भीड़तंत्र

गौ तस्करी के शक में हरियाणा के एक युवक को राजस्थान में भीड़़ ने पीट-पीट कर मार डाला। कानून अपने हाथ में लेकर स्वयं ही सजा देने का यह कोई पहला मामला नहीं है। अतीत में भी कभी बच्चा चोरी, कभी प्रेमी जोड़े को तो कभी धर्म की आड़ में भीड़ ने कानून को अपने हाथ में अराजकता का परिचय दिया है। पिछले डेढ़-दो महीने के समय तो भीड़तंत्र ने एक तरह से भारत के लोकतंत्र को ही चुनौती देनी शुरू कर दी है।

भीड़तंत्र के बढ़ते कदमों को देखते हुए पिछले दिनों देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बोलते हुए कहा था कि देश में भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या करने के मामले दुर्भाग्यपूर्ण हैं और केंद्र ऐसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए प्रभावी कार्रवाई कर रहा है तथा इस पर रोकथाम के लिए सोशल मीडिया सेवा प्रदाताओं से भी फर्जी समाचार पर रोक लगाने की व्यवस्था करने को कहा गया है। राजनाथ सिंह ने कहा कि यह सच्चाई है कि कई प्रदेशों में मॉब लिंचिंग की घटनाएं घटी हैं। इसमें कई लोगों की जानें भी गई हैं। लेकिन ऐसी बात नहीं है कि इस तरह की घटनाएं विगत कुछ वर्षों में ही हुई हैं। पहले भी ऐसी घटनाएं हुई हैं। लेकिन ऐसी घटनाएं चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा कि मॉब लिंचिंग में लोग मारे गए हैं, हत्या हुई और लोग घायल हुए हैं, जो किसी भी सरकार के लिए सही नहीं है। ‘हम ऐसी घटनाओं की पूरी तरह से निंदा करते हैं।’ गृहमंत्री ने कहा कि ऐसी घटनाएं अफवाह फैलने, फेक न्यूज और अपुष्ट खबरों के फैलने के कारण घटती हैं। ऐसे में राज्य सरकारों की जि़म्मेदारी है कि वे प्रभावी कार्रवाई करें क्योंकि कानून और व्यवस्था राज्यों का विषय है। सिंह ने कहा कि ऐसे मामलों में केंद्र सरकार भी चुप नहीं है।

गौरतलब है कि गृहमंत्री से पहले देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भीड़तंत्र को अंधा कानून बताते हुए सरकार को इस पर अलग से कानून बनाने का निर्देश दिया था। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि कानून के राज में किसी अपराध के लिए सडक़ पर जांच, सुनवाई और सजा नहीं दी जा सकती। नागरिकों में सौहार्द को बढ़ावा देना राज्यों की जिम्मेदारी थी। फर्जी व झूठी खबरों के जरिये लोगों को हिंसा के लिए उकसाया गया। बढ़ती असहिष्णुता व ध्रुवीकरण के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं, जिसे जिंदगी का हिस्सा नहीं बनने दिया जा सकता। अगर इसे नहीं रोका गया तो यह राक्षसी रूप ले लेगा। शीर्ष अदालत ने भीड़ हिंसा से निपटने के लिए निरोधक, उपचारात्मक और दंडात्मक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने साफ किया है कि यह किसी खास मामले तक सीमित नहीं है। लगातार हो रही घटनाओं पर चिंता जताते हुए कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या भारत से सहिष्णुता का मूल्य घटता जा रहा है। पीठ ने निर्देश दिया कि भीड़ की हिंसा से निपटने के लिए हर जिले में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को नोडल अफसर नियुक्त करने के साथ ही स्पेशल टास्क फोर्स भी गठित की जाए। ऐसी घटनाओं की आशंका वाले इलाकों की पहचान की जाए। साथ ही भडक़ाऊ भाषण और झूठी खबरें फैलाकर लोगों को हिंसा के लिए उकसाने वाले लोगों से सख्ती से निपटा जाए। केंद्र और राज्य मिलकर इसके लिए काम करें। घटना होने पर तत्काल कार्रवाई हो और इससे जुड़े मुकदमे तेजी से निपटाए जाएं। पीडि़त के परिजनों को मुआवजा दें। इन निर्देशों का पालन करने में नाकाम रहने वाले अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई की जाए।

भीड़तंत्र पर काबू पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि भीड़तंत्र के मजबूत होने का अर्थ है हम अराजकता की ओर बढ़ रहे हैं। देश में कानून के राज की जगह जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति बन रही है और यह स्थिति देश के लिए घातक ही होगी। एक तो न्याय प्रक्रिया तेज हो दूसरा स्थानीय प्रशासन में सुधार हो तभी लोगों का व्यवस्था में विश्वास मजबूत होगा। जन साधारण का व्यवस्था में होता कमजोर विश्वास ही भीड़तंत्र का आधार है। इस आधार को समाप्त करने का ही तरीका है व्यवस्था में सुधार ला जन साधारण का विश्वास जीतना। व्यवस्था प्रति विश्वास ही भीड़तंत्र को लगाम लगा सकता है।



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।