यों ने विरोध स्वरूप शस्त्र उठाकर अपना एक अलग गुट बना लिया, जिसके फलस्वरूप अमेरिका में गृह युद्ध शुरू हो गया। दिलचस्प बात यह थी कि बगावत करने वालों में वह गुलाम भी शामिल थे जिन्हें लिंकन दासता से छुड़ाना चाहते थे। संकट को देखते हुए रिपब्लिक पार्टी के कई लोगों ने लिंकन पर इन सुधारों को ठंडे बस्ते में डालने का और कुछ ने तो इन सुधारों को रद करने का दबाव बनाया। लिंकन अडिग थे कि गुलामों की मुक्ति का समय आ चुका है और वह अपने निर्णय से पीछे नहीं हटेंगे चाहे उन्हें किसी भी तरह की राजनीतिक कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। आज 160 साल के बाद अमेरिका पूरे विश्व में स्वतंत्रता, उदारवाद तथा मानव अधिकारों का पथ प्रदर्शक है और अमेरिकी इतिहास के छात्र इसे लिंकन पल के रूप में जानते हैं। पूरे विश्व में बड़े नेताओं ने बड़े-बड़े निर्णय लिए, जिन्होंने उन देशों का भविष्य बदल दिया। ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गेट थैचर ने 1980 में अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के विरोध को दरकिनार करते हुए देश की अर्थव्यवस्था में आर्थकि सुधारों को जारी रखा। यह उनका वही क्षण था, जिसने व्यापार को बंधनों से मुक्त कर उसे एक वैश्विक वाणिज्यिक बाजार के रूप में स्थापित किया।

मौजूदा परिवेश में अगर हम पंजाब तथा देश के कुछ अन्य किसान संगठनों के प्रदर्शन का विश्लेषण करें तो चाहे कहानी का रंगमंच और पात्र बदल गए हैं, पर कहानी का सार वही है। किसानों को सदियों से चले आ रहे बंधनों से मुक्ति दिलाने के लिए तीन कृषि कानून बनाए गए जिसके अन्तर्गत किसान अपनी फसल देश के किसी भी हिस्से में किसी भी व्यक्ति को मनचाहे दाम पर बेच सकते हैं। हालांकि किसानों के एक वर्ग, विशेषकर पंजाब के किसानों में इस बात का डर बैठ गया कि इन कानूनों से उनको मिल रहा न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछ वर्षों बाद छिन जाएगा, सरकारी मंडियां खत्म हो जाएंगी तथा केंद्रीय एजेंसियों द्वारा अनाज, दालों और तिलहन की खरीददारी प्रभावित होगी। इन्हीं आशंकाओं ने आक्रोश पैदा किया। फलस्वरूप किसानों द्वारा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की घेराबंदी की गई है। दूसरी तरफ देश के कई अन्य किसान संगठन तथा कृषि विशेषज्ञ खुलकर इन कानूनों की तरफदारी कर रहे हैं। हमें इस बात को समझना होगा कि कानूनों में कुछ कमियां हो सकती हैं, उनमें सुधार की भी गुंजाइश है लेकिन भारत एक ऐतिहासिक मोड़ पर है। जिस प्रकार लिंकन, थैचर, मिखाईल गोर्बाच्योफ ने अपने-अपने देशों में सुधारों को लागू किया, उसी प्रकार कृषि क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किए गए सुधार ऐतिहासिक हैं।

यह ऐतिहासिक इसलिए हैं क्योंकि यह कृषि क्षेत्र की पिछले एक हजार साल की जड़ता को समाप्त करने वाले हैं। वास्तव में 11वीं सदी में अफगान आक्रमणकारी अलाउद्दीन खिलजी ने मूल्य निर्धारित मंडी व्यवस्था स्थापित की, ताकि उसके सैनिक और उच्च वर्ग के लोग स्थानीय किसानों से खान-पान की वस्तुएं सस्ते दामों पर खरीद सकें। पिछले 1000 सालों में परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। खिलजी के बाद आने वाले मुगल शासक, ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिस साम्राज्य ने इन कानूनों और किसानों पर कर व्यवस्था को और सख्त किया। अंग्रेजों ने तो एक कदम और बढ़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य की परिकल्पना स्थापित की ताकि भारतीय किसान ब्रिटेन के उद्योगों के लिए वस्तुओं का उत्पादन कर सकें। दुर्भाग्य से आजादी के पिछले 73 वर्षों में कृषि की टुकड़ों में आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई, पूर्ण रूप से नहीं। परिणाम यह है कि इस समय भारत की लगभग आधी आबादी कृषि पर निर्भर है, पर उसका योगदान देश की जीडीपी में सिर्फ 17 फीसद है। इस आंकड़े को बदलने की आवश्यकता है। ना सिर्फ किसानों की आय के स्तर को बढ़़ाने के लिए बल्कि देश के ग्रामीण भागों में खपत को बढ़ाने के लिए भी यह आवश्यक है। वैश्विक स्तर पर भारत का झंडा, शक्तिशाली, साधन सम्पन्न और खुशहाल किसानों के बिना नहीं लहरा सकता। इस परिवर्तन की यथास्थिति को बरकरार रखते हुए नहीं किया जा सकता। इसके लिए नवीन प्रयोगों की आवश्यकता है, जिसमें निजी पूंजी की सहायता से प्रौद्योगिक सुविधाओं का निर्माण, मूलभूत ढांचे में सुधार और उनकी उन्नति की जा सके। किसान उच्च मूल्य आधारित फसलों का उत्पादन कर सकें, इसके लिए किसानों की स्वतंत्रता और सशक्तिकरण की आवश्यकता है। यही कारण था कि देश में इन सुधारों को लेकर एक आम सहमति पिछले बीस वर्षों में बनी थी।

यह बहुत ही विचित्र एवं अजीब स्थिति है जिसमें देश के सबसे खुशहाल माने जाने वाले प्रांत पंजाब के किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।  कृषि इतिहास के जानकर लोग आपको बता सकते हैं कि यह पंजाब के किसानों का परिश्रम और उद्यमी उत्साह था, जिसने देश के अनाज भंडार भरे। हरित क्रांति का उद्देश्य पूर्ण हो चुका है, अब देश को हरित क्रांति 2.0 की आवश्यकता है, ताकि किसानों की आय में बढ़ोतरी हो सके। इसके साथ ही हमें खाद्य वस्तुओं का उत्पादन न सिर्फ देश में बल्कि विदेशी बाजारों की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी करना है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस दिशा में पहला कदम उठाया है और किसानों को उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं के संदर्भ में निर्णय लेने के योग्य बनाया है। निश्चित रूप से इतनी सर्दी में आंदोलन कर रहे किसानों की आशंकाओं को दूर करना सरकार का काम है और सरकार ने संशोधनों की बात मानकर इस दिशा में पहल भी की है, परन्तु इसके साथ ही देश के करोड़ों किसानों को आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करना भी उतना ही आवश्यक है ताकि वह कर्ज और आत्महत्याओं के दुष्वक्र से निकल सकें। अगर मोदी लिंकन की तरह अडिग रहे तो यह भारत का मोदी पल होगा।

-डा. सुभाष शर्मा
(लेखक सेंटर फार इकोनामिक्स पालिसी रिसर्च के निदेशक हैं)