मिशन-13

19 मई को होने वाले मतदान के लिए पंजाब की 13 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव प्रचार समाप्त हो चुका है और मतदान के लिए उलटी गिनती शुरू हो गई है। प्रचार समाप्ति के बाद जो शांतमय माहौल दिखाई दे रहा है वैसा है नहीं, क्योंकि 13 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव में उतरे 278 उम्मीदवारों की धड़कन तेज हो चुकी है और नींद उड़ चुकी है। उनके समर्थकों की स्थिति भी उन से अलग नहीं है।
अतीत में जाएं तो पायेंगे कि पंजाब के लोकसभा चुनाव परिणाम देश के अन्य भागों से अलग ही होते हैं। 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में पंजाब के मतदाता ने 24 प्रतिशत से अधिक मत देकर आम आदमी के चार सांसदों को लोकसभा में भेजा था।  जबकि इस बार पंजाब में 'आप' का प्रभाव केवल संगरूर सीट पर है जहां भगवंत मान चुनाव लड़ रहे हैं। 'आप' यह सीट जीत जाएगी यह बात भगवंत मान तो कहते हैं लेकिन यकीनी तौर पर ऐसा ही हो यह कहा नहीं जा सकता।

2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने 33 प्रतिशत से कुछ अधिक मत प्राप्त किए थे और उसके तीन सांसद जीते थे। शिरोमणि अकाली दल बादल को 26 प्रतिशत से कुछ अधिक मत मिले थे और उसके चार सांसद लोकसभा में पहुंचे थे। भाजपा को करीब 9 प्रतिशत मत मिले थे और इसके दो सांसद जीते। बाद में गुरदासपुर के सांसद विनोद खन्ना की मौत के बाद कांग्रेस ने उपचुनावों में यह सीट भाजपा से छीन ली। इससे कांग्रेस के सांसदों की संख्या बढ़कर चार हो गई और भाजपा केवल एक ही संख्या पर सिमट गई।

2019 के लोकसभा चुनाव में पंजाब के मुख्य मंत्री कै. अमरेन्द्र सिंह मिशन 13 को पूरा करने का दावा और कोशिश दोनों कर रहे हैं। लेकिन कै. अमरेन्द्र सिंह भूल रहे हैं कि मिशन 13 तो 2014 में भी पूरा नहीं हो सका था जब पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन विरुद्ध एक लहर चल रही थी और कै. अमरेन्द्र सिंह के प्रति लोग आकर्षित हो रहे थे। वर्तमान में तो अकाली-भाजपा गठबंधन विरुद्ध लहर पहले से कहीं कमजोर हो चुकी है। कांग्रेस बरगाड़ी में हुए बेअदबी के मुद्दे को उछाल कर तथा धार्मिक भावनाओं को उभार कर अकालियों को उनके गढ़ में पछाडऩे की कोशिश अवश्य कर रही है। एक सीमा के बाद धार्मिक भावनाओं पर आधारित राजनीति के दुषपरिणाम भी देखने को मिलते हैं। बरगाड़ी मामले में भी कुछ इसी तरह का होता दिखाई दे रहा है।

कै. अमरेन्द्र सिंह ने 2017 में प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभाली थी तब पंजाब के लोगों को लगा था कि जिन मुद्दों के कारण अकाली-भाजपा सरकार को बाहर का रास्ता दिखाया है उन पर कैप्टन सरकार कार्य कर प्रदेश की स्थिति को बेहतर करेगी। लेकिन दो वर्षों में कै. सरकार धरातल स्तर पर पंजाब के लोगों को कुछ ठोस देने में असफल रही है। रेत, शराब माफिया पहले से कहीं अधिक सक्रिय है। बिजली के दाम तथा भ्रष्टाचार आम आदमी की कमर तोड़ रहे हैं। उससे भी दयनीय स्थिति यह है कि आम आदमी की सुनने वाला कोई नहीं है। कै. अमरेन्द्र सिंह अपनी सरकार मंत्रियों के सहारे नहीं दरबारियों के सहारे चला रहे हैं। इसलिए जन साधारण से सरकार की दूरी  बढ़ती जा रही है। सरकार के प्रति बढ़ती उदासीनता मतदान को प्रभावित करने का एक मुख्य कारण बन गया है।

लोकसभा चुनावों को प्रभावित करने वाला एक और मुख्य कारण बनेगा राजनीतिक दलों की आंतरिक धड़ेबंदी। पंजाब कांग्रेस में एक नहीं, दो नहीं, तीन धड़े सक्रिय हैं। इसी बात का ध्यान रखते हुए कै. अमरेन्द्र सिंह ने कहा था कि जिन क्षेत्रों से कांग्रेस उम्मीदवार जीतेगा उन्हीं क्षेत्रों के विधायकों को निगमों व बोर्डों की अध्यक्षता इत्यादि मिलेगी। नवजोत सिद्धू उस समय और आज भी कै. अमरेन्द्र सिंह की नीति का विरोध करते दिखाई दे रहे हैं। प्रताप सिंह बाजवाऔर कै. अमरेन्द्र के बीच 36 का आंकड़ा तो जगजाहिर है।

अकाली दल बादल में से टकसाली अकालियों के बगावत कर जाने से स. प्रकाश सिंह बादल व सुखबीर बादल को जो झटका लगा था उसको सुखबीर बादल ने स्वयं फिरोजपुर से और पत्नी हरसिमरत को बठिंडा से चुनाव मैदान में उतार कर एक तरह उसकी पूर्ति कर ली है। सुखबीर और हरसिमरत के चुनावी मैदान में उतरने से अकाली दल बादल के कार्यकर्ता में जो उत्साह पैदा हुआ है उससे अकाली दल को निश्चित रूप से राजनीतिक लाभ मिलने वाला है।

पंजाब भाजपा की धड़ेबंदी भी जगजाहिर है। लेकिन भाजपा को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम का जो लाभ मिल रहा है उससे धड़ेबंदी के कारण होने वाला नुकसान न के बराबर ही रह गया है। पंजाब का शहरी मतदाता केंद्र में मोदी सरकार देखना चाहता है, इसलिए वह पंजाब स्तर की धड़ेबंदी को अभी आंखों से ओझल कर चल रहा है। स. प्रकाश सिंह बादल का भी मोदी के नाम मत मांगने से अकाली-भाजपा गठबंधन को लाभ होने वाला है। अकाली-भाजपा दोनों के कार्यकर्ताओं को एहसास भी है कि वर्तमान लोकसभा चुनाव परिणाम ही उनके राह की बाधाओं को बढ़ाने या हटाने का काम करेंगे।

पंजाब के लोकसभा चुनावों को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला जो कारण होगा वह आम आदमी पार्टी को मिलने वाला मत प्रतिशत ही होगा। 2014 में पहली बार चुनाव में उतरी आम आदमी पार्टी को 24 प्रतिशत से अधिक मत मिले थे। इस बार जो राजनीतिक परिस्थितियां पंजाब में बनी हुई हैं उनको देखते हुए कहा जा सकता है कि विभाजित आम आदमी पार्टी को 10 प्रतिशत से अधिक मत नहीं मिलने वाले। इसका अर्थ हुआ कि करीब 14 प्रतिशत मत अन्य दलों में विभाजित हो जाएंगे।

आम आदमी पार्टी से टूटकर यह 14 प्रतिशत मत अकाली-भाजपा गठबंधन को जाते हैं या कांग्रेस को जाते हैं इसी बात पर कांग्रेस व अकाली-भाजपा गठबंधन का राजनीतिक गणित प्रभावित होने वाला है।
उपरोक्त के अलावा जो कारण पंजाब के लोकसभा चुनावों को प्रभावित करने जा रहे हैं वह है बहुजन समाज पार्टी की भूमिका। प्रादेशिक व स्थानीय मुद्दे भी हैं लेकिन वह इस समय पर्दे के पीछे ही चले गए हैं। पंजाब की राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित करेगा आप का मतदान। इसलिए अपना मतदान सोच समझकर अवश्य करें।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।